Defence Budget 2026: आगामी आम बजट को लेकर यह संकेत मिल रहे हैं कि सरकार रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को अगले स्तर पर ले जाने के लिए बड़े और निर्णायक कदम उठा सकती है. नीति विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाने से आगे बढ़कर भारत को अंतरराष्ट्रीय रक्षा कंपनियों और मित्र देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को सक्रिय रूप से बढ़ावा देने की जरूरत है.
इसका उद्देश्य न सिर्फ निवेश आकर्षित करना है, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक का हस्तांतरण, संयुक्त विकास और रक्षा नवाचार को तेज करना भी है. भारत में रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति वर्ष 2001 में दी गई थी, जिसे 2020 में और अधिक उदार बनाया गया. इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि अब नीति के स्तर पर ऐसे व्यावहारिक सुधार जरूरी हैं, जो विदेशी भागीदारी को वास्तविक रूप से आकर्षक बनाएं.
तकनीक हस्तांतरण और संयुक्त विकास पर फोकस की जरूरत
रक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ केवल खरीदारी आधारित रिश्तों के बजाय सह-विकास और संयुक्त अनुसंधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. इसके तहत रक्षा प्रौद्योगिकियों में साझा आरएंडडी को बढ़ावा देना अहम होगा.
साथ ही, तकनीक हस्तांतरण के तहत आने वाले विदेशी घटकों को स्वदेशी सामग्री की गणना में आंशिक या पूर्ण छूट देने जैसे सुधारों पर भी विचार किया जा सकता है. इससे विदेशी कंपनियों को भारत में उत्पादन और तकनीक साझा करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और घरेलू उद्योग को भी वैश्विक मानकों तक पहुंचने में मदद मिलेगी.
रक्षा खर्च में भारत की वैश्विक स्थिति
रक्षा व्यय के मामले में भारत आज दुनिया के शीर्ष पांच देशों में शामिल है, लेकिन कुल खर्च के लिहाज से वह अभी भी अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों से काफी पीछे है. इसके बावजूद बीते एक दशक में भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है.
वर्ष 2014–15 में जहां देश का कुल रक्षा उत्पादन ₹0.46 लाख करोड़ (करीब $5.1 बिलियन) था, वहीं 2024–25 तक यह बढ़कर ₹1.50 लाख करोड़ (लगभग $16.5 बिलियन) तक पहुंच गया है. यह वृद्धि बताती है कि नीतिगत सुधारों और घरेलू उद्योग को मिले प्रोत्साहन का असर जमीन पर दिखने लगा है.
2029 तक बड़े लक्ष्य, वैश्विक आपूर्तिकर्ता बनने की तैयारी
सरकार ने आने वाले वर्षों के लिए रक्षा क्षेत्र में बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए हैं. वर्ष 2029 तक ₹3 लाख करोड़ (लगभग $33 बिलियन) के रक्षा उत्पादन और ₹0.5 लाख करोड़ (करीब $5.5 बिलियन) के वार्षिक रक्षा निर्यात का लक्ष्य रखा गया है.
इन लक्ष्यों का मकसद केवल घरेलू जरूरतें पूरी करना नहीं है, बल्कि भारत को एक भरोसेमंद वैश्विक रक्षा आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित करना भी है. अगर यह लक्ष्य हासिल होते हैं, तो भारत अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है.
रक्षा बजट में संतुलन की चुनौती
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा क्षेत्र के विकास का तीसरा और सबसे अहम स्तंभ पूंजीगत व्यय यानी कैपेक्स में निरंतर और पर्याप्त वृद्धि है. बजट 2025–26 में कुल रक्षा बजट में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी, लेकिन आधुनिकीकरण और स्वदेशीकरण से जुड़े पूंजीगत व्यय में वृद्धि सिर्फ करीब 5 प्रतिशत रही.
यह असंतुलन लंबे समय में सैन्य क्षमताओं के विकास को प्रभावित कर सकता है. इसी को ध्यान में रखते हुए रक्षा सचिव ने हाल ही में संकेत दिए हैं कि बजट 2026–27 में रक्षा व्यय को लगभग 20 प्रतिशत तक बढ़ाने की संभावना पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है.
अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाना होगा
पूंजीगत व्यय के साथ-साथ रक्षा अनुसंधान एवं विकास में मजबूत निवेश को भी उतनी ही प्राथमिकता देने की जरूरत है. बजट 2025–26 में कुल ₹6.81 लाख करोड़ के रक्षा बजट में से केवल ₹26,816 करोड़ (लगभग $2.9 बिलियन) आरएंडडी के लिए आवंटित किए गए थे.
वैश्विक तुलना करें तो यह राशि काफी कम मानी जाती है. उदाहरण के तौर पर, अमेरिका ने वर्ष 2025 में रिसर्च, डेवलपमेंट, टेस्टिंग एंड इवैल्यूएशन के लिए $141.2 बिलियन का बजट तय किया था. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत को भविष्य की युद्ध तकनीकों में प्रतिस्पर्धी बनना है, तो आरएंडडी पर खर्च को तेजी से बढ़ाना ही होगा.
आत्मनिर्भरता की राह में बजट की अहम भूमिका
कुल मिलाकर, बजट 2026 भारत के रक्षा क्षेत्र के लिए निर्णायक साबित हो सकता है. अगर विदेशी साझेदारी, पूंजीगत व्यय और अनुसंधान एवं विकास को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाया गया, तो भारत न केवल अपनी सुरक्षा जरूरतों को स्वदेशी रूप से पूरा करेगा, बल्कि वैश्विक रक्षा परिदृश्य में भी एक मजबूत खिलाड़ी बनकर उभर सकता है.
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