नई दिल्ली: बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को होने वाले संसदीय चुनाव लोकतांत्रिक माहौल के बजाय डर, हिंसा और असुरक्षा के बीच आगे बढ़ते दिखाई दिए. खासकर हिन्दू समुदाय समेत धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ जिस तरह हमले बढ़े, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या ये केवल सांप्रदायिक घटनाएं थीं या फिर किसी बड़े और सुनियोजित अभियान का हिस्सा.
अल्पसंख्यक संगठनों का कहना है कि जैसे-जैसे चुनाव प्रचार तेज हुआ, वैसे-वैसे हमलों की संख्या भी बढ़ती गई. बांग्लादेश हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल के अनुसार, केवल 2025 में ही सांप्रदायिक हिंसा की 522 घटनाएं दर्ज की गईं. इनमें 61 हत्याएं, 28 यौन हिंसा के मामले और 95 धार्मिक स्थलों पर हमले शामिल थे. संगठन ने साफ कहा कि इन घटनाओं का चुनावी माहौल से सीधा संबंध था.
जनवरी 2026 तक हालात और खराब हो गए. काउंसिल ने बताया कि कई इलाकों में अल्पसंख्यक परिवारों को बंधक बनाया गया, संपत्तियां नष्ट की गईं और नई हत्याएं सामने आईं. एक अन्य अल्पसंख्यक संगठन ने 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही 133 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं दर्ज कीं. इन घटनाओं ने अल्पसंख्यक समुदायों के भीतर गहरे डर का माहौल पैदा कर दिया.
एक समान पैटर्न पर हुई हिंसा
मानवाधिकार रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह हिंसा अचानक या केवल आपराधिक घटनाएं नहीं थीं. इनमें एक समान पैटर्न दिखाई देता है. राइट्स एंड रिस्क्स एनालिसिस ग्रुप (RRAG) की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 दिसंबर 2025 से 15 जनवरी 2026 के बीच कम से कम 15 हिन्दुओं की हत्या की गई. इनमें कई मामलों में पीड़ितों का गला काटा गया. रिपोर्ट के अनुसार, ये हत्याएं पहले से योजना बनाकर की गई थीं और कई मामलों में हत्या के तुरंत बाद पीड़ितों की दुकानें, जमीन या अन्य संपत्तियां कब्जा ली गईं.
अल्पसंख्यक संगठनों का दावा है कि केवल लोगों को मारना ही मकसद नहीं था, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति को भी खत्म करना उद्देश्य था. कई मामलों में जमीनों पर कब्जा किया गया और सैकड़ों घरों व दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया.
एक हत्या की कहानी, जिसने सबको झकझोर दिया
18 दिसंबर 2025 को मयमनसिंह के भालुका इलाके में काम करने वाले 27 वर्षीय हिन्दू गारमेंट कर्मचारी दीपु चंद्र दास पर फैक्ट्री के कुछ सहकर्मियों ने इस्लाम के खिलाफ टिप्पणी करने का आरोप लगाया. यह आरोप तेजी से फैक्ट्री और आसपास के इलाके में फैल गया. थोड़ी ही देर में भीड़ ने दीपु को बेरहमी से पीटा. फिर उसे जिंदा हालत में पेड़ से लटका दिया गया और आग लगा दी गई. बाद में रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) की जांच में इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि दीपु ने कोई आपत्तिजनक टिप्पणी की थी.
RRAG की रिपोर्ट कहती है कि कई मामलों में यही तरीका अपनाया गया. पहले किसी व्यक्ति को “धर्म विरोधी”, “भारतीय एजेंट” या किसी विरोधी राजनीतिक गुट का समर्थक बताया जाता है. फिर भीड़ हमला करती है, तेज हथियारों से हत्या की जाती है और बाद में उनकी संपत्ति लूट ली जाती है या कब्जा कर ली जाती है. बचे हुए लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि पुलिस की कार्रवाई अक्सर धीमी रहती है. वहीं अंतरिम सरकार कई मामलों को साधारण अपराध या राजनीतिक हिंसा बताकर सांप्रदायिक पहलू को नजरअंदाज करती रही.
बदलता राजनीतिक माहौल और कट्टरपंथी नेटवर्क
यह हिंसा ऐसे समय में बढ़ी जब बांग्लादेश की राजनीति बड़े बदलाव से गुजर रही थी. 2024 में शेख हसीना की सत्ता से विदाई और मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बनने के बाद कई इस्लामी संगठनों की गतिविधियां फिर से बढ़ने लगीं. अंतरिम सरकार ने 2024 में जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन पर लगे प्रतिबंध हटा दिए. इसके बाद इन संगठनों ने रैलियां, भर्ती अभियान और डिजिटल प्रचार के जरिए फिर से सार्वजनिक गतिविधियां तेज कर दीं.
कुछ भारतीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और जमात-ए-इस्लामी के बीच संपर्क बढ़ रहे हैं. हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस दावे ने चिंता बढ़ा दी क्योंकि 1971 में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा में जमात-ए-इस्लामी की भूमिका को लेकर पहले भी आरोप लगते रहे हैं.
अल्पसंख्यकों के भीतर बढ़ता असुरक्षा का भाव
हिन्दू, बौद्ध और ईसाई समुदायों के बीच यह भावना तेजी से मजबूत हुई कि राज्य अब उनकी सुरक्षा करने में सक्षम नहीं है या इच्छुक नहीं है. राजशाही, ढाका और अन्य इलाकों से सामने आए बयान बताते हैं कि 2024 के बाद से लोग लगातार डर में जी रहे हैं. कई जगहों पर हिन्दू बस्तियों और पूजा स्थलों पर हमले हुए. हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल के मुताबिक, शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद से अब तक 2,500 से ज्यादा सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं सामने आ चुकी हैं. इनमें 61 हत्याएं और मंदिरों, चर्चों व मठों पर 95 हमले शामिल हैं.
अल्पसंख्यक नेताओं का कहना है कि अब धार्मिक पहचान को राजनीतिक पहचान की तरह देखा जा रहा है. जिन समुदायों को परंपरागत रूप से धर्मनिरपेक्ष दलों के समर्थक माना जाता है, वे सत्ता संघर्ष में आसान निशाना बनते जा रहे हैं. इसी वजह से कई परिवार देश छोड़ने, बच्चों को विदेश भेजने या राजनीति से पूरी तरह दूरी बनाने पर विचार कर रहे हैं.
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