कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने डिजिटल दुनिया को नई संभावनाएं दी हैं, लेकिन इसके साथ ही डीपफेक, फर्जी वीडियो, नकली ऑडियो और भ्रामक तस्वीरों जैसी चुनौतियां भी तेजी से बढ़ी हैं. बीते कुछ वर्षों में ऐसे मामलों ने न केवल लोगों की निजता और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि चुनाव, सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पर सवाल खड़े किए हैं. इसी बढ़ते खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं. नए संशोधनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इंटरनेट पर उपलब्ध एआई से तैयार सामग्री की स्पष्ट पहचान हो सके और गैरकानूनी डिजिटल कंटेंट के खिलाफ पहले से कहीं ज्यादा तेज और प्रभावी कार्रवाई की जा सके.
सरकार का मानना है कि एआई तकनीक का इस्तेमाल विकास और नवाचार के लिए होना चाहिए, न कि लोगों को भ्रमित करने या साइबर अपराधों को बढ़ावा देने के लिए. यही वजह है कि नए नियमों के जरिए सोशल मीडिया कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारियों को भी पहले से अधिक स्पष्ट और सख्त बनाया गया है.
डीपफेक के बढ़ते खतरे को देखते हुए बदले गए नियम
लोकसभा में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने जानकारी दी कि सरकार डीपफेक और एआई आधारित भ्रामक सामग्री को लेकर गंभीर है. उन्होंने कहा कि डीपफेक केवल नकली वीडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें एआई की मदद से तैयार किए गए ऑडियो, तस्वीरें और टेक्स्ट भी शामिल हैं. ऐसे कंटेंट का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की छवि खराब करने, लोगों को गुमराह करने या साइबर अपराधों को अंजाम देने के लिए किया जा सकता है.
इसी खतरे को देखते हुए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता और आईटी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत कानूनी और तकनीकी व्यवस्था को और मजबूत किया गया है.
अब एआई से बने हर कंटेंट की होगी स्पष्ट पहचान
नए नियमों के अनुसार एआई से तैयार किसी भी सामग्री पर स्पष्ट लेबल लगाना अनिवार्य होगा. इसके साथ ऐसा मेटाडेटा भी देना होगा जिससे यह आसानी से पता लगाया जा सके कि कंटेंट वास्तविक नहीं बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से तैयार किया गया है.
इस बदलाव का उद्देश्य आम इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को भ्रमित होने से बचाना है. जब किसी वीडियो, फोटो, ऑडियो या लेख पर एआई जनित होने का स्पष्ट संकेत होगा, तब लोग उसकी विश्वसनीयता को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे और फर्जी जानकारी के प्रसार पर भी काफी हद तक रोक लगाई जा सकेगी.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारियां बढ़ीं
सरकार ने नए नियमों के जरिए सोशल मीडिया कंपनियों पर भी अतिरिक्त जिम्मेदारियां तय की हैं. अब डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपने उपयोगकर्ताओं को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि फर्जी पहचान बनाना, एआई के जरिए किसी अन्य व्यक्ति का रूप धारण करना, भ्रामक जानकारी फैलाना, हिंसक या अश्लील सामग्री साझा करना और बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाली पोस्ट करना कानून का उल्लंघन है.
जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 50 लाख या उससे अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं, उन्हें भारत में शिकायत अधिकारी नियुक्त करना, स्थानीय अनुपालन अधिकारी रखना, नियमित अनुपालन रिपोर्ट प्रकाशित करना और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ समन्वय बनाए रखना अनिवार्य होगा. गंभीर मामलों में जांच एजेंसियों को आवश्यक तकनीकी सहयोग भी उपलब्ध कराना पड़ेगा.
गैरकानूनी कंटेंट हटाने की समयसीमा में बड़ा बदलाव
सरकार ने कार्रवाई की गति बढ़ाने के लिए समयसीमा में भी बड़ा बदलाव किया है. पहले सरकार या अदालत के निर्देश मिलने के बाद गैरकानूनी सामग्री हटाने के लिए 36 घंटे का समय दिया जाता था, लेकिन अब यह अवधि घटाकर केवल 3 घंटे कर दी गई है.
इसी तरह संवेदनशील शिकायतों के निपटारे की समयसीमा 72 घंटे से घटाकर 36 घंटे कर दी गई है. वहीं अत्यंत संवेदनशील मामलों में अब 24 घंटे की जगह केवल 2 घंटे के भीतर कार्रवाई करनी होगी. सरकार का मानना है कि डिजिटल अपराधों में तेजी से प्रतिक्रिया देना सबसे प्रभावी उपाय है, क्योंकि इंटरनेट पर फर्जी सामग्री कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है.
डीपफेक और गैर-सहमति वाले कंटेंट पर विशेष फोकस
नए नियमों में डीपफेक सामग्री के खिलाफ विशेष प्रावधान किए गए हैं. यदि कोई व्यक्ति एआई का इस्तेमाल कर किसी अन्य की पहचान का दुरुपयोग करता है या भ्रामक सामग्री तैयार करता है, तो संबंधित प्लेटफॉर्म को तत्काल कार्रवाई करनी होगी.
इसके अलावा बिना सहमति के साझा की गई अंतरंग तस्वीरों और वीडियो को भी तुरंत हटाना अनिवार्य होगा. बाल यौन शोषण से जुड़ी एआई जनित सामग्री की पहचान कर उसे तत्काल हटाने के लिए भी सोशल मीडिया कंपनियों को प्रभावी तकनीकी व्यवस्था विकसित करनी होगी.
एआई आधारित निगरानी प्रणाली भी होगी लागू
सरकार चाहती है कि केवल शिकायत मिलने का इंतजार न किया जाए, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म स्वयं भी ऐसी सामग्री की पहचान करें. इसी उद्देश्य से बड़े सोशल मीडिया मंचों को स्वचालित निगरानी तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया गया है.
इन तकनीकी प्रणालियों की मदद से डीपफेक वीडियो, नकली तस्वीरों, एआई आधारित फर्जी ऑडियो और अन्य हानिकारक डिजिटल सामग्री का प्रारंभिक स्तर पर ही पता लगाया जा सकेगा और उसके प्रसार को रोका जा सकेगा.
नियमों का उल्लंघन करने पर क्या होगा?
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई डिजिटल मंच इन नए नियमों का पालन नहीं करता, तो उसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा समाप्त हो सकती है. ऐसी स्थिति में संबंधित प्लेटफॉर्म के खिलाफ कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है. इसका मतलब यह है कि अब सोशल मीडिया कंपनियों के लिए नियमों का पालन केवल औपचारिकता नहीं रहेगा, बल्कि यह उनकी कानूनी जिम्मेदारी होगी.
डीपफेक से निपटने के लिए तकनीक और कानून दोनों पर जोर
सरकार ने बताया कि भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), शिकायत अपीलीय समिति (GAC), सहयोग पोर्टल और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के जरिए डीपफेक और साइबर अपराधों के खिलाफ कार्रवाई को और मजबूत किया जा रहा है.
साथ ही भारत एआई मिशन के तहत आईआईटी जोधपुर, आईआईटी मद्रास और आईआईटी खड़गपुर जैसे प्रमुख संस्थानों में डीपफेक की पहचान करने वाली अत्याधुनिक तकनीकों पर शोध किया जा रहा है. उद्देश्य यह है कि भविष्य में एआई का दुरुपयोग होने से पहले ही उसकी पहचान कर प्रभावी कार्रवाई की जा सके.
शिकायत कहां और कैसे दर्ज कर सकते हैं?
यदि किसी व्यक्ति को डीपफेक, फर्जी डिजिटल कंटेंट या किसी अन्य साइबर अपराध का सामना करना पड़ता है, तो वह राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकता है. इसके अलावा हेल्पलाइन नंबर 1930 पर भी तुरंत सहायता प्राप्त की जा सकती है. सरकार का कहना है कि शिकायतों के त्वरित निस्तारण के लिए साइबर सुरक्षा तंत्र को लगातार मजबूत किया जा रहा है ताकि पीड़ितों को जल्द राहत मिल सके.
डीपफेक पर कार्रवाई के लिए कौन-कौन से कानून लागू होंगे?
सरकार के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की विभिन्न धाराएं पहचान की चोरी, ऑनलाइन प्रतिरूपण, निजता के उल्लंघन, अश्लील सामग्री के प्रसार और अन्य गैरकानूनी डिजिटल गतिविधियों पर कार्रवाई की अनुमति देती हैं. वहीं भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत प्रतिरूपण के जरिए धोखाधड़ी, झूठे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तैयार करना, दुष्प्रचार फैलाना और संगठित साइबर अपराध जैसे मामलों में भी कठोर सजा का प्रावधान किया गया है. इन कानूनों का उद्देश्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जवाबदेही बढ़ाना और नागरिकों को साइबर खतरों से सुरक्षित रखना है.
जागरूकता अभियान भी होंगे तेज
सरकार केवल कानूनी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि लोगों को डिजिटल सुरक्षा के प्रति जागरूक बनाने पर भी जोर दे रही है. हर वर्ष साइबर सुरक्षा जागरूकता माह, सुरक्षित इंटरनेट दिवस, स्वच्छता पखवाड़ा और साइबर जागरूकता दिवस जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.
इसके अलावा भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम (CERT-In) समय-समय पर डीपफेक, एआई आधारित साइबर खतरों और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े दिशा-निर्देश जारी करती रहती है. सोशल मीडिया कंपनियों को भी धार्मिक संवेदनशीलता, भ्रामक एआई सामग्री और बिना सहमति के साझा किए गए निजी कंटेंट से जुड़े मामलों में अलग-अलग एडवाइजरी जारी की जाती है.
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