ढाका : कभी ‘गति’ की राह पर दौड़ता बांग्लादेश अब अपनी नीतियों के कारण खुद को ‘विकासविरोधी’ मोड़ पर खड़ा पा रहा है. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में जहां सहयोग, भरोसे और पड़ोसी समर्थन की अहम भूमिका होती है, वहीं बांग्लादेश आज उन मूल सिद्धांतों से दूर होता नजर आ रहा है. भारत के समर्थन की अनदेखी कर, मोहम्मद यूनुस जैसे नेताओं के फैसलों ने बांग्लादेश को उस दिशा में मोड़ दिया है जहां से वापसी कठिन होती जा रही है.
भारत विरोधी रवैया अपनाकर खुद के ही व्यापारिक हितों पर चोट
कोविड-19 की महामारी ने जब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लिया था, तब बांग्लादेश के पास सामान तो थे लेकिन दुनिया तक पहुंचाने के संसाधन नहीं थे. उस मुश्किल घड़ी में भारत ने बांग्लादेश के लिए अपने बंदरगाह, हवाई अड्डे और ट्रांजिट रूट खोल दिए थे. भारतीय धरती से होकर बांग्लादेशी वस्तुएं संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस जैसे बाजारों तक पहुंचीं, और इससे बांग्लादेश के रेडीमेड गारमेंट सेक्टर को बड़ी राहत मिली. कोलकाता और अन्य भारतीय पोर्ट्स का इस्तेमाल कर बांग्लादेशी उत्पादकों ने न केवल लागत घटाई, बल्कि समय और संसाधनों की भी बचत की.
लेकिन, आज जब बांग्लादेश को इस सहयोग की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब वह न केवल भारत की कूटनीतिक सद्भावना को नजरअंदाज कर रहा है, बल्कि यार्न आयात जैसे जरूरी क्षेत्रों में भारत विरोधी रवैया अपनाकर खुद के ही व्यापारिक हितों पर चोट कर रहा है. मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश का प्रशासन जिस तरह भारत के ‘चिकन नेक’ इलाके को लेकर भड़काऊ बयानबाज़ी कर रहा है, उसने भारत की रणनीतिक सहनशीलता को चुनौती दे दी है.
रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री को सबसे बड़ा झटका
भारत ने पहले कई अवसर दिए, यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी की प्रस्तावित बैंकॉक बैठक तक इंतज़ार भी किया, लेकिन जब रुख नहीं बदला गया, तो भारत ने वह कदम उठाया जिसकी चेतावनी पहले ही दी जा चुकी थी—बांग्लादेश के लिए ट्रांसशिपमेंट सुविधा को रोक देना. अब बांग्लादेश को अपनी वस्तुओं को पहले श्रीलंका, मालदीव या पाकिस्तान जैसे देशों के जरिए निर्यात करना पड़ेगा, जिससे माल की लागत बढ़ेगी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में वह पिछड़ जाएगा.
सबसे बड़ा झटका रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री को लगा है, जो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है. 85 प्रतिशत निर्यात इसी क्षेत्र से आता है और करीब 40 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है, जिनमें एक बड़ी संख्या महिलाओं की है, लेकिन अब जब भारत ने ट्रांजिट सपोर्ट वापस लिया है, तो गारमेंट इंडस्ट्री की लागत में सीधा असर पड़ा है. बेक्सिमको जैसे औद्योगिक पार्क में 170 फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं और 40,000 से ज्यादा नौकरियां चली गई हैं.
भारत के साथ मिलकर समाधान निकालना जरूरी
भारत से कपास और यार्न के आयात पर रोक लगाने के पीछे जो जिद दिखाई दे रही है, वह बांग्लादेश के व्यापारिक हितों से सीधा टकरा रही है. यार्न के लिए बांग्लादेश की भारत पर निर्भरता लगभग 95 प्रतिशत रही है. अब यदि बांग्लादेश को यह यार्न चीन जैसे देशों से खरीदना पड़े, तो ट्रांसपोर्टेशन की लागत और समय की वजह से गारमेंट की कीमतें इतनी बढ़ जाएंगी कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाएगा.
भारत की नीति स्पष्ट है—सहयोग के लिए हाथ हमेशा बढ़ा रहेगा, लेकिन संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों पर समझौता नहीं किया जाएगा. बांग्लादेश यदि अभी भी नहीं चेता, तो उसे आने वाले समय में आर्थिक मोर्चे पर और भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. यह वक्त है जब ढाका को अपने नीतिगत निर्णयों पर गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि जो दरवाज़े आज बंद हो रहे हैं, उन्हें कल दोबारा खोलना इतना आसान नहीं होगा.
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