F-35 को ठुकराया, NATO सदस्यता भी छोड़ी... बाकी देशों की तरह अमेरिका के सामने क्यों नहीं झुका फ्रांस?

जहां बाकी यूरोपीय देश अमेरिका की बात आंख मूंदकर मानते हैं, वहीं फ्रांस ने अमेरिका के F-35 स्टील्थ फाइटर जेट के ऑफर को भी ठुकरा दिया और अपना राफेल बना कर यह दिखा दिया कि वह किसी पर निर्भर नहीं है.

Why did France not bow to America like other countries
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आज जब दुनिया की बड़ी ताकतें एक-दूसरे पर निर्भर होती जा रही हैं, तब भी कुछ देश अपनी स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ खड़े नजर आते हैं. उनमें से एक है फ्रांस. एक ऐसा देश जिसने दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के सामने सिर झुकाने से साफ इनकार कर दिया. जहां बाकी यूरोपीय देश अमेरिका की बात आंख मूंदकर मानते हैं, वहीं फ्रांस ने अमेरिका के F-35 स्टील्थ फाइटर जेट के ऑफर को भी ठुकरा दिया और अपना राफेल बना कर यह दिखा दिया कि वह किसी पर निर्भर नहीं है.

अमेरिका का दोस्त, लेकिन गुलाम नहीं है फ्रांस

फ्रांस और अमेरिका के रिश्ते हमेशा जटिल रहे हैं. दोनों NATO (नाटो) के सदस्य हैं, कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर साथ खड़े होते हैं, लेकिन फिर भी फ्रांस ने कभी अमेरिका को अपने फैसलों पर हावी नहीं होने दिया. जहां कई यूरोपीय देश अमेरिकी सुरक्षा और सैन्य ताकत के भरोसे जीते हैं, वहीं फ्रांस अपनी स्वतंत्र रक्षा नीति पर डटा रहा है.

फ्रांस का मानना है कि राष्ट्रीय संप्रभुता सबसे ऊपर है, और इसके लिए अगर किसी बड़े देश को भी मना करना पड़े, तो वह पीछे नहीं हटेगा. यही वजह है कि अमेरिका के लाख चाहने के बावजूद फ्रांस ने उसके लड़ाकू विमान नहीं खरीदे.

F-35 का इनकार: स्वाभिमान की उड़ान

अमेरिका का F-35 फाइटर जेट दुनिया का सबसे उन्नत स्टेल्थ लड़ाकू विमान माना जाता है. कई देशों ने इसे खरीदा भी, लेकिन फ्रांस ने साफ शब्दों में कहा, "हमें इसकी जरूरत नहीं है."

फ्रांस ने न केवल F-35 को खरीदा नहीं, बल्कि अपना खुद का लड़ाकू विमान राफेल विकसित किया, जो आज दुनिया भर में चर्चा का विषय है. भारत, मिस्र, ग्रीस और कई देशों ने इसे खरीदा है. F-35 के मुकाबले राफेल ने खुद को युद्धभूमि में ज्यादा भरोसेमंद साबित किया है.

अपनी ताकत, अपने हथियार

फ्रांस ने दूसरे देशों की तरह अमेरिका पर निर्भर रहने की जगह घरेलू रक्षा और एयरोस्पेस उद्योग में निवेश किया. डसॉल्ट एविएशन जैसी कंपनियों ने मिराज से लेकर राफेल तक शानदार विमान बनाए हैं.

इसका एक बड़ा फायदा यह हुआ कि फ्रांस को अपने रक्षा उपकरणों और तकनीक पर पूरी तरह नियंत्रण मिला. जबकि F-35 जैसे अमेरिकी विमानों में सारा कंट्रोल अमेरिका के पास होता है सॉफ्टवेयर, डेटा, मेंटेनेंस सब कुछ. अमेरिका जब चाहे, उसकी सप्लाई रोक सकता है, लेकिन राफेल पर ऐसा कोई विदेशी नियंत्रण नहीं है.

परमाणु ताकत भी पूरी तरह स्वतंत्र

ब्रिटेन जैसा देश, जिसे दुनिया की बड़ी ताकतों में गिना जाता है, अगर उसे अपने परमाणु हथियार का इस्तेमाल करना हो तो उसे पहले अमेरिका को फोन करना पड़ता है. लेकिन फ्रांस ऐसा नहीं करता. फ्रांस की परमाणु नीति पूरी तरह स्वतंत्र है.

उसके परमाणु बम, मिसाइलें, सब कुछ फ्रांसीसी नियंत्रण में हैं. यही नहीं, फ्रांस ने कई बार यूरोपीय देशों को “फ्रांसीसी परमाणु छतरी” के नीचे आने का ऑफर दिया है, ताकि यूरोप अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भर न रहे.

नाटो से भी लिया था ब्रेक

आज भले ही फ्रांस NATO में फिर से एक्टिव हो गया हो, लेकिन 1966 में राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल ने फ्रांस को NATO की इंटीग्रेटेड मिलिट्री कमांड से बाहर निकाल लिया था. उनका कहना था कि NATO पर अमेरिका का दबदबा है, और इससे फ्रांस की संप्रभुता खतरे में पड़ सकती है.

यह एक साहसिक फैसला था, जिसने फ्रांस की स्वतंत्र विदेश और रक्षा नीति की नींव रखी. बाद में 2009 में राष्ट्रपति निकोलस सार्कोज़ी के समय फ्रांस फिर से NATO की सैन्य संरचना में लौटा, लेकिन तब तक फ्रांस ने अपनी खुद की सैन्य रीढ़ मजबूत कर ली थी.

छठी पीढ़ी का फाइटर जेट

आज जब दुनिया पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों पर गर्व कर रही है, फ्रांस छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान बनाने की दिशा में आगे बढ़ चुका है. वह FCAS (Future Combat Air System) प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसमें जर्मनी और स्पेन भी शामिल हैं.

हालांकि इस प्रोजेक्ट में मतभेद हैं. फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन चाहती है कि नेतृत्व फ्रांस के पास हो, जबकि जर्मनी और स्पेन की एयरबस कंपनी बराबरी की साझेदारी की बात करती है. अगर ये मतभेद बढ़ते हैं, तो फ्रांस के पास इतना सामर्थ्य है कि वह अकेले भी छठी पीढ़ी का फाइटर जेट बना सकता है.

आर्थिक आत्मनिर्भरता भी है वजह

फ्रांस का रक्षा और एयरोस्पेस उद्योग सिर्फ सुरक्षा से नहीं जुड़ा, बल्कि ये हजारों लोगों को रोजगार भी देता है और अरबों यूरो की कमाई भी. अगर फ्रांस अमेरिकी विमान खरीदने लगे, तो उसकी घरेलू इंडस्ट्री को गहरा नुकसान पहुंचेगा. यही वजह है कि फ्रांस अपने ही विमानों को प्रमोट करता है और दूसरे देशों को भी बेचता है.

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