प्रदूषण की वजह सिर्फ पटाखे नहीं... फिर दिल्ली की हवा में कौन घोल रहा है जहर? सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

हर साल सर्दियों की शुरुआत होते ही दिल्ली की हवा खराब होने लगती है. घर से बाहर निकलते ही आंखों में जलन, गले में परेशानी और सांस लेने में दिक्कत महसूस होने लगती है.

Firecrackers are not the only cause of air pollution in Delhi Supreme Court
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Delhi Air Pollution: हर साल सर्दियों की शुरुआत होते ही दिल्ली की हवा खराब होने लगती है. घर से बाहर निकलते ही आंखों में जलन, गले में परेशानी और सांस लेने में दिक्कत महसूस होने लगती है. कई बार राजधानी और आसपास के इलाकों में धुंध की मोटी परत भी छा जाती है. इस दौरान प्रदूषण को लेकर बहस तेज हो जाती है. कभी पटाखों को इसकी वजह बताया जाता है तो कभी पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने को जिम्मेदार ठहराया जाता है.

लेकिन क्या दिल्ली के प्रदूषण के पीछे सिर्फ पटाखे और पराली ही जिम्मेदार हैं? क्या पटाखों पर पूरी तरह रोक लगाने से राजधानी की हवा साफ हो सकती है? सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने इन सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है. कोर्ट ने कहा है कि पटाखों से प्रदूषण फैलता है, लेकिन दिल्ली की खराब हवा के लिए केवल उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. साल 2024 में पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध के बावजूद AQI में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ था.

हर साल गंभीर होती जा रही प्रदूषण की समस्या

दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण की समस्या हर सर्दी में गंभीर हो जाती है. 2 नवंबर 2026 को प्रकाशित LiveLaw की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा कि पटाखों पर पूरी तरह रोक लगाना एक आसान उपाय लग सकता है, लेकिन अभी ऐसे पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं, जिनसे यह साबित हो सके कि केवल प्रतिबंध लगाने से प्रदूषण की समस्या खत्म हो जाएगी.

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि साल 2024 में पटाखों पर पूरी तरह रोक के बाद भी हवा की गुणवत्ता में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया था. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि पटाखों के अलावा कौन-कौन सी चीजें दिल्ली की हवा को जहरीला बना रही हैं. इसका जवाब केंद्र सरकार की ओर से संसद में पेश किए गए आंकड़ों में भी मिलता है.

सरकार ने बताए दिल्ली के प्रदूषण के बड़े कारण

राज्यसभा में 30 जुलाई 2026 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने दिल्ली-NCR में प्रदूषण के कारणों की जानकारी दी थी. सरकार के मुताबिक, राजधानी की हवा खराब होने के पीछे कई वजहें हैं. इनमें वाहनों से निकलने वाला धुआं, फैक्ट्रियों और बिजली संयंत्रों का प्रदूषण, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, कूड़ा जलाना और पराली जलाना शामिल हैं.

संसद में पेश CAQM की रिपोर्ट के अनुसार, सर्दियों में PM2.5 प्रदूषण में अलग-अलग स्रोतों की हिस्सेदारी का अनुमान इस तरह है. वाहनों से निकलने वाले धुएं का योगदान 19 से 24 प्रतिशत तक रहता है. उद्योगों और बिजली संयंत्रों से 8 से 10 प्रतिशत प्रदूषण होता है, जबकि सड़कों और निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल की हिस्सेदारी 10 से 18 प्रतिशत तक है.

वहीं, कूड़ा, लकड़ी और पराली जैसे जैविक ईंधन जलाने से 17 से 23 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है. इसके अलावा हवा में अलग-अलग गैसों के मिलने और रासायनिक बदलाव से बनने वाले छोटे कणों का योगदान 24 से 28 प्रतिशत तक रहता है.

गाड़ियों का धुआं भी बड़ी वजह

दिल्ली की सड़कों पर हर दिन बड़ी संख्या में कार, बस, ट्रक, ऑटो और दोपहिया वाहन चलते हैं. पेट्रोल और डीजल जलने से निकलने वाला धुआं हवा में हानिकारक गैसें और छोटे कण छोड़ता है. पुराने वाहन, खराब इंजन और ट्रैफिक जाम इस परेशानी को और बढ़ा देते हैं.

जब गाड़ियां जाम में लंबे समय तक खड़ी रहती हैं, तब भी उनका ईंधन जलता रहता है और धुआं निकलता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सर्दियों में परिवहन क्षेत्र का प्रदूषण में योगदान 19 से 24 प्रतिशत तक रहता है. गर्मियों में यह हिस्सेदारी कुछ कम हो जाती है.

निर्माण कार्य और सड़क की धूल भी बढ़ाती है प्रदूषण

दिल्ली में कई जगह सड़कें बनाने, इमारतों के निर्माण और खुदाई का काम चलता रहता है. इन कामों के दौरान मिट्टी और सीमेंट के बारीक कण हवा में फैल जाते हैं. इसके अलावा सड़कों पर जमा धूल भी वाहनों के गुजरने से उड़कर हवा में मिल जाती है.

गर्मियों में धूल से होने वाला प्रदूषण ज्यादा बढ़ जाता है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस मौसम में धूल की हिस्सेदारी 25 से 31 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. हालांकि, सर्दियों में भी इसका असर बना रहता है.

पराली और कूड़ा जलाने से भी बिगड़ती है हवा

अक्टूबर और नवंबर में पंजाब, हरियाणा और आसपास के राज्यों में फसल कटने के बाद पराली जलाने की घटनाएं सामने आती हैं. इससे निकलने वाला धुआं हवा के साथ दिल्ली-NCR तक पहुंच सकता है. हालांकि, दिल्ली के प्रदूषण के लिए पराली को अकेली वजह नहीं माना जा सकता.

सरकार के आंकड़ों में जैविक ईंधन जलाने के तहत पराली के साथ घरेलू स्तर पर लकड़ी और दूसरे ईंधन जलाने तथा कूड़ा जलाने से होने वाला प्रदूषण भी शामिल है. दिल्ली में खुले में कचरा जलाना और लैंडफिल में आग लगना भी हवा को खराब करता है. इससे निकलने वाला धुआं लोगों की सेहत के लिए नुकसानदायक होता है.

सर्दियों में प्रदूषण हवा में क्यों फंस जाता है?

ठंड के मौसम में दिल्ली का प्रदूषण और बढ़ जाता है. इसकी एक बड़ी वजह मौसम में होने वाला बदलाव है. सर्दियों में हवा की रफ्तार कम हो जाती है, जिससे प्रदूषण के कण एक जगह जमा होने लगते हैं.

इस मौसम में तापमान में बदलाव के कारण हवा की ऊपरी परत नीचे की ठंडी हवा को ऊपर उठने से रोक सकती है. इस स्थिति को तापमान उलटाव कहा जाता है. इसके चलते प्रदूषण जमीन के आसपास ही जमा रहता है और आसानी से फैल नहीं पाता. यही वजह है कि सर्दियों में प्रदूषण का असर ज्यादा महसूस होता है.

पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पटाखे जलाने से हवा और ध्वनि, दोनों तरह का प्रदूषण होता है. पटाखों से निकलने वाले PM2.5 जैसे बेहद छोटे कण हवा में कई दिनों तक रह सकते हैं. सांस के जरिए ये कण शरीर में पहुंचकर स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं. बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों पर इसका असर ज्यादा गंभीर हो सकता है.

कोर्ट ने कहा कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान जरूरी है, लेकिन संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को स्वस्थ और साफ वातावरण में जीने का अधिकार भी देता है. धार्मिक आजादी के नाम पर किसी दूसरे की सेहत को खतरे में नहीं डाला जा सकता. इसके साथ ही कोर्ट ने प्रदूषण से जुड़े नियमों को लागू करने वाले अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए.

शर्तों के साथ ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति

सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि केवल नियम बना देना काफी नहीं है. उनका सही तरीके से पालन कराना और निगरानी करना भी जरूरी है. कोर्ट ने 7 और 8 नवंबर 2026 को कुछ शर्तों के साथ ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दी है. इसके बाद 9 नवंबर से सालभर के लिए फिर प्रतिबंध लागू हो जाएगा.

कोर्ट ने राज्यों से दिवाली के बाद AQI और अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों से जुड़े आंकड़े भी मांगे हैं. इस मामले में अगली सुनवाई 16 दिसंबर 2026 को होगी.

प्रदूषण कम करने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए?

केंद्र सरकार ने दिल्ली-NCR में प्रदूषण पर रोक लगाने के उपायों की निगरानी के लिए कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट यानी CAQM बनाया है. यह आयोग दिल्ली और आसपास के राज्यों में प्रदूषण कम करने के लिए उठाए जा रहे कदमों पर नजर रखता है.

सरकार के मुताबिक, आयोग अब तक 101 वैधानिक निर्देश और 17 सलाह या आदेश जारी कर चुका है. इनमें वाहनों, निर्माण कार्यों, उद्योगों, कूड़े और पराली से होने वाले प्रदूषण को कम करने के उपाय शामिल हैं.

संसद में सरकार ने यह भी बताया कि दिल्ली में AQI 200 से कम रहने वाले दिनों की संख्या बढ़ी है. साल 2016 में ऐसे 110 दिन थे, जबकि 2025 में इनकी संख्या 200 हो गई. वहीं, PM10 का सालाना औसत स्तर 2016 में 290 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जो 2025 में घटकर 197 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया.

इन आंकड़ों से पता चलता है कि प्रदूषण कम करने के लिए कई स्तरों पर कदम उठाए जा रहे हैं. हालांकि, दिल्ली की हवा को साफ रखने के लिए सिर्फ पटाखों या पराली पर रोक लगाना काफी नहीं होगा. वाहनों के धुएं, निर्माण की धूल, कचरा जलाने और उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषण पर भी लगातार नियंत्रण जरूरी है.

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