क्या है चांदीपुरा वायरस, जिससे गुजरात में हुई 22 बच्चों की मौत, यह क्यों माना जाता है खतरनाक?

चांदीपुरा वायरस के बढ़ते मामलों ने खासतौर पर छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. कम समय में कई मासूमों की मौत और दर्जनों संक्रमित बच्चों के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह सतर्क है.

chandipura-virus-gujarat-children-symptoms-prevention-health-alert-india
Image Source: Social Media

What is Chandipura Virus: देश में मानसून के साथ कई तरह की मौसमी बीमारियां तेजी से फैलने लगती हैं, लेकिन इस बार गुजरात से सामने आई एक वायरल बीमारी ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता कई गुना बढ़ा दी है. चांदीपुरा वायरस के बढ़ते मामलों ने खासतौर पर छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. कम समय में कई मासूमों की मौत और दर्जनों संक्रमित बच्चों के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह सतर्क है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह वायरस बेहद तेजी से मस्तिष्क को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इसके शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर चांदीपुरा वायरस क्या है, यह किन कारणों से फैलता है, इसके लक्षण कितने खतरनाक हो सकते हैं और बच्चों को इससे सुरक्षित रखने के लिए किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए.

गुजरात में बढ़ती चिंता, बच्चों पर सबसे ज्यादा असर

गुजरात में चांदीपुरा वायरस के संदिग्ध मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है. अब तक बड़ी संख्या में बच्चों में संक्रमण की आशंका जताई गई है, जबकि कई मामलों में इसकी पुष्टि भी हो चुकी है. सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में गांधीनगर, राजकोट, भावनगर, पाटन और साबरकांठा शामिल हैं, जहां अस्पतालों में बच्चों का इलाज चल रहा है. स्वास्थ्य विभाग लगातार निगरानी कर रहा है और प्रभावित इलाकों में विशेष सर्विलांस अभियान भी चलाए जा रहे हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, यह वायरस मुख्य रूप से 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को अपनी चपेट में लेता है. बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होने के कारण संक्रमण तेजी से गंभीर रूप ले सकता है.

क्या है चांदीपुरा वायरस और क्यों माना जाता है खतरनाक?

चांदीपुरा वायरस कोई नया संक्रमण नहीं है. इसकी पहली पहचान वर्ष 1965 में महाराष्ट्र के चांदीपुरा गांव में हुई थी, जिसके आधार पर इसका नाम रखा गया. यह एक आरएनए वायरस है, जो शरीर में प्रवेश करने के बाद सीधे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र यानी मस्तिष्क पर हमला करता है.

इस वायरस की सबसे बड़ी चुनौती इसकी तेज गति से बढ़ने वाली प्रकृति है. संक्रमण होने के कुछ ही घंटों में मरीज की हालत गंभीर हो सकती है. कई मामलों में वायरस मस्तिष्क में सूजन पैदा करता है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में एन्सेफलाइटिस कहा जाता है. यही कारण है कि समय पर इलाज नहीं मिलने पर जान का खतरा काफी बढ़ जाता है.

बच्चों को ही क्यों बनाता है ज्यादा शिकार?

डॉक्टरों का मानना है कि नौ महीने से लेकर लगभग 14-15 वर्ष तक के बच्चों में यह वायरस अधिक सक्रिय रूप से असर दिखाता है. इस उम्र में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पूरी तरह मजबूत नहीं होती, इसलिए वायरस तेजी से फैलकर दिमाग और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकता है. वयस्कों में संक्रमण की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती, लेकिन गंभीर बीमारी का खतरा बच्चों की तुलना में काफी कम माना जाता है.

आखिर यह वायरस फैलता कैसे है?

चांदीपुरा वायरस को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है. वास्तव में ऐसा नहीं है. यह संक्रमण सीधे संपर्क से नहीं फैलता, बल्कि कुछ विशेष प्रकार के कीट इसके वाहक होते हैं.

सबसे प्रमुख वाहक सैंडफ्लाई यानी बालू मक्खी मानी जाती है. यह मक्खी आमतौर पर मिट्टी के घरों, दीवारों की दरारों, सीलन वाली जगहों और गंदगी वाले क्षेत्रों में पनपती है. इसके अलावा कुछ विशेष प्रकार के मच्छर और किल्लनी भी वायरस के प्रसार में भूमिका निभा सकते हैं. मानसून के मौसम में नमी बढ़ने से इन कीटों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है, जिसके कारण संक्रमण फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है.

संक्रमण के शुरुआती लक्षणों को पहचानना क्यों जरूरी है?

चांदीपुरा वायरस के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन कुछ ही समय में स्थिति गंभीर हो सकती है. संक्रमित बच्चे को अचानक तेज बुखार आ सकता है. इसके साथ उल्टी, दस्त, सिरदर्द और अत्यधिक कमजोरी महसूस हो सकती है. कई बच्चों में दौरे पड़ने लगते हैं या शरीर अकड़ने लगता है. 

बीमारी बढ़ने पर बच्चा सुस्त हो जाता है, उसकी चेतना प्रभावित होने लगती है और वह बेहोशी की स्थिति में भी जा सकता है. यदि वायरस मस्तिष्क तक पहुंच जाता है तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है. इसलिए डॉक्टर ऐसे किसी भी लक्षण को हल्के में न लेने की सलाह देते हैं.

क्या इसका कोई इलाज या वैक्सीन मौजूद है?

फिलहाल चांदीपुरा वायरस के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है और न ही इसके लिए कोई स्वीकृत वैक्सीन मौजूद है. यही वजह है कि डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार सपोर्टिव उपचार देते हैं.

गंभीर मामलों में बच्चों को आईसीयू में भर्ती किया जाता है, जहां ऑक्सीजन सपोर्ट, वेंटिलेटर और अन्य जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं. इलाज का उद्देश्य शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को सुरक्षित रखना और संक्रमण के प्रभाव को कम करना होता है.

बचाव ही सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच

चूंकि इस वायरस का कोई निश्चित इलाज उपलब्ध नहीं है, इसलिए संक्रमण से बचाव सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि घरों की दीवारों में मौजूद दरारों को भरना चाहिए ताकि सैंडफ्लाई को पनपने की जगह न मिले. घर और आसपास नियमित साफ-सफाई बनाए रखना भी बेहद जरूरी है. जहां पशुपालन होता है, वहां समय-समय पर कीटनाशकों का छिड़काव किया जाना चाहिए.

बच्चों को पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनाना, रात में मच्छरदानी का इस्तेमाल करना और कीट प्रतिरोधी रिपेलेंट लगाना संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है. साथ ही घर के आसपास पानी जमा न होने देना और नमी कम रखना भी जरूरी है.

कब तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए?

यदि किसी बच्चे को अचानक तेज बुखार आए और उसके साथ लगातार उल्टी, दौरे, अत्यधिक सुस्ती, बेहोशी या व्यवहार में असामान्य बदलाव दिखाई दें, तो बिल्कुल भी देरी नहीं करनी चाहिए. ऐसे मामलों में तुरंत नजदीकी अस्पताल या बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना आवश्यक है.

चिकित्सकों का मानना है कि चांदीपुरा वायरस में शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. समय पर अस्पताल पहुंचने और उचित इलाज मिलने से गंभीर जटिलताओं को कम किया जा सकता है और बच्चे की जान बचाने की संभावना भी बढ़ जाती है.

ये भी पढ़ें: गोबरधन स्कीम, असम में फॉर लेन हाईवे... मोदी कैबिनेट की अहम बैठक, कई बड़े फैसलों पर लगी मुहर