8690 किमी/घंटा की रफ्तार से चांद से टकराया SpaceX का Falcon 9, सामने आया खतरनाक वीडियो

अंतरिक्ष में छोड़ी गई हर वस्तु का सफर हमेशा तय मंजिल तक नहीं पहुंचता. कई बार वर्षों तक अंतरिक्ष में भटकने के बाद वही यान या रॉकेट किसी ग्रह, चंद्रमा या दूसरे खगोलीय पिंड से टकराकर विज्ञान के लिए नई कहानी लिख देता है. ऐसा ही एक ऐतिहासिक घटनाक्रम तब सामने आया जब स्पेसएक्स का विशाल फाल्कन 9 रॉकेट चांद की सतह से बेहद तेज गति से टकरा गया.

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Image Source: Social Media

अंतरिक्ष में छोड़ी गई हर वस्तु का सफर हमेशा तय मंजिल तक नहीं पहुंचता. कई बार वर्षों तक अंतरिक्ष में भटकने के बाद वही यान या रॉकेट किसी ग्रह, चंद्रमा या दूसरे खगोलीय पिंड से टकराकर विज्ञान के लिए नई कहानी लिख देता है. ऐसा ही एक ऐतिहासिक घटनाक्रम तब सामने आया जब स्पेसएक्स का विशाल फाल्कन 9 रॉकेट चांद की सतह से बेहद तेज गति से टकरा गया. इस टक्कर ने सिर्फ चांद की सतह पर नया गड्ढा ही नहीं बनाया, बल्कि वैज्ञानिकों के लिए एक ऐसा प्राकृतिक प्रयोग भी तैयार कर दिया, जिसकी मदद से चंद्रमा की संरचना, मिट्टी और सतह के व्यवहार को पहले से कहीं बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा. इस पूरी घटना की सबसे खास बात यह रही कि दक्षिण कोरिया के चंद्र ऑर्बिटर 'दानूरी' ने इस टक्कर को पहले और बाद दोनों अवस्थाओं में रिकॉर्ड कर लिया.

आखिर चांद तक कैसे पहुंचा फाल्कन 9 का दूसरा स्टेज?

स्पेसएक्स ने जनवरी 2025 में फाल्कन 9 रॉकेट को एक महत्वपूर्ण मिशन के तहत लॉन्च किया था. इस मिशन का उद्देश्य दो निजी चंद्र लैंडर्स को उनकी निर्धारित कक्षा तक पहुंचाना था. इनमें अमेरिका का ब्लू घोस्ट लूनर लैंडर और जापानी कंपनी आईस्पेस का रेजिलिएंस लैंडर शामिल था. मिशन के शुरुआती चरण पूरी तरह सफल रहे. फाल्कन 9 का पहला स्टेज हमेशा की तरह पृथ्वी पर सुरक्षित लौट आया और दोबारा इस्तेमाल के लिए रिकवर कर लिया गया. वहीं दूसरा स्टेज अपना काम पूरा करने के बाद अंतरिक्ष में ही रह गया. ईंधन समाप्त हो जाने के कारण यह किसी नियंत्रित दिशा में नहीं जा सका और धीरे-धीरे अंतरिक्ष में भटकता रहा.

समय बीतने के साथ सूर्य की गतिविधियों, गुरुत्वाकर्षण बल और अंतरिक्षीय कक्षाओं में होने वाले बदलावों ने इसकी दिशा बदल दी. आखिरकार यह लगभग 4000 किलोग्राम वजनी रॉकेट चांद की ओर बढ़ा और लगभग 8690 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उसकी सतह से टकरा गया.

आइंस्टीन क्रेटर के पास बना नया गड्ढा

वैज्ञानिकों के अनुसार यह टक्कर चांद के दक्षिणी हिस्से में स्थित आइंस्टीन क्रेटर के आसपास हुई. इतनी अधिक गति और भारी वजन के कारण चांद की सतह पर एक नया विशाल क्रेटर बन गया. शुरुआती अनुमान के मुताबिक यह गड्ढा लगभग 27 मीटर चौड़ा हो सकता है.

चंद्रमा पर वातावरण न होने के कारण वहां किसी भी टक्कर के निशान लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं. यही वजह है कि इस टक्कर से बने नए क्रेटर का अध्ययन आने वाले वर्षों तक किया जा सकेगा. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस घटना से चंद्रमा की ऊपरी सतह के नीचे मौजूद परतों के बारे में भी नई जानकारी मिल सकती है.

दानूरी ऑर्बिटर ने रिकॉर्ड किया पूरा घटनाक्रम

इस ऐतिहासिक घटना का सबसे अहम हिस्सा दक्षिण कोरिया का लूनर ऑर्बिटर 'दानूरी' बना. यह ऑर्बिटर वर्ष 2022 से चांद की कक्षा में लगातार काम कर रहा है और चंद्र ध्रुवीय क्षेत्रों का अध्ययन कर रहा है. कोरिया एयरोस्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट (KARI) के अनुसार दानूरी ने संभावित टक्कर से लगभग 30 मिनट पहले ही अपने कैमरों और वैज्ञानिक उपकरणों को सक्रिय कर दिया था. इसके बाद ऑर्बिटर ने कई बार उसी क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरते हुए लगातार तस्वीरें रिकॉर्ड कीं.

टक्कर से पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना करने पर साफ दिखाई देता है कि जहां पहले समतल सतह थी, वहां अब एक नया क्रेटर और आसपास बिखरा मलबा मौजूद है. इन तस्वीरों को वैज्ञानिक बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं क्योंकि इतनी स्पष्टता के साथ किसी नियोजित चंद्र टक्कर का रिकॉर्ड पहले बहुत कम मामलों में मिला है.

वैज्ञानिकों के लिए क्यों है यह एक सुनहरा मौका?

आमतौर पर जब उल्कापिंड या अन्य प्राकृतिक वस्तुएं चांद से टकराती हैं, तब उनके वजन, आकार और गति का सटीक अनुमान लगाना मुश्किल होता है. लेकिन इस मामले में वैज्ञानिकों को रॉकेट का द्रव्यमान, आकार, संरचना और संभावित टक्कर की गति पहले से ही पता थी.

यही वजह है कि यह घटना एक नियंत्रित वैज्ञानिक प्रयोग जैसी बन गई. अब वैज्ञानिक यह जांच सकेंगे कि उनके कंप्यूटर मॉडल कितने सही साबित हुए. यदि वास्तविक क्रेटर का आकार अनुमानित 27 मीटर के आसपास निकलता है, तो भविष्य में दूसरे ग्रहों और चंद्रमाओं पर होने वाली टक्करों के अध्ययन में भी इन मॉडलों का उपयोग और अधिक भरोसेमंद तरीके से किया जा सकेगा.

नासा और दक्षिण कोरिया मिलकर करेंगे विस्तृत अध्ययन

दानूरी द्वारा भेजे गए डेटा को केवल दक्षिण कोरिया ही नहीं बल्कि नासा भी विस्तार से अध्ययन करेगा. वैज्ञानिक इस जानकारी की तुलना नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर द्वारा जुटाए गए आंकड़ों से करेंगे. दो अलग-अलग मिशनों के डेटा को एक साथ जोड़ने से चंद्रमा की मिट्टी, सतह की मजबूती, धूल के फैलाव और टक्कर के प्रभावों का पहले से कहीं अधिक सटीक विश्लेषण संभव होगा. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अध्ययन भविष्य के मानव मिशनों और रोबोटिक लैंडिंग को भी अधिक सुरक्षित बनाने में मदद करेगा.

ब्लू घोस्ट और रेजिलिएंस मिशन का क्या हुआ?

जिस मिशन के तहत फाल्कन 9 लॉन्च किया गया था, उसमें दो अलग-अलग लूनर लैंडर्स भेजे गए थे. ब्लू घोस्ट लैंडर ने मार्च 2025 में सफलतापूर्वक चांद पर उतरकर अपना मिशन पूरा किया. दूसरी ओर रेजिलिएंस लैंडर अपनी लैंडिंग के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और मिशन सफल नहीं हो सका. हालांकि दोनों लैंडर्स की किस्मत अलग रही, लेकिन उनके मिशन के बाद बचा फाल्कन 9 का दूसरा स्टेज अब खुद एक नई वैज्ञानिक खोज का माध्यम बन गया.

पहले भी चांद पर गिरे हैं ऐसे रॉकेट 

यह पहली बार नहीं है जब किसी मानव निर्मित रॉकेट ने चांद से टक्कर मारी हो. अंतरिक्ष अभियानों के शुरुआती दौर से ही कई रॉकेट स्टेज चंद्रमा की सतह पर गिरते रहे हैं. मार्च 2022 में एक रॉकेट स्टेज चांद से टकराया था, जिसे लेकर लंबे समय तक यह बहस चली कि वह किस देश का था. इसके अलावा नासा के अपोलो मिशनों के दौरान भी सैटर्न-5 रॉकेट के तीसरे स्टेज को जानबूझकर चांद से टकराया गया था ताकि वैज्ञानिक वहां उत्पन्न होने वाले कंपन और भूकंपीय गतिविधियों का अध्ययन कर सकें.

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