अफगानिस्तान के बगराम एयर बेस को पूरी तरह छोड़ने के बाद अमेरिका फिर से इसे पाने के लिए बेचैन हो गया है. अमेरिका, जो 2021 में बगराम छोड़ चुका था, फिर से इस एयरबेस को हासिल करने के लिए बेचैन है. लेकिन सवाल यह है कि चार साल बाद अमेरिका को अचानक इसकी ज़रूरत क्यों महसूस हो रही है? आखिर बगराम में ऐसा क्या है जो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत इसे फिर से अपने कब्ज़े में लेना चाहती है?
बगराम एयरबेस, अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से कुछ ही दूरी पर स्थित है और यह कभी अमेरिका का सबसे बड़ा और सबसे ताकतवर विदेशी सैन्य अड्डा था.
20 वर्षों तक अमेरिका का नियंत्रण
लगभग 20 वर्षों तक अमेरिका यहां डटा रहा. इसके विशाल क्षेत्र में रनवे से लेकर एयर ट्रैफिक टावर, मेडिकल सेंटर और एक बेहद कुख्यात जेल तक सब कुछ था. यह वही जगह थी जहां से अमेरिका ने "आतंक के खिलाफ युद्ध" को अंजाम दिया. लेकिन 2021 में बाइडेन प्रशासन ने अमेरिका की सेना को अफगानिस्तान से पूरी तरह हटा लिया और तालिबान ने वापसी कर बगराम को फिर से अपने नियंत्रण में ले लिया.
अब ट्रंप फिर से इस बेस को पाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन तालिबान ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है. ऐसे में अमेरिका के पास पाकिस्तान से लेकर अन्य मध्य एशियाई देशों तक अपने पुराने संबंधों को फिर से टटोलने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा.
अमेरिका की बेचैनी के पीछे छिपा है बड़ा एजेंडा
अमेरिका की बगराम वापसी की कोशिश सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं है. इसके पीछे कई परतें हैं. सबसे पहली और अहम बात यह है कि मध्य एशिया में अब अमेरिका की कोई स्थायी सैन्य मौजूदगी नहीं है. जब वह अफगानिस्तान में था, तब चीन, रूस, ईरान और यहां तक कि भारत तक पर उसका कड़ा नजरिया बना रहता था.
लेकिन अब चीज़ें बदल चुकी हैं. चीन सुपरपावर की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है, भारत ने भी अपनी सैन्य ताकत और कूटनीतिक स्वतंत्रता का परिचय दे दिया है. अमेरिका पर दबाव है कि वह एशिया में अपनी मौजूदगी फिर से मज़बूत करे.
बगराम एयरबेस, एक ऐसी जगह है जो चीन के परमाणु ठिकानों के बेहद करीब है. ट्रंप का तर्क साफ है- अगर अमेरिका बगराम पर फिर से काबिज होता है, तो वह चीन पर सीधी निगरानी रख सकेगा. इसके साथ ही ईरान, पाकिस्तान और भारत जैसे देशों की गतिविधियों पर भी अमेरिकी नजर बनी रहेगी.
अफगानिस्तान और पाकिस्तान: फिर से पुराने मोहरे?
बगराम की चाह में अमेरिका ने सिर्फ तालिबान से नहीं, पाकिस्तान से भी संपर्क साधा है. ट्रंप और उनके रणनीतिकार पाकिस्तान के पुराने सैन्य अड्डों जैसे शम्सी और शाहबाज एयरबेस को फिर से इस्तेमाल में लाना चाहते हैं.
पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर से हाल के दिनों में अमेरिकी कूटनीतिज्ञों ने संपर्क बढ़ाया है. हालांकि, पाकिस्तान ने अभी तक कोई साफ जवाब नहीं दिया है, लेकिन अमेरिका वहां भी "डिप्लोमैटिक पुचकार" की नीति अपना रहा है.
अतीत में अमेरिका ने पाकिस्तान के इन एयरबेस से ड्रोन हमले, ऑपरेशन और खुफिया अभियानों को अंजाम दिया था. ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद दोनों देशों के रिश्तों में खटास आ गई थी और पाकिस्तान ने अमेरिका को वहां से निकाल दिया था. लेकिन अब अमेरिका फिर से वैसा ही अवसर खोज रहा है.
ट्रंप की रणनीति: एक घंटे की दूरी पर चीन
डोनाल्ड ट्रंप बगराम एयरबेस को फिर से हासिल करना इसलिए भी जरूरी मानते हैं क्योंकि यह चीन के परमाणु मिसाइल निर्माण क्षेत्रों से सिर्फ एक घंटे की दूरी पर स्थित है. यानी अगर अमेरिका यहां मौजूद होता है, तो वह हर उस गतिविधि पर नजर रख सकता है जो चीन चुपचाप अपने सामरिक विस्तार के लिए कर रहा है.
ट्रंप बार-बार यह कह चुके हैं कि बगराम छोड़ना एक "गंभीर रणनीतिक गलती" थी और उन्हें अफसोस है कि इसे पहले ही क्यों खाली किया गया.
क्या अफगानिस्तान के खनिज संसाधन भी हैं वजह?
बगराम एयरबेस को वापस पाने की एक और गहरी वजह है- अफगानिस्तान के खनिज संसाधन. ट्रंप के सलाहकारों का मानना है कि इस एयरबेस से अमेरिका सिर्फ सुरक्षा ही नहीं, बल्कि अफगानिस्तान के मूल्यवान खनिजों तक भी पहुंच बना सकता है. अफगानिस्तान में लिथियम, तांबा, कोबाल्ट और अन्य दुर्लभ खनिजों की भरमार है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और आधुनिक हथियारों के लिए बेहद जरूरी हैं.
ऐसे में अगर अमेरिका बगराम पर वापसी करता है, तो वह न सिर्फ सामरिक बल्कि आर्थिक रूप से भी मजबूत पकड़ बना सकता है.
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