क्या इजरायल कर रहा अमेरिका की जासूसी? ईरान युद्ध के बीच बढ़ी US की टेंशन, जानें पूरा मामला

दुनिया की कूटनीति में अमेरिका और इजराइल के रिश्तों को अक्सर सबसे मजबूत साझेदारियों में गिना जाता है. दोनों देश रक्षा, खुफिया सहयोग और रणनीतिक हितों के मामले में एक-दूसरे के बेहद करीब हैं. लेकिन एक नई रिपोर्ट ने इस रिश्ते के भीतर छिपी उस सच्चाई की ओर इशारा किया है, जहां दोस्ती के बावजूद अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.

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दुनिया की कूटनीति में अमेरिका और इजराइल के रिश्तों को अक्सर सबसे मजबूत साझेदारियों में गिना जाता है. दोनों देश रक्षा, खुफिया सहयोग और रणनीतिक हितों के मामले में एक-दूसरे के बेहद करीब हैं. लेकिन एक नई रिपोर्ट ने इस रिश्ते के भीतर छिपी उस सच्चाई की ओर इशारा किया है, जहां दोस्ती के बावजूद अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. दावा किया गया है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां अब इजराइल को संभावित जासूसी खतरे के रूप में देख रही हैं और इसी वजह से अमेरिकी अधिकारियों को इजराइल दौरे के दौरान विशेष सुरक्षा उपाय अपनाने पड़ते हैं.

अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की बढ़ी चिंता

एनबीसी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन और उसकी खुफिया इकाई डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने हाल ही में इजराइल से जुड़े संभावित खुफिया खतरों का नया मूल्यांकन किया है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि DIA ने इजराइल से जुड़े खतरे के स्तर को बढ़ाकर "क्रिटिकल" श्रेणी में रखा है, जो सुरक्षा एजेंसियों की भाषा में अत्यंत गंभीर माना जाता है.

अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इजराइल, विशेष रूप से मध्य पूर्व में चल रहे तनाव और ईरान से जुड़े मुद्दों पर अमेरिका की आंतरिक रणनीतियों और चर्चाओं की जानकारी हासिल करने का प्रयास कर सकता है. इसी संदर्भ में एक विस्तृत दस्तावेज तैयार किया गया है, जिसमें कई ऐसी घटनाओं का उल्लेख किया गया है जिनसे यह आशंका और मजबूत हुई है.

ईरान मुद्दे ने बढ़ाई संवेदनशीलता

रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम तथा संभावित बातचीत को लेकर कई स्तरों पर चर्चा चल रही थी. उस दौरान इजराइल को इन वार्ताओं की पूरी जानकारी नहीं मिल पा रही थी. ऐसे में कथित तौर पर इजराइल ने क्षेत्रीय नेताओं, राजनयिक चैनलों और अन्य स्रोतों के माध्यम से अतिरिक्त जानकारी जुटाने की कोशिश की. अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि रणनीतिक मामलों में जानकारी हासिल करने की यह कोशिश सामान्य खुफिया गतिविधियों से कहीं अधिक संवेदनशील हो सकती है, खासकर तब जब मामला सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ा हो.

व्हाइट हाउस और इजराइल ने किया खंडन

रिपोर्ट सामने आने के बाद अमेरिका और इजराइल दोनों ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है. इजराइल के दूतावास ने स्पष्ट बयान जारी करते हुए कहा कि वह अमेरिकी सरकारी संस्थानों या अधिकारियों की जासूसी नहीं करता और दोनों देशों के बीच भरोसेमंद सहयोग का संबंध कायम है. वहीं व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी रिपोर्ट को तथ्यहीन बताते हुए कहा कि इसमें किए गए दावे वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाते. दोनों पक्षों का कहना है कि सुरक्षा सहयोग और खुफिया साझेदारी पहले की तरह मजबूत बनी हुई है.

इजराइल दौरे पर अपनाए जाते हैं विशेष सुरक्षा उपाय

रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प हिस्सा उन सुरक्षा उपायों से जुड़ा है जिन्हें अमेरिकी अधिकारी इजराइल यात्रा के दौरान अपनाते हैं. बताया गया है कि कई अधिकारी अपने नियमित मोबाइल फोन और लैपटॉप की जगह अस्थायी या सीमित उपयोग वाले उपकरण साथ रखते हैं. इनमें बर्नर फोन और क्लीन लैपटॉप शामिल होते हैं, जिनमें संवेदनशील डेटा नहीं रखा जाता. इसके अलावा अधिकारियों को सलाह दी जाती है कि वे होटल के कमरों या अन्य असुरक्षित स्थानों पर गोपनीय चर्चाएं न करें. इन उपायों का उद्देश्य संभावित साइबर या तकनीकी निगरानी से संवेदनशील जानकारी को सुरक्षित रखना होता है.

पुराने मामलों ने भी बढ़ाया अविश्वास

अमेरिका और इजराइल के रिश्तों में जासूसी को लेकर पहले भी विवाद सामने आ चुके हैं. सबसे चर्चित मामला 1980 के दशक का था, जब अमेरिकी खुफिया विश्लेषक जोनाथन पोलार्ड पर इजराइल को गोपनीय दस्तावेज सौंपने का आरोप लगा था. इस मामले में उन्हें 30 वर्ष की जेल की सजा भुगतनी पड़ी थी. इसके अलावा 2013 में एडवर्ड स्नोडेन के खुलासों ने यह भी दिखाया था कि दुनिया की बड़ी शक्तियां अपने सहयोगी देशों पर भी नजर रखती हैं. उन दस्तावेजों से पता चला था कि अमेरिका स्वयं कई मित्र देशों की निगरानी करता रहा है और उनसे संबंधित खुफिया जानकारी एकत्र करता रहा है.

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