तालिबान ने बताया 'ग्रेटर अफगानिस्तान' का एजेंडा, कहा- 'डूरंड लाइन के पार अपनी जमीनलेने का समय...'

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवादित डूरंड लाइन और सीमा-संबंधी तनाव फिर से गरमाने लगे हैं. हाल ही में तुर्की में आयोजित बातचीत, जिसमें दोनों देशों के प्रतिनिधि शामिल थे, किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुँच सकी.

Taliban released the agenda of Greater Afghanistan
Image Source: Social Media

काबुल/इस्लामाबाद: अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवादित डूरंड लाइन और सीमा-संबंधी तनाव फिर से गरमाने लगे हैं. हाल ही में तुर्की में आयोजित बातचीत, जिसमें दोनों देशों के प्रतिनिधि शामिल थे, किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुँच सकी. तालिबान प्रवक्ता जबीउल्ला मुजाहिद ने कहा कि पाकिस्तान की ओर से सुरक्षा जिम्मेदारी केवल अफगानिस्तान पर डालने का प्रयास किया गया, जबकि खुद कोई कदम उठाने को तैयार नहीं था. इसी कारण बातचीत बेनतीजा समाप्त हो गई.

तालिबान ने स्पष्ट किया कि अफगानिस्तान अपनी जमीन का उपयोग किसी भी तीसरे पक्ष या विदेशी शक्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं होने देगा. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अफगान सुरक्षा बल पूरी तरह तैयार हैं और किसी भी खतरे का मुकाबला करने में सक्षम हैं.

‘ग्रेटर अफगानिस्तान’ की धमकी और नई रणनीति

तालिबान के उप गृह मंत्री मोहम्‍मद नबी उमरी ने हाल ही में खोश्‍त प्रांत में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों को अफगानिस्तान में शामिल करने की योजना का संकेत दिया. उमरी के अनुसार, डूरंड लाइन को कभी भी अफगानिस्तान ने मान्यता नहीं दी, और वर्तमान समय इस बात का अवसर है कि ऐतिहासिक रूप से अफगान क्षेत्र रहे इलाकों को वापस जोड़ा जा सके.

उमरी ने कहा कि उनका मानना है कि अफगानिस्तान और उसके नागरिक लंबे समय से खोए हुए क्षेत्रों को पुनः अपने हिस्से में जोड़ने की रणनीति बना रहे हैं. उन्होंने पाकिस्तान के खैबर पख़्तूनख़्वा, गिलगित-बाल्टिस्तान और बलूचिस्तान के कुछ हिस्सों को विशेष रूप से ग्रेटर अफगानिस्तान में शामिल करने का जिक्र किया.

तालिबान का आरोप: पाकिस्तान टीटीपी का समर्थन करता है

उमरी ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान की सेना केवल देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि विदेशी प्रभाव और निर्देशों के तहत कार्य कर रही है. उनका इशारा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों की नीतियों की ओर था.

उमरी ने स्पष्ट किया कि तालिबान टीटीपी (टीहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) का निर्माण नहीं करता और न ही उसका समर्थन करता है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी सेना ने टीटीपी के कुछ मांगों को स्वीकार किया और इस प्रक्रिया में स्थानीय राजनीतिक दबाव और नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का भी योगदान रहा.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: डूरंड लाइन और पश्तूनिस्तान

डूरंड लाइन का खिंचाव 1893 में ब्रिटिश इंडिया और अब के अफगानिस्तान के बीच हुआ था. अफगानिस्तान ने इस रेखा को कभी भी वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता नहीं दी. इस रेखा ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हजारों किलोमीटर लंबी सीमा बनाई, जो अब भी राजनीतिक और सामरिक तनाव का मुख्य कारण है.

तालिबान और अफगान सरकार के लिए यह मुद्दा केवल सुरक्षा या सीमाओं का नहीं है, बल्कि राष्ट्रीयता, पहचान और ऐतिहासिक अधिकारों का भी प्रतीक है. “ग्रेटर अफगानिस्तान” की अवधारणा, जिसे कभी-कभी पश्तूनिस्तान कहा जाता है, लंबे समय से विवाद का विषय रही है. यह विचार उन क्षेत्रों पर आधारित है जो ऐतिहासिक रूप से अफगान नियंत्रण में रहे हैं लेकिन अब पाकिस्तान का हिस्सा हैं.

ये भी पढ़ें- फिलीपींस ने तैनात किया 'ब्रह्मोस मिसाइल', चीन के लिए बढ़ी चुनौती, कैसे भारत ने बदल दिया पूरा खेल?