BWF World Championship: नई दिल्ली में चल रही बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप 2026 में भारत के लिए अब तक का सफर कुछ खास नहीं रहा. कई बड़े खिलाड़ियों से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन वे अपने प्रदर्शन से निराश कर गए. अपने घर में चैंपियन बनने का भारतीय टीम का सपना भी टूट गया. हालांकि, गायत्री गोपीचंद और त्रिशा जॉली की युवा जोड़ी ने जरूर शानदार प्रदर्शन किया और कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया.
शनिवार को सेमीफाइनल में भारतीय जोड़ी का सामना मौजूदा चैंपियन चीन की लियू शेंग शू और टान निंग की जोड़ी से हुआ. तीन गेम तक चले इस मुकाबले में भारत को 21-18, 13-21, 8-21 से हार मिली. सेमीफाइनल में हार के बावजूद गायत्री और त्रिशा कांस्य पदक अपने नाम करने में सफल रहीं.
डिफेंडिंग चैंपियन के खिलाफ शानदार शुरुआत
22 अगस्त को इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में महिला डबल्स का सेमीफाइनल खेला गया. भारतीय जोड़ी के सामने चीन की लियू शेंग शू और टान निंग थीं. चीन की यही जोड़ी पिछले साल की चैंपियन थी और इस बार भी खिताब की सबसे बड़ी दावेदार मानी जा रही थी.
ऐसे में भारतीय खिलाड़ियों के लिए मुकाबला काफी मुश्किल माना जा रहा था. लेकिन त्रिशा और गायत्री ने शुरुआत से ही शानदार खेल दिखाया. पहले गेम में दोनों ने चीनी जोड़ी को ज्यादा बढ़त बनाने का मौका नहीं दिया. मुकाबला आखिरी अंकों तक बराबरी का रहा, लेकिन भारतीय जोड़ी ने 21-18 से गेम जीतकर बढ़त बना ली.
दूसरे गेम में चीन ने की वापसी
पहला गेम हारने के बाद चीनी जोड़ी ने दूसरे गेम में जोरदार वापसी की. उन्होंने लगातार अंक जुटाए और भारतीय खिलाड़ियों पर दबाव बनाया. त्रिशा और गायत्री ने भी मुकाबला छोड़ने के बजाय पूरा जोर लगाया, लेकिन यह गेम चीन ने 21-13 से अपने नाम कर लिया.
अब मुकाबला तीसरे और निर्णायक गेम में पहुंच गया. यहां चीनी खिलाड़ियों का अनुभव साफ नजर आया. उन्होंने शुरुआत से ही बढ़त बना ली और भारतीय जोड़ी को वापसी का मौका नहीं दिया. चीन ने तीसरा गेम 21-8 से जीतकर फाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली.
भारत के लिए इकलौता पदक
सेमीफाइनल में हार के बावजूद त्रिशा जॉली और गायत्री गोपीचंद ने भारत को इस चैंपियनशिप का इकलौता पदक दिलाया. दोनों ने पहली बार विश्व चैंपियनशिप में पदक जीता है.
इतना ही नहीं, 2011 के बाद यह पहली बार है जब किसी भारतीय महिला डबल्स जोड़ी ने विश्व चैंपियनशिप में पदक अपने नाम किया है. ऐसे में त्रिशा और गायत्री की यह उपलब्धि भारतीय बैडमिंटन के लिए बेहद खास मानी जा रही है.
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