Aravalli Hills: भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला अरावली पर्वतमाला फिर चर्चा में है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव को मान्यता दी है, जिसमें कहा गया था कि केवल वही पर्वत जो 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले हैं, उन्हें अरावली श्रृंखला का हिस्सा माना जाएगा. इस फैसले के बाद पर्वतमाला के आसपास बसे शहरों में लोगों के बीच चिंता बढ़ गई है. स्थानीय निवासियों का कहना है कि इससे पर्यावरण पर असर पड़ सकता है, जबकि केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया है कि अरावली में माइनिंग पर सख्ती बरकरार है और 90 फीसदी से अधिक क्षेत्र पूरी तरह संरक्षित हैं.
इतिहास और वीरता का प्रतीक
अरावली केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि भारत के इतिहास और युद्ध कौशल का प्रतीक रही है. मध्यकालीन समय में यह पर्वत श्रृंखला कई युद्धों का गवाह रही है. विशेषकर मुगलों के खिलाफ राजपूतों की लड़ाई में अरावली पर्वतों ने सुरक्षा और रणनीति का महत्वपूर्ण योगदान दिया.
अरावली की दुर्गम पहाड़ियों ने महाराणा प्रताप और अन्य योद्धाओं को छापामार युद्धों के लिए सुरक्षित स्थान मुहैया कराया. प्रसिद्ध किले जैसे कुंभलगढ़ और चित्तौड़गढ़ इसी पर्वतमाला का हिस्सा हैं. इतिहास गवाह है कि इन पहाड़ों ने कई बार आक्रांताओं की योजनाओं को असफल किया. आज भी यह पर्वत श्रृंखला अपनी सुरक्षा और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है.
250 करोड़ साल पुराना इतिहास
अरावली पर्वतमाला सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि विश्व की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है. इसकी उत्पत्ति लगभग 250 करोड़ साल पहले हुई थी. उस समय भारत और अन्य महाद्वीप आज की भौगोलिक स्थिति में नहीं थे और पृथ्वी पर जीवन के शुरुआती स्वरूप विकसित हो रहे थे.
वैज्ञानिकों के अनुसार, अरावली का निर्माण प्रोटेरोज़ोइक युग में हुआ. इसकी उम्र लगभग 250 से 350 करोड़ साल मानी जाती है. यह पर्वत श्रृंखला सिर्फ ऊँचाई और बनावट के लिए नहीं बल्कि भारत की जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करने में भी अहम भूमिका निभाती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन पहाड़ियों की ऊँचाई में कटौती होती है, तो यह कई छोटे-छोटे जीवों और पारिस्थितिक तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है.
भौगोलिक विस्तार और संरचना
अरावली श्रृंखला भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में फैली हुई है और इसकी लंबाई लगभग 670 किलोमीटर है. यह राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली तक फैली हुई है. अरावली केवल पर्वतों का समूह नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा है.
यह पर्वत श्रृंखला थार रेगिस्तान के फैलाव को रोकने में भी अहम भूमिका निभाती है और क्षेत्र की जलवायु और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है.
पर्यावरण और संरक्षण
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने हाल ही में साफ कहा कि अरावली में माइनिंग पर कड़ी निगरानी है. पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से इस पर्वत श्रृंखला के 90 फीसदी से अधिक क्षेत्र संरक्षित हैं. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने यह स्पष्ट किया कि केवल ऊँचे पर्वत ही अरावली का हिस्सा माने जाएंगे, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी.
अरावली की पहाड़ियां केवल प्राकृतिक सौंदर्य और इतिहास के लिए ही नहीं, बल्कि जैव विविधता और पारिस्थितिकी के लिए भी अमूल्य हैं. इन पहाड़ों की संरचना और उनकी उम्र भारत और विश्व भूगोल के इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देती है.
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