ईरान में सत्ता बदलने चले थे ट्रंप-नेतन्याहू, अब अपनी कुर्सी ही बचाना हुआ मुश्किल, मंडराने लगा संकट!

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान में सरकार बदलने के इरादे से सैन्य कार्रवाई शुरू की थी.

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान में सरकार बदलने के इरादे से सैन्य कार्रवाई शुरू की थी. दोनों नेताओं को भरोसा था कि बड़े हमलों से ईरान का नेतृत्व बिखर जाएगा और वहां की जनता मौजूदा सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आएगी. उनका मकसद 1979 से चले आ रहे इस्लामिक शासन को खत्म करना था. लेकिन युद्ध के बाद जो तस्वीर सामने आई, वह उनकी उम्मीदों से बिल्कुल अलग थी.

अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई बड़े नेताओं की मौत हुई, लेकिन इसके बावजूद देश की सत्ता व्यवस्था नहीं टूटी. ट्रंप ने ईरानी लोगों से सरकार के खिलाफ विद्रोह करने और सत्ता अपने हाथ में लेने की अपील भी की थी. दूसरी ओर, नेतन्याहू भी ईरान में राजनीतिक बदलाव की उम्मीद जता रहे थे. हालांकि, उनकी कोशिशें सफल नहीं हुईं. अब दोनों नेताओं को अपने ही देशों में राजनीतिक विरोध और चुनावी झटकों का सामना करना पड़ रहा है.

खामेनेई की मौत के बाद भी कायम रहा सत्ता का ढांचा

ट्रंप और नेतन्याहू की रणनीति में सबसे बड़ी चूक यह रही कि उन्होंने ईरान की राजनीतिक व्यवस्था को केवल खामेनेई तक सीमित समझ लिया. जबकि वहां सत्ता का संचालन कई मजबूत संस्थाओं के जरिए होता है. धार्मिक संस्थाओं के अलावा सुरक्षा बल और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) भी इस व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं.

यही कारण है कि सर्वोच्च नेता की मौत और सैन्य ठिकानों पर भारी हमलों के बाद भी ईरान का शासन पूरी तरह नहीं बिखरा. अमेरिका और इजरायल को उम्मीद थी कि नेतृत्व में आई कमजोरी का फायदा उठाकर जनता सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

सत्ता परिवर्तन की कोशिश में अपनाए गए कई रास्ते

ईरान में सरकार बदलने के लिए अमेरिका और इजरायल ने सैन्य कार्रवाई के साथ राजनीतिक और दूसरे तरीकों से भी दबाव बनाने की कोशिश की.

प्रदर्शनों से जगी थी उम्मीद: जनवरी 2026 में ईरान में हुए विरोध प्रदर्शनों को ट्रंप प्रशासन ने सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के मौके के तौर पर देखा. अमेरिकी अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों की मदद करने और ईरानी अधिकारियों को निशाना बनाने जैसे विकल्पों पर विचार किया.

शीर्ष नेतृत्व पर हमला: 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़ा हमला किया. इसमें खामेनेई समेत कई वरिष्ठ नेता मारे गए. इसके बाद दोनों नेताओं ने ईरान की जनता से मौजूदा सरकार के खिलाफ खड़े होने की अपील की.

सुरक्षा व्यवस्था को निशाना बनाया: हमलों का दायरा सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा. ईरान के सुरक्षा बलों को भी निशाना बनाया गया, ताकि सरकार की विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर हो सके.

रजा पहलवी के विकल्प पर विचार: अमेरिका ने ईरान के आखिरी शाह के बेटे रजा पहलवी से भी संपर्क किया. उन्हें भविष्य में ईरान के नेतृत्व के संभावित चेहरे के रूप में देखा गया. हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों को इस बात पर भरोसा नहीं था कि ईरान में उन्हें पर्याप्त जनसमर्थन मिल पाएगा.

अमेरिकी चुनाव ने ट्रंप की बढ़ाई चिंता

ईरान में मनचाहा नतीजा नहीं मिलने के बाद ट्रंप के सामने घरेलू राजनीति की चुनौती भी खड़ी हो गई है. 3 नवंबर 2026 को हुए मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव, दोनों में बढ़त बनाई. इससे रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति कमजोर हुई है.

इसका असर ट्रंप के बाकी कार्यकाल पर भी पड़ सकता है. संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी की मजबूत मौजूदगी से सरकार के फैसलों और नीतियों को आगे बढ़ाना उनके लिए मुश्किल हो सकता है. युद्ध के खर्च और आर्थिक दबाव को लेकर भी ट्रंप प्रशासन को सवालों का सामना करना पड़ रहा है.

इजरायल में बहुमत से दूर रह गया नेतन्याहू का गठबंधन

इजरायल में भी नेतन्याहू के लिए हालात आसान नहीं हैं. 27 अक्टूबर को हुए चुनाव में उनके गठबंधन को 120 में से 53 सीटें ही मिल सकीं. सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है. वहीं, विपक्षी दलों को कुल 48 सीटें मिली हैं.

3 नवंबर को विपक्ष ने पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन किया. इससे नेतन्याहू के सामने चुनौती और बढ़ गई है. हालांकि, विपक्षी दलों के बीच आपसी मतभेदों के चलते अभी यह तय नहीं है कि नेतन्याहू की सरकार गिर जाएगी.

जिस मकसद से शुरू हुआ युद्ध, वह पूरा नहीं हुआ

ईरान में सत्ता परिवर्तन की उम्मीद के साथ शुरू किए गए युद्ध ने अमेरिका और इजरायल को सैन्य मोर्चे पर भले ही कई सफलताएं दी हों, लेकिन राजनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं हो सका. ईरान की व्यवस्था हमलों के बावजूद बनी रही. दूसरी तरफ, ट्रंप और नेतन्याहू को अपने ही देशों में चुनावी नतीजों और राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में अब सवाल उठने लगा है कि ईरान में बदलाव लाने की कोशिश दोनों नेताओं के लिए घरेलू राजनीति में नई परेशानी तो नहीं बन गई है.