गोवर्धन पूजा 2025: जानिए कब है यह पर्व, क्या है महत्व और क्या रहेगा शुभ मुहूर्त

दिवाली के बाद का दिन हिन्दू धर्म में एक और विशेष पर्व लेकर आता है. गोवर्धन पूजा. यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक लीला से जुड़ा हुआ है, जिसे हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है.

When goverdhan puja will celebrate know date and timing
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दिवाली के बाद का दिन हिन्दू धर्म में एक और विशेष पर्व लेकर आता है. गोवर्धन पूजा. यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक लीला से जुड़ा हुआ है, जिसे हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. इस दिन विशेष रूप से गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है और भगवान को छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं. साथ ही, गायों की सेवा करना और उन्हें चारा खिलाना इस दिन का एक अहम हिस्सा होता है.


2025 में गोवर्धन पूजा को लेकर लोगों के मन में थोड़ा भ्रम बना हुआ है क्योंकि यह पर्व आमतौर पर दिवाली के ठीक अगले दिन मनाया जाता है. हालांकि, पंचांग के अनुसार गोवर्धन पूजा 22 अक्टूबर 2025 (बुधवार) को मनाई जाएगी. इस वर्ष कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 21 अक्टूबर की शाम 5 बजकर 57 मिनट पर हो रही है और यह तिथि 22 अक्टूबर की रात 8 बजकर 18 मिनट तक रहेगी. हिंदू परंपरा में उदयातिथि को मान्यता दी जाती है, यानी जिस तिथि का सूर्योदय होता है, उसी दिन त्योहार मनाया जाता है. इसी आधार पर गोवर्धन पूजा 22 अक्टूबर को मनाई जाएगी.

गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त

पूजा करने के लिए सबसे उपयुक्त समय का निर्धारण करना बहुत जरूरी होता है, खासकर जब पर्व विशेष धार्मिक महत्व रखता हो. गोवर्धन पूजा के दिन दो मुख्य मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे. सुबह का पूजन मुहूर्त 6:26 बजे से शुरू होकर 8:48 बजे तक चलेगा, जो कुल मिलाकर 2 घंटे 22 मिनट का होगा. वहीं दोपहर का दूसरा मुहूर्त 3:29 बजे से शाम 5:44 बजे तक रहेगा, जिसकी कुल अवधि 2 घंटे 15 मिनट की होगी. इन दोनों में से किसी भी समय पूजा की जा सकती है, लेकिन प्रात: कालीन पूजा को अधिक शुभ माना गया है.

पर्व के पीछे की पौराणिक कथा और महत्व

गोवर्धन पूजा का मूल आधार श्रीकृष्ण द्वारा की गई वह दिव्य लीला है, जब उन्होंने इंद्रदेव के प्रकोप से ब्रजवासियों और गायों को बचाने के लिए अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया था. लगातार सात दिन और रात तक वर्षा से ब्रज को बचाते हुए भगवान कृष्ण ने यह संदेश दिया कि प्रकृति, पशु और मानव एक-दूसरे के पूरक हैं. इसी स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है. लोग गायों की विशेष पूजा करते हैं, उन्हें सजाते हैं और गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक आकृति बनाकर भगवान को छप्पन भोग अर्पित करते हैं. यह पूजा भगवान कृष्ण की वात्सल्य और करुणा की भावना को समर्पित होती है.

प्रकृति और धर्म का सुंदर संगम

गोवर्धन पूजा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण का प्रतीक भी है. यह त्योहार हमें यह सिखाता है कि प्रकृति की शक्तियों का सम्मान करना, जीव-जंतुओं के साथ सह-अस्तित्व में जीना और धरती के संसाधनों का संतुलित उपयोग करना ही सच्चा धर्म है.इस दिन लोग ना केवल पूजा करते हैं, बल्कि दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता को भी खास महत्व देते हैं. घरों में प्रसाद बनाया जाता है, पूजा के बाद भोग बांटा जाता है और आपसी मेलजोल का वातावरण बनता है.

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