Political Popcorn: सियासत के गलियारों में इस वक्त कई मुद्दे एक साथ सुर्खियां बटोर रहे हैं. कहीं UPI के MDR चार्ज पर सुप्रीम कोर्ट की नजर है, तो कहीं बिहार में नए DGP को लेकर नामों की चर्चा तेज है. 2029 के चुनाव से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं. वहीं चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी आंदोलन और गोवा कांग्रेस में दल-बदलुओं की एंट्री पर लगी रोक ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है. यानी मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन सवाल एक ही- आखिर सियासत की अगली चाल क्या होगी?
1. डिजिटल लेन-देन पर कोर्ट का पहरा!
यूपीआई एमडीआर चार्ज पर सुप्रीम कोर्ट सख्त!
सुप्रीम कोर्ट ने यूपीआई भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट से होने वाली कमाई और उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले असर को लेकर केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से विस्तृत जानकारी तलब की है. हालांकि अदालत ने तत्काल प्रभाव से इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. सत्ता पक्ष ने इसे डिजिटल अर्थव्यवस्था को पारदर्शी और सुदृढ़ बनाने का तकनीकी कदम बताया, जबकि विपक्षी दलों ने इसे 'आम आदमी की जेब पर डिजिटल डाका' करार देने की तैयारी कर ली है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे एक संवेदनशील आर्थिक मुद्दा मान रहे हैं जो सीधे हर नागरिक की जेब से जुड़ा है. अलबत्ता देश के चाय वाले से लेकर मॉल वाले तक के सामने यक्ष प्रश्न यही है कि डिजिटल इंडिया का यह सफर जेब पर भारी तो नहीं पड़ेगा !
2. कमांडो का बॉस, क्या संभालेगा सूबे की कमान?
एनएसजी चीफ भृगु श्रीनिवासन की बिहार वापसी की चर्चा, क्या बनेंगे नए डीजीपी?
बिहार डीजीपी की दौड़ में सिर्फ पटना ही नहीं, बल्कि दिल्ली का सुरक्षा तंत्र भी हलचल में है. नेशनल सिक्योरिटी गार्ड के डायरेक्टर जनरल और बिहार कैडर के 1992 बैच के कद्दावर आईपीएस अधिकारी भृगु श्रीनिवासन के नाम की अचानक तेज चर्चा शुरू हो गई है. दिल्ली में आतंकवाद निरोधक दस्ते की कमान संभाल रहे श्रीनिवासन को क्या वापस अपने गृह कैडर की जिम्मेदारी दी जा सकती है? जानकारों का मानना है कि केंद्र और राज्य के तालमेल को देखते हुए एक सख्त छवि वाले अधिकारी को पटना बुलाना कानून-व्यवस्था के लिहाज से बड़ा कदम हो सकता है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे आईपीएस लॉबी के बीच का क्लासिक पावर-गेम करार दे रहे हैं. अलबत्ता जब केंद्र के शीर्ष सुरक्षा पद पर कोई अधिकारी तैनात हो तो राज्य में उनकी वापसी कराना इतना सरल भी नहीं होता. सचमुच पुलिस महकमे के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि कमांडो यूनिट के बॉस क्या गंगा किनारे की खाकी कमान संभालने आ रहे हैं?
3. 2029 में कौन संभालेगा चुनावी डायरी?
ज्ञानेश कुमार के बाद डॉ. विवेक जोशी संभालेंगे सीईसी की कमान या मिलेगा सेवा विस्तार?
चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर चल रहे विवादों के बीच देश के अगले मुख्य चुनाव आयुक्त के भविष्य को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई है. मौजूदा सीईसी ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल 26 जनवरी 2029 को पूरा होना है, जबकि अगले संभावित उत्तराधिकारी डॉ. विवेक जोशी का कार्यकाल 20 मई 2031 तक सुरक्षित है. गलियारों में कानाफूसी है कि क्या 2029 के आम चुनाव की ऐतिहासिक निगरानी डॉ. विवेक जोशी करेंगे या फिर सरकार ज्ञानेश कुमार को सेवा विस्तार देकर सबको चौंका देगी? सत्ता पक्ष का मानना है कि प्रशासनिक निरंतरता और निष्पक्षता ही सर्वोच्च प्राथमिकता होती है,जबकि विपक्ष हर फेरबदल पर पहले से ही अपनी पैनी नजर गड़ाए बैठा है. राजनीतिक प्रेक्षक इस प्रशासनिक गणित को भविष्य की सबसे बड़ी चुनावी तैयारी मान रहे हैं. अलबत्ता आयोग पर बढ़ते दबाव के बीच कुर्सी पर कौन बैठेगा, यह केवल नियमों का नहीं बल्कि भरोसे का भी खेल है. सचमुच लुटियंस दिल्ली का यक्ष प्रश्न यही है कि 2029 के महामुकाबले का मुख्य अंपायर आखिरकार कौन बनेगा?
4. आंदोलन की होड़, किसका बैनर बेजोड़?
चुनाव आयोग के खिलाफ 30 सितंबर को ‘इंडी’ ब्लॉक का महामंथन
विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ साझा आंदोलन की जमीन तैयार करने के लिए 30 सितंबर को दिल्ली में बड़ी बैठक करने जा रहा है. इस मोर्चे को धार देने के लिए ममता बनर्जी ने करीब 30 साल बाद सीपीएम महासचिव एमए बेबी से संवाद साधा है और राहुल गांधी को भी एकजुटता के लिए राजी किया है. कांग्रेस ने भी जिलों से लेकर राजधानियों तक प्रदर्शन की झड़ी लगा दी है. अलबत्ता इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर 2 अक्टूबर तक का अल्टीमेटम देकर अपनी समानांतर खिचड़ी पकानी शुरू कर दी है. सत्ता पक्ष इसे विपक्ष का दिशाहीन शक्ति-प्रदर्शन बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे अपनी एकता की परीक्षा मान रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक सवाल उठा रहे हैं कि क्या विपक्ष के इस आंदोलन में सीजेपी अपनी अलग डफली बजाकर नैरेटिव को बिखेर देगी या भाजपा इसे विपक्ष के प्रभाव को हल्का करने का मौका समझेगी? सचमुच प्रश्न यह है कि सड़कों पर असली जनसमर्थन किसका दिखेगा अनुभवी दलों का या नए आंदोलनों का?
5. बीच समंदर में नाव बदलने वालों के लिए 'नो एंट्री'!
गोवा कांग्रेस को आलाकमान का कड़ा फरमान, दल-बदलुओं की एंट्री पर लगा ताला!
लगातार विधायकों और नेताओं की बगावत का दंश झेल चुकी गोवा कांग्रेस को दिल्ली से बेहद सख्त और साफ संदेश मिला है 'पार्टी में आनन-फानन में किसी की भी जॉइनिंग न कराई जाए' हाईकमान ने कड़े शब्दों में हिदायत दी है कि चुनाव आते ही दल बदलने वालों, खासकर कांग्रेस छोड़कर आप या गोवा फॉरवर्ड पार्टी में जाने और फिर लौटने की फिराक में लगे मौसम वैज्ञानिकों को दूर ही रखा जाए. अब सिर्फ उन्हीं चेहरों को जगह मिलेगी जो निजी स्वार्थ साधने के बजाय संगठन के प्रति खरी निष्ठा साबित करेंगे. सत्ताधारी दल इस कदम पर तंज कसते हुए कह रहा है कि जब जहाज खाली हो चुका है, तब पहरेदारी बिठाई जा रही है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे पार्टी के बचे-खुचे कैडर का मनोबल बढ़ाने की आखिरी कोशिश के रूप में देख रहे हैं. अलबत्ता छोटे राज्यों की सियासत में निष्ठा और महत्वाकांक्षा के बीच का फर्क हमेशा बहुत बारीक रहा है. सचमुच गोवा के कार्यकर्ताओं के बीच यक्ष प्रश्न यही है कि क्या वफादारी के इस नए पैमाने से पार्टी आगामी चुनावों में जीत का सूखा खत्म कर पाएगी?