Russia Ukraine War: रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग को लेकर अब एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है. रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने स्पष्ट कहा है कि मॉस्को यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के किसी भी प्रयास से पीछे नहीं हटेगा, लेकिन वह बातचीत के लिए दरवाजे बंद नहीं कर रहा है.
उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात की इच्छा जताते हुए कहा कि अगर दोनों देशों के बीच संवाद जारी रहता है, तो यह क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बेहतर होगा.
अमेरिका और रूस के बीच संभावित वार्ता
लावरोव ने कहा कि वह और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो यूक्रेन संकट और द्विपक्षीय संबंधों पर लगातार संवाद में हैं. उनके मुताबिक, दोनों के बीच फोन पर समय-समय पर बातचीत होती रहती है और ज़रूरत पड़ने पर आमने-सामने बैठक भी की जा सकती है. रूस के शीर्ष राजनयिक ने यह भी संकेत दिया कि बातचीत तभी आगे बढ़ सकती है जब वाशिंगटन “वास्तविकता को स्वीकार करे” और रूस की सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से ले.
इस बीच, क्रेमलिन ने पुष्टि की कि हाल ही में बुडापेस्ट में प्रस्तावित ट्रंप-पुतिन बैठक को इसलिए रद्द किया गया क्योंकि रूस अपने बुनियादी रुख से समझौता करने के लिए तैयार नहीं था. यह बैठक यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने के लिए संभावित “फ्रेमवर्क प्लान” पर चर्चा करने के लिए तय की गई थी.
पुतिन की शर्तें और रूस का दावा
लावरोव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की शर्तें अब भी वही हैं जो उन्होंने 2024 के मध्य में रखी थीं. रूस चाहता है कि यूक्रेन NATO (नाटो) में शामिल होने की अपनी योजना को स्थायी रूप से त्याग दे और विवादित इलाकों, डोनबास, खेरसोन, जपोरिजिया और लुहान्स्क से अपनी सेनाएँ पूरी तरह वापस बुला ले.
रूस वर्तमान में यूक्रेन के लगभग 19 प्रतिशत क्षेत्र पर कब्जा बनाए हुए है. इसमें क्रीमिया प्रायद्वीप, लगभग पूरा लुहान्स्क, 80% डोनेट्स्क, और दक्षिण के बड़े हिस्से शामिल हैं. मॉस्को का दावा है कि ये सभी इलाके “कानूनी रूप से” रूस के हिस्से हैं, जबकि यूक्रेन और पश्चिमी देश इसे पूरी तरह अस्वीकार करते हैं.
अलास्का समझौता और 2024 की वार्ताएं
लावरोव ने यह भी खुलासा किया कि पुतिन और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच अगस्त 2024 में हुए अलास्का शिखर सम्मेलन में कई अहम बिंदुओं पर सहमति बनी थी. उस समय ट्रंप प्रशासन के प्रतिनिधि स्टीव विटकॉफ ने रूस की कुछ सुरक्षा मांगों को मानने पर विचार किया था, जिनमें यूक्रेन की सैन्य गतिविधियों पर निगरानी घटाने और NATO विस्तार पर रोक शामिल थी.
हालांकि, उसके बाद बुडापेस्ट में तय दूसरी बैठक अचानक रद्द कर दी गई, जिससे दोनों देशों के बीच संवाद की गति थम गई. अब लावरोव का बयान इस बात का संकेत देता है कि रूस बातचीत के दरवाजे को पूरी तरह बंद नहीं करना चाहता, लेकिन किसी “एकतरफा समझौते” के लिए भी तैयार नहीं है.
यूक्रेन की स्थिति और पश्चिमी समर्थन
यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने हाल के महीनों में संकेत दिए हैं कि वह कुछ क्षेत्रों को “अस्थायी रूप से विवादित” मानने पर विचार कर सकते हैं, लेकिन किसी स्थायी रियायत के पक्ष में नहीं हैं. कीव का कहना है कि रूस द्वारा कब्जाए गए सभी क्षेत्रों को “पूर्ण रूप से वापस” लेना ही युद्ध समाप्ति की एकमात्र शर्त होगी.
वहीं, पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका और यूरोपीय संघ, यूक्रेन को आर्थिक और सैन्य मदद जारी रखे हुए हैं. हालांकि, रूस का दावा है कि इस तरह का समर्थन शांति प्रक्रिया को कमजोर करता है और युद्ध को और लंबा खींचने का काम कर रहा है.
यूरोप की जमी हुई संपत्तियों पर विवाद
लावरोव ने यूरोपीय देशों को चेतावनी दी है कि अगर रूस की जमी हुई संपत्तियों का उपयोग यूक्रेन की मदद के लिए किया गया, तो मॉस्को इसका “सख्त जवाब” देगा. यूरोपियन यूनियन इस समय लगभग 210 अरब यूरो की रूसी संपत्तियों को होल्ड कर रही है और इस फंड को यूक्रेन के पुनर्निर्माण में लगाने की योजना पर विचार कर रही है.
लावरोव ने इसे “अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन” बताया और कहा कि इस तरह का कोई कदम रूस को जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर करेगा. उन्होंने कहा, “अगर हमारी संपत्ति को जब्त किया गया, तो हम भी पश्चिमी संपत्तियों पर वैसा ही कदम उठाने में हिचकिचाएंगे नहीं.”
न्यू START समझौते पर असमंजस
बातचीत के दौरान लावरोव ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका रूस को New START परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते की सीमाओं को 2026 के बाद भी बनाए रखने पर राजी करने की कोशिश कर रहा है. यह समझौता अमेरिका और रूस के बीच रणनीतिक परमाणु हथियारों की सीमा तय करता है, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद से दोनों देशों के संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं.
रूस ने हाल ही में इस समझौते के कुछ हिस्सों से खुद को “निलंबित” कर लिया था, यह कहते हुए कि वाशिंगटन ने “असमान व्यवहार” किया है. अब अगर दोनों देशों के बीच संवाद बहाल होता है, तो संभव है कि इस समझौते को बचाने की कोशिश की जाए.
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