भारत हिमाचल प्रदेश में चिनाब नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास नदी के बेसिन की ओर ले जाने वाली चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना पर काम कर रहा है. इस परियोजना को लेकर पाकिस्तान ने आपत्ति जताई है. उसका कहना है कि चिनाब जैसी पश्चिमी नदी के पानी को दूसरी नदी की ओर मोड़ना सिंधु जल संधि के नियमों से जुड़ा मामला है. पाकिस्तान ने जून 2026 में इस परियोजना को लेकर भारत के सामने अपना विरोध भी दर्ज कराया था.
भारत की ओर से इस तरह की परियोजनाओं को देश के भीतर पानी के बेहतर इस्तेमाल से जोड़ा गया है. परियोजना के तहत लाहौल-स्पीति में चंद्रा नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास बेसिन की ओर ले जाने की योजना है. करीब 2,352 करोड़ रुपये की इस परियोजना में लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग और चंद्रा नदी पर 19 मीटर ऊंचे बैराज का प्रस्ताव है.
चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना क्या है?
इस परियोजना के तहत हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में चंद्रा नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास नदी के बेसिन में पहुंचाया जाएगा. इसके लिए कोकसर के पास चंद्रा नदी पर बैराज बनाया जाना है. यहां से पानी को करीब 8.7 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंग के जरिए ब्यास बेसिन की ओर ले जाने की योजना है.
इस परियोजना से मिलने वाले अतिरिक्त पानी का इस्तेमाल सिंचाई और पानी की जरूरतों को पूरा करने के साथ जलविद्युत क्षेत्र में भी किया जा सकता है. रिपोर्टों के मुताबिक, इससे हिमाचल प्रदेश के अलावा पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों को भी फायदा हो सकता है.
पाकिस्तान क्यों जता रहा है आपत्ति?
पाकिस्तान की चिंता की बड़ी वजह सिंधु जल संधि है. 1960 में हुई इस संधि के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब को पश्चिमी नदियां माना गया था, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज पूर्वी नदियां हैं. संधि के अनुसार पूर्वी नदियों के पानी पर भारत को अधिकार मिला, जबकि पश्चिमी नदियों का पानी मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए तय किया गया था. हालांकि, भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ खास घरेलू, कृषि और जलविद्युत इस्तेमाल की अनुमति भी दी गई है.
भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को 'अभी के लिए स्थगित' यानी एबेयंस में रखने का फैसला किया था. भारत का कहना है कि यह स्थिति तब तक रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का समर्थन पूरी तरह बंद नहीं करता.
चंद्रा नदी का पानी ब्यास की ओर ले जाने की योजना
चिनाब-ब्यास परियोजना में चंद्रा नदी के अतिरिक्त पानी को सुरंग के जरिए ब्यास बेसिन में ले जाने की योजना है. इसके लिए कोकसर के पास 19 मीटर ऊंचा बैराज बनाने का प्रस्ताव है. इसके बाद पानी को लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग से दूसरी ओर पहुंचाया जाएगा.
परियोजना से जुड़े दस्तावेजों के मुताबिक, सुरंग और उससे जुड़े सिविल कार्यों पर करीब 2,352 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. इसका मकसद चिनाब बेसिन के अतिरिक्त पानी का देश के दूसरे हिस्सों में इस्तेमाल बढ़ाना है.
IWT को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग राय
पाकिस्तान का कहना है कि चिनाब के पानी को ब्यास बेसिन की ओर मोड़ना सिंधु जल संधि और अंतरराष्ट्रीय जल कानून से जुड़े नियमों का उल्लंघन है. वहीं, भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि अभी एबेयंस में है और वह पश्चिमी नदियों के पानी के अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर रहा है.
इसलिए चिनाब-ब्यास लिंक टनल सिर्फ एक जल परियोजना नहीं रह गई है. यह भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर चल रहे विवाद का भी हिस्सा बन गई है.
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