अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध का 35वां दिन: खाड़ी देशों की हालत सबसे ज्यादा खराब, भारत पर कितना असर?

जैसे-जैसे अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी युद्ध 35वें दिन में प्रवेश कर चुका है, इसका असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत पर भी साफ दिखाई देने लगा है.

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प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Iran War: जैसे-जैसे अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी युद्ध 35वें दिन में प्रवेश कर चुका है, इसका असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत पर भी साफ दिखाई देने लगा है. भारत का तेल आयात बिल 85 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया है, जबकि खाड़ी देशों से आने वाला करीब 90 अरब डॉलर का रेमिटेंस लगभग ठप हो गया है. यह कोई दूर की भू-राजनीति नहीं, बल्कि भारत के चालू खाते पर सीधा दबाव है, जिससे जीडीपी में 15% तक गिरावट का खतरा पैदा हो सकता है. 

इस पूरे संघर्ष में जहां अमेरिका क्षेत्रीय नियंत्रण मजबूत कर रहा है, वहीं ईरान समुद्री मार्गों पर दबदबा बनाकर आर्थिक लाभ लेने की स्थिति में है और इज़राइल लेबनान में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है. सबसे ज्यादा नुकसान खाड़ी देशों को झेलना पड़ रहा है.

1979 से पहले: अमेरिका-ईरान-इज़राइल के संबंध

1979 से पहले ईरान के शाह अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगी थे. उन्हें हर साल करीब 1 अरब डॉलर की सैन्य सहायता मिलती थी, तेहरान में अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद थे और ईरान ने अमेरिका से एफ-14 टॉमकैट जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान खरीदे थे. 1953 में CIA के तख्तापलट के बाद ये रिश्ते और मजबूत हुए.

इज़राइल भी अपने चरम समय में 100% तेल ईरान से आयात करता था. दोनों देशों की खुफिया एजेंसियां मोसाद और सावाक मिस्र के नासिर जैसे अरब नेताओं के खिलाफ मिलकर काम करती थीं. 1979 की इस्लामिक क्रांति और 444 दिनों तक चले अमेरिकी दूतावास बंधक संकट के बाद भी व्यावहारिक संबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए.

1980-88 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान इज़राइल ने गुप्त रूप से ईरान को 2 से 5 अरब डॉलर के हथियार बेचे, जिनमें एफ-4 फैंटम के स्पेयर पार्ट्स, तोप के गोले और “ऑपरेशन सीशेल” के तहत 18 हॉक मिसाइलें शामिल थीं. वहीं अमेरिका ने ईरान-कॉन्ट्रा स्कैंडल के जरिए 2000 से अधिक TOW एंटी-टैंक मिसाइलें भेजीं, बदले में तेल और बंधकों की रिहाई सुनिश्चित की गई.

खाड़ी देशों पर सबसे बड़ा असर

ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के मिसाइल हमलों ने खाड़ी देशों की कमजोरियों को उजागर कर दिया. यूएई के एल्युमिनियम प्लांट्स को 310 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ, बहरीन के वित्तीय जिले को खाली कराना पड़ा और कुवैत का एयरपोर्ट आग की चपेट में आ गया.

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) और यूएई के शासक मोहम्मद बिन जायद (MBZ), जो पहले रूस-चीन के साथ रणनीतिक समझौते और BRICS में शामिल होने की बात करते थे, अब अमेरिका से सुरक्षा की मांग कर रहे हैं. खाड़ी देशों में 50,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हो चुके हैं, जो 2003 के इराक युद्ध के बाद सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा है.

इसके साथ ही 15 अरब डॉलर के हथियार सौदों को मंजूरी दी गई है, जिसमें F-35 लड़ाकू विमान, THAAD मिसाइल सिस्टम और 30 अपाचे हेलीकॉप्टर शामिल हैं. अब खाड़ी देशों की “रणनीतिक स्वायत्तता” लगभग खत्म हो चुकी है- न चीनी 5G प्रोजेक्ट्स, न रूसी तेल सौदे और न ही स्वतंत्र विदेश नीति.

ईरान की रणनीतिक मजबूती

युद्ध में भारी नुकसान झेलने के बावजूद ईरान क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत बनकर उभरा है. सुप्रीम लीडर खामेनेई की 28 फरवरी को हत्या और 1,937 नागरिकों की मौत (जिसमें 212 बच्चे शामिल हैं) के बावजूद ईरान का “Axis of Resistance” - हिज़्बुल्लाह, हूती, इराकी मिलिशिया और सीरियाई समूह अब भी सक्रिय है.

हॉर्मुज जलडमरूमध्य के उत्तरी तट पर नियंत्रण रखते हुए ईरान वैश्विक तेल आपूर्ति (21 मिलियन बैरल/दिन) को प्रभावित करने की स्थिति में है. वह “नेविगेशन टैक्स” के रूप में प्रति बैरल 5-10 डॉलर वसूल कर सालाना 50-100 अरब डॉलर तक कमा सकता है.

हालांकि भारत के लिए राहत की बात यह है कि ईरान ने भारतीय जहाजों को हॉर्मुज से मुक्त आवाजाही की अनुमति दी है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बड़ा सहारा मिला है. चीन को भी अपने 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के तेल आयात के लिए सुरक्षित रास्ता मिल रहा है, जबकि रूस ईरान को ड्रोन और S-400 सिस्टम की आपूर्ति कर रहा है.

इज़राइल का विस्तार और लेबनान में कार्रवाई

इज़राइल ने 16 मार्च को लेबनान में घुसपैठ कर लितानी नदी से 8 किलोमीटर आगे तक का इलाका अपने नियंत्रण में ले लिया है. इस कार्रवाई में हिज़्बुल्लाह के प्रमुख नईम कासिम की हत्या कर दी गई और करीब 10 लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा. 50 गांव पूरी तरह तबाह हो चुके हैं और अब वहां नागरिकों की वापसी पर रोक है.

इज़राइल के वित्त मंत्री बेज़लेल स्मोट्रिच ने इस क्षेत्र को औपचारिक रूप से अपने देश में मिलाने की मांग की है. यह 1967 के गोलान हाइट्स के बाद पहली बड़ी क्षेत्रीय बढ़त मानी जा रही है.

भारत और वैश्विक असर

दुबई का जेबेल अली पोर्ट बंद पड़ा है, सऊदी अरामको ने 20 लाख बैरल प्रतिदिन उत्पादन घटा दिया है और लेबनान में भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है, जिससे 20 लाख लोगों की जान खतरे में है.

भारत, जो अपनी 80% तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, बढ़ती कीमतों से गंभीर दबाव में है. हालांकि ईरान द्वारा दी गई छूट से कुछ राहत जरूर मिली है.

खाड़ी देशों के सपनों पर संकट

सऊदी अरब का 1 ट्रिलियन डॉलर का NEOM प्रोजेक्ट ठप पड़ गया है, जबकि यूएई का 200 अरब डॉलर का री-एक्सपोर्ट बिजनेस भी प्रभावित हुआ है. खाड़ी देशों के संप्रभु फंड अपने 400 अरब डॉलर के भंडार को बचाने में जुटे हैं.

लेखक- मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ मोहम्मद आरिफ खान.