मुस्‍ल‍िम तो ऐसा नहीं करते... ईरान की मस्‍ज‍िदों में क‍िसने लगाई आग, क्या यह 'फॉल्स फ्लैग' ऑपरेशन?

जब ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन तेज हुए, तो विरोध की आग केवल सड़कों और सरकारी इमारतों तक सीमित नहीं रही.

Who set fire to Iran mosques and madrassas False Flag operation
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जब ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन तेज हुए, तो विरोध की आग केवल सड़कों और सरकारी इमारतों तक सीमित नहीं रही. धीरे-धीरे इसकी लपटें उन स्थानों तक भी पहुंचीं, जिन्हें इस्लाम में सबसे पवित्र माना जाता है. मस्जिदों में आग लगने लगी, मदरसों को नुकसान पहुंचाया गया और कई धार्मिक इमारतें जलती नजर आईं. इसने न केवल ईरान बल्कि पूरी मुस्लिम दुनिया को चौंका दिया.

एक मुस्लिम बहुल देश, जहां धर्म जीवन का अभिन्न हिस्सा है और जहां लोग अपने विश्वास के लिए जान देने को तैयार रहते हैं, वहां “अल्लाह के घर” पर हमला कैसे हो सकता है? आम सोच यही कहती है कि कोई सच्चा मुसलमान ऐसा नहीं कर सकता. फिर सवाल उठता है कि आखिर ये लोग कौन हैं? क्या यह विदेशी साजिश है, जैसा कि ईरानी सरकार दावा कर रही है, या फिर इसके पीछे कोई गहरी सामाजिक-राजनीतिक वजह है?

सरकार का सीधा आरोप: भाड़े के आतंकी

बीबीसी फारसी की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की सत्ता का रुख इस मुद्दे पर बिल्कुल स्पष्ट है. जैसे ही मस्जिदों और मदरसों में आगजनी की खबरें सामने आईं, सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई से लेकर राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन तक, सभी ने इसे विदेशी साजिश करार दिया.

खामेनेई ने देश को संबोधित करते हुए दावा किया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान करीब 250 मस्जिदों को नुकसान पहुंचाया गया. उन्होंने इन घटनाओं के पीछे “दुष्ट और प्रशिक्षित तत्वों” का हाथ बताया, जो कथित तौर पर भोले-भाले प्रदर्शनकारियों को गुमराह कर रहे थे. सरकार की भाषा में ये लोग प्रदर्शनकारी नहीं बल्कि ऐसे भाड़े के लड़ाके हैं, जिनका मकसद देश की स्थिरता और धार्मिक पहचान को नुकसान पहुंचाना है.

राष्ट्रपति और सरकारी मीडिया की भूमिका

राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने भी टेलीविजन संबोधन में यही रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि मस्जिदों को जलाने वाले तत्व देश और विदेश से संचालित आतंकवादी नेटवर्क का हिस्सा हैं. सरकारी मीडिया ने तेहरान की इमाम सादेक मस्जिद और अबू जर मस्जिद की जली हुई तस्वीरें दिखाते हुए सीधा आरोप इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद पर मढ़ दिया.

सरकार का तर्क सरल है- चूंकि कोई ईरानी मुसलमान मस्जिद नहीं जला सकता, इसलिए यह काम बाहरी दुश्मनों का ही हो सकता है.

संदेह की सुई: क्या यह कहानी पूरी है?

लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है. ईरान में सख्त सेंसरशिप और इंटरनेट बंदी के कारण इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि करना लगभग असंभव है. मानवाधिकार संगठनों और कई विश्लेषकों को सरकार के आंकड़ों और दावों पर भरोसा नहीं है.

फ्रांस के लोरेन विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री सईद पेयवंडी इतिहास का हवाला देते हुए कहते हैं कि ईरान में ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं, जहां किसी हिंसक घटना का दोष विपक्ष पर मढ़ा गया, लेकिन बाद में सच्चाई कुछ और निकली.

वे 1994 के मशहद बम विस्फोट का उदाहरण देते हैं, जिसमें आठवें शिया इमाम के मकबरे को निशाना बनाया गया था. उस समय सरकार ने तुरंत इसका दोष विपक्षी संगठन एमईके पर डाल दिया था. वर्षों बाद यह सामने आया कि इस घटना के तार खुद सुरक्षा तंत्र के भीतर से जुड़े हुए थे, ताकि विपक्ष को कुचलने का बहाना मिल सके.

‘फॉल्स फ्लैग’ की आशंका क्यों?

इस संदेह को और बल मिलता है ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के एक वायरल वीडियो से. 2021 के इस क्लिप में वे यह स्वीकार करते नजर आते हैं कि कई बार “सादे कपड़ों में मौजूद सुरक्षा बल” ही हिंसा फैलाते हैं, सार्वजनिक संपत्ति जलाते हैं और हालात बिगाड़ते हैं, ताकि पुलिस और सेना को कठोर कार्रवाई का बहाना मिल सके.

इसी वजह से सवाल उठता है कि क्या मस्जिदों के जलने की घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है ताकि सरकार को सहानुभूति मिले और विपक्ष को “धर्म-विरोधी” साबित किया जा सके?

अगर हमले प्रदर्शनकारियों ने किए, तो वजह क्या?

मान लें कि कुछ मामलों में मस्जिदों पर हमले प्रदर्शनकारियों द्वारा किए गए हों, तो क्या इसका मतलब यह है कि वे इस्लाम के विरोधी हैं? अधिकांश विशेषज्ञ इसका जवाब ‘न’ में देते हैं.

फ्रांसीसी शोधकर्ता अलीरेज़ा मनाफजादेह के अनुसार, यह हमला धर्म पर नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर चल रही सत्ता पर है. उनका कहना है कि पिछले चार दशकों में ईरान में मस्जिदों की भूमिका पूरी तरह बदल चुकी है.

मस्जिदें अब इबादतगाह नहीं, सत्ता का औजार?

ईरान की कई मस्जिदें अब केवल नमाज पढ़ने की जगह नहीं रहीं. वे बासिज नामक अर्धसैनिक बलों के ठिकानों में बदल गई हैं. यही बासिज बल सड़कों पर प्रदर्शनकारियों को कुचलने, गिरफ्तार करने और कई मामलों में गोली चलाने के लिए कुख्यात है.

2023 की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि महसा अमीनी आंदोलन के दौरान कुछ मस्जिदों को गुप्त हिरासत केंद्रों के रूप में इस्तेमाल किया गया. मशहद और अन्य शहरों में प्रदर्शनकारियों को मस्जिदों के तहखानों में बंद रखा गया और उनके साथ अत्याचार किए गए.

जब किसी पवित्र स्थान का इस्तेमाल लोगों को डराने, पीटने और कैद करने के लिए होने लगे, तो आम जनता की नजर में उसकी पहचान बदल जाती है. वह “अल्लाह का घर” कम और “सरकारी चौकी” ज्यादा लगने लगता है.

1979 से पहले और बाद का फर्क

इस बदलाव को समझने के लिए 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले का ईरान देखना जरूरी है. शाह के शासन के दौरान भी मस्जिदें थीं, लेकिन वे कभी जनता के गुस्से का निशाना नहीं बनीं. उस दौर में मस्जिदें सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का केंद्र थीं. यहां तक कि वामपंथी और नास्तिक भी मस्जिदों में शरण लेते थे, क्योंकि शाह की पुलिस वहां घुसने से बचती थी.

लेकिन इस्लामी क्रांति के बाद हालात पलट गए. धर्म सत्ता में आ गया, मस्जिदें सरकार के नियंत्रण में चली गईं, इमाम सरकारी नियुक्ति बनने लगे और शुक्रवार की नमाज राजनीतिक भाषण का मंच बन गई.

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