UGC New Guidelines: यूजीसी द्वारा लागू किए गए नए इक्विटी रेगुलेशंस पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाते हुए फिलहाल रोक लगा दी है. शीर्ष अदालत का कहना है कि नियमों की भाषा प्रथम दृष्टया अस्पष्ट नजर आती है और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक इन नियमों की गहन समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक इन्हें लागू नहीं किया जाएगा.
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि मौजूदा रेगुलेशंस की भाषा इतनी साफ नहीं है कि उन्हें बिना भ्रम के लागू किया जा सके. अदालत ने माना कि यदि नियमों में स्पष्टता नहीं होगी, तो उनका इस्तेमाल भेदभाव के लिए भी किया जा सकता है. इसी कारण कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और सॉलिसिटर जनरल को इस पूरे मामले की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का सुझाव दिया है.
देशभर में विरोध के बीच सुप्रीम कोर्ट की एंट्री
यूजीसी के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026’ को लेकर पहले ही देशभर में छात्रों और शिक्षाविदों के बीच असंतोष देखा जा रहा था. इसी पृष्ठभूमि में दायर एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुरू की. याचिका में आरोप लगाया गया कि नए नियम छात्रों के बीच भेदभाव को बढ़ावा दे सकते हैं.
वरिष्ठ वकीलों की दलीलें और अदालत की टिप्पणी
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि 2012 के यूजीसी नियमों को लेकर 2019 से एक याचिका लंबित है और अब उन्हीं नियमों की जगह 2026 के नए रेगुलेशन लाए गए हैं. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत फिलहाल इससे ज्यादा पीछे नहीं जा सकती और नए नियमों की वैधता की ही जांच करेगी.
समिति बनाने की सलाह, समाज में संतुलन की बात
चीफ जस्टिस ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि इस संवेदनशील मुद्दे पर कुछ प्रतिष्ठित और निष्पक्ष व्यक्तियों की एक समिति बनाई जानी चाहिए, ताकि समाज बिना किसी वर्गीय भेदभाव के आगे बढ़ सके. अदालत ने संकेत दिया कि समानता का अधिकार इस पूरे मामले का केंद्र बिंदु है.
अनुच्छेद 14 और 15 पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 15(4) राज्य को अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रगतिशील कानून बनाते समय प्रतिगामी सोच को जगह दी जा रही है. उन्होंने यह भी चिंता जताई कि भारत कहीं उस दौर की ओर न बढ़ जाए, जहां शिक्षा संस्थानों में वर्गों के आधार पर अलगाव देखने को मिला था.
सेक्शन 3C पर सीधी चुनौती
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील विष्णु शंकर जैन ने यूजीसी नियमों के सेक्शन 3C को सीधे तौर पर चुनौती दी. उन्होंने दलील दी कि यह प्रावधान जाति आधारित भेदभाव को बढ़ावा देता है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन करता है. उनका कहना था कि शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह का वर्गीकरण समाज में खाई को और गहरा करेगा.
सामान्य वर्ग के छात्रों की सुरक्षा पर सवाल
सुनवाई के दौरान एक वकील ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि अगर कोई सामान्य वर्ग का छात्र भेदभाव या उत्पीड़न का शिकार होता है, तो नए नियमों में उसके लिए कोई प्रभावी समाधान नहीं दिखता. इस पर चीफ जस्टिस ने भी हैरानी जताई और पूछा कि क्या सामान्य वर्ग को इन नियमों में कवर नहीं किया गया है.
केंद्र से जवाब और नियमों पर फिलहाल ब्रेक
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक नियमों की भाषा की समीक्षा नहीं हो जाती और संभावित दुरुपयोग को रोका नहीं जाता, तब तक यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशंस लागू नहीं होंगे. अदालत ने कहा कि वह यह परखना चाहती है कि क्या ये नियम वास्तव में समानता के संवैधानिक सिद्धांत पर खरे उतरते हैं या नहीं.
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