Iran-US War: अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष लगातार 11वें दिन भी थमने का नाम नहीं ले रहा है. दोनों देशों के बीच बढ़ती आक्रामकता ने न केवल मध्य पूर्व की सुरक्षा को चुनौती दी है, बल्कि इस युद्ध की आर्थिक लागत भी तेजी से बढ़ती जा रही है. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक अब तक इस अभियान पर 37.5 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए जा चुके हैं, जबकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है. इसी बढ़ते दबाव के बीच अमेरिकी प्रशासन ने युद्ध अभियान को जारी रखने के लिए अतिरिक्त रक्षा बजट की मांग भी रखी है.
11वीं रात भी ईरान पर बरसे अमेरिकी हमले
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने जानकारी दी कि लगातार 11वीं रात भी ईरानी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए हवाई हमले किए गए. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर ईरान के अत्यधिक सुरक्षित माने जाने वाले भूमिगत परमाणु परिसर ‘पिकऐक्स माउंटेन’ पर भी कार्रवाई की जा सकती है. ट्रंप के इस बयान के बाद ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए साफ कहा कि यदि उसके परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला हुआ तो इसे युद्ध के नए चरण की शुरुआत माना जाएगा और उसका जवाब भी उसी स्तर पर दिया जाएगा.
पड़ोसी देशों तक पहुंचा संघर्ष का असर
इस युद्ध का प्रभाव अब केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रह गया है. कुवैत, बहरीन और जॉर्डन ने दावा किया कि उन्होंने अपने हवाई क्षेत्र में घुसने वाले कई हमलों को सफलतापूर्वक निष्क्रिय किया. वहीं ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर से गुजरने वाले सऊदी जहाजों को चेतावनी जारी कर दी है. इन घटनाओं ने यह संकेत दे दिया है कि यदि हालात जल्द नहीं संभले तो पूरा मध्य पूर्व इस संघर्ष की चपेट में आ सकता है और क्षेत्रीय सुरक्षा संकट और गहरा सकता है.
युद्ध के बीच तेज हुई कूटनीतिक हलचल
जहां एक ओर सैन्य कार्रवाई लगातार जारी है, वहीं दूसरी ओर युद्ध रोकने के लिए कूटनीतिक स्तर पर भी गतिविधियां तेज हो गई हैं. ईरान के गृह मंत्री एस्कंदर मोमेनी पाकिस्तान पहुंचे, जहां उन्होंने सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर क्षेत्रीय सुरक्षा और तनाव कम करने के उपायों पर चर्चा की. इन बैठकों को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब कई देश इस संघर्ष को व्यापक क्षेत्रीय युद्ध बनने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं.
शांति की कोशिशों के बीच अनिश्चित भविष्य
इसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन से मुलाकात कर लेबनान और इजराइल के बीच शांति स्थापित कराने की इच्छा जताई. हालांकि दक्षिणी लेबनान से इजराइली सेना की वापसी को लेकर उन्होंने कोई निश्चित समयसीमा देने से इनकार कर दिया. ऐसे में एक तरफ युद्ध के मोर्चे पर हमले तेज हो रहे हैं तो दूसरी ओर बातचीत के प्रयास भी जारी हैं. फिलहाल हालात यही संकेत दे रहे हैं कि यदि जल्द कोई ठोस कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए और बड़ा खतरा बन सकता है.
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