यूपी में SIR पहला चरण पूरा, 2.89 करोड़ लोगों के कटे नाम; जानें कब तक आएगा फाइनल ड्राफ्ट

Uttar Pradesh SIR: उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर बड़ी तस्वीर अब लगभग साफ हो चुकी है. इस प्रक्रिया के दौरान राज्य में कुल 2.89 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, जबकि पिछले 14 दिनों में केवल करीब 2 लाख नए नाम ही जोड़े जा सके.

Uttar Pradesh SIR first phase completed names of 2.89 crore people deleted final draft
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Uttar Pradesh SIR: उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर बड़ी तस्वीर अब लगभग साफ हो चुकी है. इस प्रक्रिया के दौरान राज्य में कुल 2.89 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, जबकि पिछले 14 दिनों में केवल करीब 2 लाख नए नाम ही जोड़े जा सके. चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि अब SIR प्रक्रिया की समयसीमा में किसी तरह का और विस्तार नहीं किया जाएगा. 31 दिसंबर को मतदाता सूची का फाइनल ड्राफ्ट जारी किया जाएगा, जिसे अंतिम माना जाएगा.

SIR के आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे अधिक असर राजधानी लखनऊ और गाजियाबाद में देखने को मिला है. कुल हटाए गए नामों में लगभग 30 प्रतिशत नाम सिर्फ इन दो जिलों से हैं. यानी हर तीन में से एक नाम लखनऊ और गाजियाबाद से काटा गया. इससे इन इलाकों में मतदाता संख्या में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. फॉर्म भरने की अंतिम समयसीमा 26 दिसंबर की रात 12 बजे तय की गई थी, जिसके बाद किसी भी नए दावे या आपत्ति को स्वीकार नहीं किया गया.

यूपी में क्यों बढ़ाई गई थी समयसीमा

उत्तर प्रदेश में SIR की एन्यूमरेशन अवधि पहले 11 दिसंबर 2025 तक निर्धारित थी और ड्राफ्ट मतदाता सूची 16 दिसंबर को जारी होनी थी. हालांकि, बाद में चुनाव आयोग ने प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए एन्यूमरेशन की समयसीमा 26 दिसंबर 2025 तक कर दी. यह फैसला सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं था. आयोग ने छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR प्रक्रिया को 14 दिनों के लिए बढ़ाने का निर्णय लिया था, ताकि अधिक से अधिक लोग अपने दस्तावेज जमा कर सकें और सूची में नाम जुड़वा सकें.

1 नवंबर 2025 से शुरू हुई थी SIR प्रक्रिया

विशेष गहन पुनरीक्षण की यह प्रक्रिया 1 नवंबर 2025 से शुरू हुई थी. चुनाव आयोग के अनुसार, कई राज्यों में मतदाता सूची का आखिरी बड़ा गहन पुनरीक्षण 2002 से 2004 के बीच हुआ था. इतने लंबे अंतराल के बाद कराई जा रही इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और जन्मस्थान व नागरिकता की जांच के जरिए अवैध विदेशी प्रवासियों के नाम हटाना था. आयोग का कहना है कि साफ और पारदर्शी वोटर लिस्ट लोकतंत्र की बुनियाद है.

अन्य राज्यों में भी बड़े पैमाने पर नाम हटे

उत्तर प्रदेश के अलावा कई अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी SIR के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. पश्चिम बंगाल में 58 लाख से ज्यादा नाम सूची से बाहर किए गए, जबकि तमिलनाडु में यह आंकड़ा 97 लाख से भी अधिक रहा. गुजरात में करीब 73 लाख, राजस्थान में 41 लाख और मध्य प्रदेश में 42 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए. केरल में 24 लाख, छत्तीसगढ़ में 27 लाख और बिहार से बाहर के अन्य राज्यों जैसे गोवा, पुडुचेरी, लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार में भी हजारों नाम काटे गए. इन आंकड़ों से साफ है कि SIR का असर देशभर में व्यापक रहा है.

SIR को लेकर सियासी घमासान

SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद भी लगातार गहराता गया. विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया की वजह से हाशिए पर पड़े समुदायों और कमजोर वर्गों को उनके मताधिकार से वंचित किया गया है. उनका कहना है कि दस्तावेजों की सख्त शर्तों के कारण बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम भी कट गए. वहीं, सत्तापक्ष का तर्क है कि मतदाता सूची में सुधार और फर्जी या अवैध नामों को हटाना जरूरी था.

बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान यह मुद्दा खास तौर पर सुर्खियों में रहा. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने वोटर अधिकार यात्रा निकालकर इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया और बिहार के विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश की. हालांकि, चुनावी नतीजों में यह रणनीति विपक्ष के पक्ष में जाती नजर नहीं आई और एनडीए को बड़ी जीत मिली. यूपी में भी समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव SIR के खिलाफ लगातार मुखर रहे हैं और इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं.

31 दिसंबर को आएगा अंतिम फैसला

अब जबकि फॉर्म भरने की प्रक्रिया खत्म हो चुकी है और समयसीमा बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया गया है, 31 दिसंबर को जारी होने वाली फाइनल ड्राफ्ट मतदाता सूची बेहद अहम मानी जा रही है. इसी सूची के आधार पर आने वाले चुनावों में मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर पाएंगे. SIR ने जहां एक तरफ चुनाव आयोग के साफ-सुथरी वोटर लिस्ट के दावे को मजबूत किया है, वहीं दूसरी तरफ इसने देश की राजनीति में एक नई बहस भी छेड़ दी है, जिसका असर आने वाले समय में साफ तौर पर देखने को मिल सकता है.

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