Trump and Modi Friendship: कभी दुनिया के मंच पर साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिश्तों में अब पहले जैसी गर्मजोशी नहीं बची है. यह दावा किया है अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने. उनका कहना है कि दोनों नेताओं के बीच जो गहरी समझ और सहयोग कभी दिखता था, वह अब कमजोर पड़ चुका है.
बोल्टन ने अपने हालिया बयान में कहा कि वैश्विक मंच पर किसी नेता से व्यक्तिगत संबंध मजबूत होने का मतलब यह नहीं होता कि दोनों देशों के बीच रिश्ते भी उतने ही अच्छे रहेंगे. उन्होंने ट्रंप की कार्यशैली पर निशाना साधते हुए कहा, “अगर ट्रंप को कोई नेता व्यक्तिगत रूप से पसंद आ जाए, तो वह मान लेते हैं कि उस देश से अमेरिका के संबंध भी खुद-ब-खुद अच्छे हो जाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं होता.”
व्यापारिक खटास और वैश्विक समीकरणों में बदलाव
हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर कई मुद्दे सामने आए हैं. अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर भारी टैरिफ (लगभग 50%) लगा दिया है, जिससे दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों में तनाव पैदा हुआ है. वहीं, दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मंच साझा करते हुए देखा गया है. इससे संकेत मिलते हैं कि भारत अब अपनी वैश्विक रणनीति में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है.
हाउडी मोदी से अब तक का सफर
2019 में अमेरिका के ह्यूस्टन में आयोजित 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम को दोनों नेताओं की दोस्ती का प्रतीक माना गया था. उस वक़्त ट्रंप और मोदी की जोड़ी को "ग्लोबल पावर पार्टनरशिप" के रूप में पेश किया गया था. लेकिन कुछ ही वर्षों में यह समीकरण पूरी तरह बदल गया है. बोल्टन ने चेतावनी देते हुए कहा कि ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री कीर स्टारमर समेत अन्य वैश्विक नेताओं को यह समझना चाहिए कि ट्रंप जैसे नेताओं के साथ करीबी रिश्ते शुरू में तो फायदेमंद लग सकते हैं, लेकिन जब बात मुश्किल फैसलों की आती है, तो यही दोस्ती आपकी ढाल नहीं बन पाती.
कूटनीति में स्थायित्व ज़रूरी
बोल्टन की टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि किसी भी देश की विदेश नीति सिर्फ नेताओं की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद पर आधारित नहीं होनी चाहिए. भारत और अमेरिका के बीच जो संबंध कभी 'स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' के रूप में देखे जाते थे, अब उन पर पुनर्विचार की ज़रूरत महसूस हो रही है.
यह भी पढ़ें: 'अमेरिकी सैनिक नहीं दे सकते सुरक्षा', यूक्रेन के साथ युद्ध पर ऐसा क्यों बोला रूस?