1. वोट का पक्का ठिकाना, फिर भी नेताओं का आना-जाना!
यूपी में मुस्लिम वोटबैंक पर दबाव बनाने के लिए कांग्रेस का नया 'जॉइनिंग कार्ड'!
उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में 2027 की बिसात अभी से बिछने लगी है और केंद्र में है अल्पसंख्यक वोटबैंक. कांग्रेस विधानसभा सीटों के मोलभाव के लिए सपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की जुगत में लगी है. इमरान मसूद के दामाद को सपा में शामिल कराने के जवाब में कांग्रेस ने एमआईएम के आसिम वकार, बसपा के पूर्व मंत्री इजहारुल हक, नईम अहमद और कैराना के पूर्व सांसद आमिर आलम खान मय बेटे नवाजिश को तिरंगा थमा दिया. राजनीतिक प्रेक्षक इसे विधानसभा टिकटों के बंटवारे से पहले की 'प्रेशर पॉलिटिक्स' करार दे रहे हैं. अलबत्ता जमीन पर अल्पसंख्यक मतदाता किसी भ्रम में नहीं दिखता और वह जीतने वाले चेहरे के साथ ही खड़ा नजर आता है. सचमुच दोनों दलों के भीतर यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि बड़े चेहरों की यह तोड़-फोड़ केवल सीटों के मोलभाव का जरिया बनेगी या वोटबैंक में कोई वास्तविक हलचल भी पैदा करेगी?
2.कामरेड का अपना राग, केरल की कलह से दिल्ली में आग!
विपक्षी बैठक के सूत्रधार बने एमए बेबी, लेकिन सीपीएम के अपने अलग दांव से कांग्रेस में बेचैनी !
दिल्ली में विपक्षी कुनबे को एक मंच पर लाने का जिम्मा उठाने वाले सीपीएम महासचिव एमए बेबी की सक्रियता ने गठबंधन के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है. ममता बनर्जी से 30 साल बाद संवाद साधने और कांग्रेस को तैयार करने के पीछे सीपीएम का मकसद साफ है वह इस साझा आंदोलन का पूरा सेहरा कांग्रेस के सिर नहीं बंधने देना चाहती. दिल्ली पहुंचते ही एमए बेबी का सीधे अरविंद केजरीवाल से मिलना इस बात का प्रमाण है कि वामपंथ अपने स्वतंत्र समीकरण साध रहा है. ऊपर से केरल में पिनरायी विजयन के खिलाफ जांच और मुकदमों को लेकर कांग्रेस-सीपीएम में सीधी जंग छिड़ी है. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि दक्षिण में तलवारें खींचने वाले दल दिल्ली में हाथ मिलाकर कब तक साझा मोर्चा संभाल पाएंगे. अलबत्ता जन-आंदोलनों की कमान अपने हाथ में रखने की सीपीएम की पुरानी आदत रही है. सचमुच विपक्षी एकता की मेज पर यक्ष प्रश्न यही है कि राज्यों के तीखे अंतर्विरोधों के बीच यह साझा एजेंडा कितने दिन टिक पाएगा?
3.दीवारों के भी कान हैं, भेदिए अब परेशान हैं!
दिल्ली के गलियारों में 'सीक्रेट लीक' पर सरकार का सख्त रुख !
लुटियंस दिल्ली के बंद कमरों में होने वाली नीतिगत चर्चाएं और संवेदनशील फाइलें बाहर कैसे आ रही हैं, इसे लेकर शीर्ष स्तर पर बेहद कड़ा रुख अख्तियार कर लिया गया है. सत्ता के गलियारों में अब 'जीरो टॉलरेंस' का सायरन बज चुका है और सिस्टम का भरोसा तोड़ने वाली 'Black Sheeps' की पहचान के लिए इंटरनल सर्विलांस बेहद सख्त कर दिया गया है. ब्यूरोक्रेसी से लेकर राजनीतिक सलाहकारों तक हर संदिग्ध गतिविधि की बारीकी से डिजिटल और मैनुअल स्कैनिंग शुरू हो चुकी है. शीर्ष नेतृत्व ने साफ संकेत दे दिया है कि सिस्टम की गोपनीयता से खिलवाड़ करने वाले चाहे जितने रसूखदार हों, बख्शे नहीं जाएंगे. राजनीतिक प्रेक्षक इसे सत्ता तंत्र की सफाई का बड़ा प्रशासनिक अभियान मान रहे हैं. अलबत्ता दिल्ली के सत्ता गलियारों में हमेशा से कान लगाकर घूमने वालों की तादाद कम नहीं रही है !
4.विजय की दो टूक, कांग्रेस की रणनीति में चूक!
सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की जिद पर 'इंडिया' ब्लॉक में रार !
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और महाभियोग के मुद्दे पर विपक्षी खेमे की एकता बिखरती नजर आ रही है. कांग्रेस जहां सीईसी को हटाने की जिद पर अड़ी है, वहीं दक्षिण के नए सियासी सितारे विजय की पार्टी टीवीके ने इस लाइन से साफ किनारा कर लिया है. टीवीके का स्पष्ट मानना है कि किसी एक व्यक्ति के इस्तीफे से संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली का हल नहीं निकलता और आयोग पर इस तरह के व्यक्तिगत हमले उचित नहीं हैं. संसद में शून्य उपस्थिति के बावजूद टीवीके का यह सख्त रुख कांग्रेस की कूटनीति के लिए असहज करने वाला साबित हुआ है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे विपक्षी गठबंधन के भीतर नेतृत्व और दिशा को लेकर उपजती नई दरार मान रहे हैं. अलबत्ता क्षेत्रीय दल अब राष्ट्रीय पार्टी की तय की गई पिच पर आंख मूंदकर खेलने को तैयार नहीं दिखते. सचमुच इस मतभेद के बाद यक्ष प्रश्न यही उठता है कि जब अपने ही सहयोगी पीछे हट रहे हों तो कांग्रेस आंदोलन को कैसे धार दे पाएगी?
5.सीडब्ल्यूसी के बाद प्रियंका गांधी और सचिन पायलट की मैराथन बैठक !
सुलह के नए फॉर्मूले की तलाश !
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक खत्म होते ही प्रियंका गांधी और पार्टी के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट के बीच हुई लंबी और गोपनीय बातचीत ने संगठन के भीतर चर्चाएं तेज कर दी हैं. सूत्रों की मानें तो इस बैठक की मुख्य धुरी पंजाब कांग्रेस का गहराता नेतृत्व संकट और अंदरूनी कलह रही, जहां प्रदेश इकाई कई गुटों में बंटी नजर आ रही है. इसके साथ ही राजस्थान के आगामी संगठनात्मक भविष्य की राजनीतिक भूमिकाओं पर भी दोनों नेताओं के बीच गहन मंथन हुआ है. पायलट के सांगठनिक अनुभव को अब बड़े संकटमोचक के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना पर काम चल रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि उत्तर भारत के राज्यों में पकड़ बनाए रखने के लिए आलाकमान को युवा चेहरों पर ही दांव लगाना पड़ेगा. अलबत्ता दोनों राज्यों में पुराने दिग्गजों के अपने-अपने मजबूत किले हैं जिन्हें भेदना आसान नहीं. सचमुच पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यक्ष प्रश्न यही है कि क्या प्रियंका-पायलट की इस जुगलबंदी से पंजाब की गुटबाजी का कोई स्थायी समाधान निकल पाएगा?
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