'वियतनाम से यूक्रेन तक...' अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक लेकिन दोस्त होना घातक, यह बार-बार हुआ साबित

श्विक राजनीति में अमेरिका की भूमिका हमेशा बहस का विषय रही है. अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर का एक प्रसिद्ध कथन है कि "अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक है, लेकिन उसका दोस्त होना घातक है." हाल के वर्षों में अमेरिका की विदेश नीति के कई उदाहरण इस कथन को सही साबित करते नजर आते हैं.

From Vietnam to Ukraine Being Americas enemy is dangerous but being Americas friend is dangerous
डोनाल्ड ट्रम्प/Photo- ANI

वाशिंगटन: वैश्विक राजनीति में अमेरिका की भूमिका हमेशा बहस का विषय रही है. अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर का एक प्रसिद्ध कथन है कि "अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक है, लेकिन उसका दोस्त होना घातक है." हाल के वर्षों में अमेरिका की विदेश नीति के कई उदाहरण इस कथन को सही साबित करते नजर आते हैं. शुक्रवार को वाइट हाउस के ओवल ऑफिस में यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमीर जेलेंस्की को जिस अंदाज में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने बेइज्जत किया है, या यूं कहें जिस तरह से उन्हें औकात दिखाने की कोशिश की है, वो यही बताता है कि अमेरिका का दोस्त बनना घातक है.

इसमें कोई शक नहीं है कि नाटो की मदद के बिना यूक्रेन रूस के सामने शायद एक हफ्ते से भी ज्यादा नहीं ठहराता, लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका से सुरक्षा का भरोसा मिलने के बाद ही यूक्रेन ने अपने परमाणु हथियार रूस को सौंपे थे. वो रूस के प्रभाव से निकलकर अमेरिका के पाले में जाना चाहता था.

यूक्रेन: एक अधूरे वादे की कहानी

यूक्रेन और रूस के बीच जारी संघर्ष इसका एक प्रमुख उदाहरण है. नाटो में शामिल होने के अमेरिकी वादे और पश्चिमी समर्थन की उम्मीद में यूक्रेन ने अपने परमाणु हथियारों का त्याग किया था. लेकिन जब रूस ने आक्रमण किया, तो अमेरिका और उसके सहयोगी पूर्ण सैन्य सहायता देने से पीछे हट गए. आज, यूक्रेन युद्धग्रस्त देश बन चुका है, और उसे अब शांति वार्ता के लिए बाध्य किया जा रहा है. वाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी देते हुए जेलेंस्की से कहा कि यूक्रेन के पास जब तक अमेरिका है, तभी तक वो रूस के सामने खड़ा है. सिर्फ यूक्रेन ही क्यों कनाडा का ही हाल देख लीजिए, जिसपर डोनाल्ड ट्रंप ने भारी भरकम टैरिफ लगाने का ऐलान किया है. भारत कैसे ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम को भूल सकता है, जब अमेरिका ने कारगिल युद्ध के दौरान भारत की पीठ में चाकू भोंका था.

अमेरिकी नीतियों का शिकार देश

वियतनाम:

1960 और 70 के दशक में दक्षिण वियतनाम को अमेरिका ने समर्थन दिया, लेकिन अंततः इसे अपने हाल पर छोड़ दिया. जब अमेरिका ने सहयोग समाप्त किया, तो दक्षिण वियतनाम की सरकार गिर गई और पूरे देश पर कम्युनिस्ट शासन का नियंत्रण हो गया.

इराक और सद्दाम हुसैन:

कभी अमेरिका का सहयोगी रहे सद्दाम हुसैन को अमेरिका ने पहले ईरान के खिलाफ समर्थन दिया, लेकिन बाद में उन्हें तानाशाह बताकर इराक पर हमला किया और अंततः उन्हें सत्ता से हटा दिया गया. सद्दाम हुसैन को 2006 में फांसी दे दी गई, और इराक आज भी अस्थिरता से जूझ रहा है.

लीबिया और मुअम्मर गद्दाफी:

मुअम्मर गद्दाफी को भी अमेरिका ने पहले समर्थन दिया, लेकिन बाद में उन्हें हटाने के लिए सैन्य हस्तक्षेप किया गया. 2011 में गद्दाफी की निर्मम हत्या हुई और लीबिया आज भी अराजकता की स्थिति में है.

भारत का संतुलित दृष्टिकोण

भारत की विदेश नीति ने इस संदर्भ में संतुलन बनाए रखा है. अमेरिका के साथ साझेदारी होने के बावजूद, भारत ने रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखा और चीन के प्रति रणनीतिक रूप से तटस्थ रुख अपनाया. कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा जीपीएस ब्लॉक किए जाने की घटना ने भारत को आत्मनिर्भर बनने की सीख दी, जिसका परिणाम आज 'नाविक' सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली के रूप में देखा जा सकता है.

इतिहास गवाह है कि अमेरिका की विदेश नीति अवसरवादिता पर आधारित रही है. कई देशों के लिए, अमेरिका के साथ दोस्ती लाभदायक रही है, लेकिन जैसे ही परिस्थितियां बदलीं, अमेरिका ने अपना समर्थन वापस ले लिया. यह स्पष्ट करता है कि किसी भी राष्ट्र को अपनी सुरक्षा और संप्रभुता को बाहरी शक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए.

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