स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम 'कुशा' पर DRDO ने दिया बड़ा अपडेट, S-400 को करेगा रिप्लेस; जानें कब होगी टेस्टिंग

Project Kusha: भारत बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात के बीच अपनी हवाई सुरक्षा को नई ऊंचाई पर ले जाने की तैयारी में जुटा है. इसी कड़ी में डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (DRDO) के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट कुशा को लेकर बड़ी जानकारी सामने आई है.

DRDO gives big update on indigenous air defense system Kusha will replace S-400
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Project Kusha: भारत बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात के बीच अपनी हवाई सुरक्षा को नई ऊंचाई पर ले जाने की तैयारी में जुटा है. इसी कड़ी में डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (DRDO) के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट कुशा को लेकर बड़ी जानकारी सामने आई है. डीआरडीओ के अनुसार, इस स्वदेशी लंबी दूरी के सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम के विकासात्मक परीक्षण जल्द शुरू किए जाएंगे. माना जा रहा है कि यह सिस्टम आने वाले वर्षों में भारत की एयर डिफेंस क्षमता की रीढ़ बनेगा.

प्रोजेक्ट कुशा को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसके अलग-अलग वेरिएंट दुश्मन के हवाई खतरों को 60 किलोमीटर से लेकर 350 किलोमीटर की दूरी तक ही निष्क्रिय कर सकें. यह सिस्टम लड़ाकू विमानों, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल जैसे आधुनिक खतरों से निपटने में सक्षम होगा.

मिशन सुदर्शन चक्र की आधारशिला बना प्रोजेक्ट कुशा

प्रोजेक्ट कुशा को मिशन सुदर्शन चक्र का एक अहम स्तंभ माना जा रहा है. इस महत्वाकांक्षी मिशन की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद की थी. मिशन सुदर्शन चक्र का उद्देश्य साल 2035 तक देश के लिए एक पूरी तरह मल्टी-लेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एयर डिफेंस शील्ड तैयार करना है.

इस पहल का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की विदेशी एयर डिफेंस प्रणालियों, खासतौर पर रूसी S-400 सिस्टम पर निर्भरता को कम करना है. मौजूदा सुरक्षा परिदृश्य में प्रोजेक्ट कुशा को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह न केवल देश की हवाई सीमाओं को मजबूत करेगा, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की रक्षा रणनीति को भी ठोस आधार देगा.

कैसे काम करेगा प्रोजेक्ट कुशा का मल्टी-लेयर सिस्टम

प्रोजेक्ट कुशा को एक मल्टी-लेयर इंटरसेप्शन सिस्टम के रूप में विकसित किया जा रहा है. इसमें अलग-अलग रेंज की मिसाइलें एक ही नेटवर्क के तहत काम करेंगी. कम दूरी वाले वेरिएंट लगभग 60 से 70 किलोमीटर की रेंज में ड्रोन, फाइटर जेट और क्रूज मिसाइल को निशाना बना सकेंगे. मध्यम दूरी का वेरिएंट 150 से 200 किलोमीटर तक हाई-स्पीड टारगेट और स्टैंड-ऑफ हथियारों को इंटरसेप्ट करेगा.

वहीं लंबी दूरी का वेरिएंट 300 से 350 किलोमीटर की रेंज में AWACS, टैंकर एयरक्राफ्ट और दूर से आने वाले हवाई खतरों को पहले ही पहचानकर निष्क्रिय करने में सक्षम होगा. इस मल्टी-लेयर अप्रोच से दुश्मन के किसी भी हवाई हमले को कई स्तरों पर रोकना संभव हो सकेगा.

अत्याधुनिक रडार और सेंसर नेटवर्क से लैस होगा सिस्टम

प्रोजेक्ट कुशा की ताकत इसका एडवांस रडार और सेंसर नेटवर्क होगा. इसमें लंबी दूरी के AESA रडार, मल्टी-सेंसर डेटा फ्यूजन सिस्टम और रियल-टाइम ट्रैकिंग क्षमताएं शामिल होंगी. यह नेटवर्क एक साथ सैकड़ों हवाई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकेगा और खतरे के स्तर के आधार पर टारगेट को प्राथमिकता देगा.

इसका मतलब यह है कि सिस्टम सबसे खतरनाक टारगेट को पहले नष्ट करने का फैसला खुद कर सकेगा, जिससे किसी भी बड़े नुकसान की आशंका काफी हद तक कम हो जाएगी.

AI आधारित कमांड सिस्टम से मिलेगी तेज प्रतिक्रिया

प्रोजेक्ट कुशा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस कमांड और कंट्रोल सिस्टम भी शामिल होगा. यह सिस्टम संभावित खतरे की पहचान करेगा, सबसे उपयुक्त इंटरसेप्टर का चयन करेगा और बेहद कम समय में फायर करने का फैसला ले सकेगा.

AI सपोर्ट की वजह से मानव हस्तक्षेप की जरूरत सीमित होगी और प्रतिक्रिया समय में भारी कमी आएगी. युद्ध जैसे हालात में यह तेज और सटीक निर्णय क्षमता किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकती है.

बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइल से मिलेगी मजबूत सुरक्षा

प्रोजेक्ट कुशा को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह बैलिस्टिक मिसाइल के टर्मिनल फेज में भी उन्हें इंटरसेप्ट कर सके. इसके साथ ही यह लो-लेवल पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइल और स्टेल्थ टारगेट को भी पहचानकर मार गिराने में सक्षम होगा.

इसके आने से भारत की लंबी दूरी की एयर डिफेंस जरूरतों के लिए S-400 सिस्टम पर निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है. स्वदेशी सिस्टम होने के कारण इसमें किसी विदेशी प्रतिबंध या सप्लाई चेन बाधा का जोखिम भी नहीं रहेगा.

S-400 से आगे क्यों है कुशा

जहां S-400 एक जनरल-पर्पज सिस्टम है, वहीं प्रोजेक्ट कुशा को पूरी तरह भारतीय जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है. इसमें भारत का भूगोल, चीन और पाकिस्तान से आने वाले संभावित हवाई खतरे और भारतीय वायुसेना तथा थलसेना की रणनीति को खास तौर पर शामिल किया गया है.

इसके अलावा कुशा को आकाश, MRSAM, XRSAM, अस्त्र Mk-3 और भविष्य में आने वाले लेजर तथा डायरेक्ट एनर्जी वेपन सिस्टम के साथ आसानी से इंटीग्रेट किया जा सकेगा, जबकि S-400 के साथ ऐसी फ्लेक्सिबिलिटी सीमित है.

भारत को क्या मिलेगा रणनीतिक लाभ

प्रोजेक्ट कुशा के सफल होने से भारत के पास एक पूरी तरह स्वदेशी, मल्टी-लेयर एयर डिफेंस नेटवर्क होगा. इससे कम लागत में ज्यादा बड़े इलाके की सुरक्षा संभव हो सकेगी और देश को तेज, स्मार्ट और भरोसेमंद प्रतिक्रिया क्षमता मिलेगी. इसके साथ ही भविष्य में भारत इस सिस्टम के निर्यात की संभावनाएं भी तलाश सकता है, जिससे रक्षा क्षेत्र में भारत की वैश्विक साख और मजबूत होगी.

कुल मिलाकर, प्रोजेक्ट कुशा सिर्फ एक मिसाइल सिस्टम नहीं, बल्कि भारत की एयर डिफेंस रणनीति का भविष्य है. इसके जरिए भारत न केवल विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता कम करेगा, बल्कि अपनी शर्तों पर, अपने सिस्टम से अपने आसमान की रक्षा करने में सक्षम होगा.

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