पालक पनीर के कारण हुआ भेदभाव, तो कोर्ट पहुंचा ये कपल; अब जीता 1.8 करोड़ रुपये का केस

Palak paneer Discrimination Case: अमेरिका में पढ़ाई का सपना लेकर जाने वाले हजारों भारतीय छात्रों के लिए यह कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि चेतावनी और हिम्मत, दोनों है. यूनिवर्सिटी कैंपस में माइक्रोवेव में गरम किया गया पालक पनीर कब नस्लीय भेदभाव और कानूनी लड़ाई का प्रतीक बन जाएगा, शायद किसी ने नहीं सोचा था. 

viral America couple went to court faced discrimination because of Palak Paneer won a case Rs 1.8 crore
प्रतिकात्मक तस्वीर/ FreePik

Palak paneer Discrimination Case: अमेरिका में पढ़ाई का सपना लेकर जाने वाले हजारों भारतीय छात्रों के लिए यह कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि चेतावनी और हिम्मत, दोनों है. यूनिवर्सिटी कैंपस में माइक्रोवेव में गरम किया गया पालक पनीर कब नस्लीय भेदभाव और कानूनी लड़ाई का प्रतीक बन जाएगा, शायद किसी ने नहीं सोचा था. 

लेकिन यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर में पढ़ रहे एक भारतीय कपल के साथ ठीक यही हुआ. इस मामले ने न सिर्फ सोशल मीडिया पर बहस छेड़ी, बल्कि अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था में मौजूद सिस्टमेटिक बायस पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए.

एक सामान्य दिन, जिसने जिंदगी की दिशा बदल दी

यह घटना 5 सितंबर 2023 की है. यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपोलॉजी डिपार्टमेंट में पीएचडी कर रहे आदित्य प्रकाश (34) ने कैंपस की साझा माइक्रोवेव में अपना लंच गरम किया. लंच था, पालक पनीर. आदित्य के मुताबिक, तभी एक महिला स्टाफ सदस्य उनके पास आई और खाने की “तेज बदबू” की शिकायत करते हुए उन्हें माइक्रोवेव का इस्तेमाल न करने को कहा. आदित्य ने इसका विरोध किया और कहा कि यह साझा सुविधा है, जिस पर सभी का बराबर अधिकार है. यहीं से एक साधारण सी बात ने गंभीर विवाद का रूप ले लिया.

“मेरा खाना मेरी पहचान है”

आदित्य प्रकाश ने बाद में साफ शब्दों में कहा कि किसी खाने की खुशबू अच्छी या बुरी लगना पूरी तरह सांस्कृतिक नजरिए पर निर्भर करता है. उन्होंने सवाल उठाया कि जब ब्रोकली या दूसरे पश्चिमी खाद्य पदार्थों की गंध पर कोई आपत्ति नहीं होती, तो भारतीय खाने पर ही आपत्ति क्यों?

उनके मुताबिक, यह सिर्फ खाने की बात नहीं थी, बल्कि उस सोच की थी, जो गैर-पश्चिमी संस्कृतियों को “अस्वीकार्य” मानती है. यही सवाल यूनिवर्सिटी प्रशासन को नागवार गुजरा.

विरोध के बाद शुरू हुआ संस्थागत दबाव

इस पूरे विवाद में आदित्य की पार्टनर उर्मी भट्टाचार्य (35) भी खुलकर उनके समर्थन में आईं. इसके बाद दोनों का आरोप है कि उनके खिलाफ सुनियोजित कार्रवाई शुरू हो गई. आदित्य को बार-बार सीनियर फैकल्टी की बैठकों में बुलाया गया और कहा गया कि उन्होंने स्टाफ सदस्य को असुरक्षित महसूस कराया. वहीं उर्मी को बिना किसी ठोस कारण के उनकी टीचिंग असिस्टेंट की नौकरी से हटा दिया गया. दोनों का कहना है कि यह सब उन्हें चुप कराने और डराने की कोशिश थी.

डिग्री रोकी गई, तब खटखटाया अदालत का दरवाजा

मामला यहीं नहीं रुका. आदित्य और उर्मी का आरोप है कि यूनिवर्सिटी ने उन्हें वह मास्टर डिग्री देने से भी इनकार कर दिया, जो आमतौर पर पीएचडी के दौरान छात्रों को मिलती है. इसके बाद दोनों ने कोलोराडो की अमेरिकी जिला अदालत में मुकदमा दायर किया. याचिका में कहा गया कि भारतीय खाने पर आपत्ति दरअसल अंतरराष्ट्रीय छात्रों के खिलाफ गहरे और संरचनात्मक भेदभाव का उदाहरण है.

लंबी लड़ाई के बाद मिली कानूनी जीत

कानूनी प्रक्रिया के बाद सितंबर 2025 में यूनिवर्सिटी ने 2 लाख डॉलर (करीब 1.8 करोड़ रुपये) का सेटलमेंट किया. इसके तहत आदित्य और उर्मी को उनकी मास्टर डिग्री दी गई. हालांकि, समझौते की शर्तों के अनुसार उन्हें भविष्य में यूनिवर्सिटी में पढ़ाई या नौकरी करने की अनुमति नहीं दी गई. यह जीत सिर्फ आर्थिक नहीं थी, बल्कि एक बड़े सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने की जीत थी.

“यह लड़ाई खाने की नहीं, पहचान की थी”

हाल ही में उर्मी भट्टाचार्य ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट के जरिए इस जीत की जानकारी दी. उन्होंने लिखा कि यह लड़ाई सिर्फ पालक पनीर की खुशबू की नहीं थी, बल्कि अपनी पहचान, सम्मान और बोलने की आज़ादी की थी. उन्होंने यह भी कहा कि वह अन्याय के सामने न झुकी हैं और न ही चुप रहेंगी.

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