AI की नकली तस्वीरों का खुलेगा राज, स्मार्टफोन बताएगा इमेज रियल है या फेक... जानें पूरी डिटेल

कुछ ही सेकंड में बनाई या बदली जा सकने वाली तस्वीरों के बीच यह पहचानना मुश्किल हो रहा है कि कैमरे से खींची गई तस्वीर वास्तविक है या किसी AI टूल की मदद से तैयार की गई है.

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AI Generated

AI के बढ़ते इस्तेमाल ने तस्वीरों की दुनिया को जितना आसान बनाया है, उतना ही भरोसे का संकट भी खड़ा कर दिया है. कुछ ही सेकंड में बनाई या बदली जा सकने वाली तस्वीरों के बीच यह पहचानना मुश्किल हो रहा है कि कैमरे से खींची गई तस्वीर वास्तविक है या किसी AI टूल की मदद से तैयार की गई है. ऐसे में टेक कंपनियां अब तस्वीर के साथ उसकी पहचान और स्रोत सुरक्षित रखने वाली तकनीक को अहम मान रही हैं.

तस्वीर के साथ दर्ज होगी उसकी डिजिटल पहचान

गूगल ने 2025 में अपने कुछ स्मार्टफोन कैमरों में कंटेंट ऑथेंटिसिटी से जुड़ी तकनीक देना शुरू किया है. यह सी2पीए यानी कोएलिशन फॉर कंटेंट प्रोवेनेंस एंड ऑथेंटिसिटी जैसे मानकों पर आधारित है. निकोन, सोनी और कैनन जैसे कैमरा निर्माता भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. इस तकनीक का उद्देश्य तस्वीर के साथ उसकी उत्पत्ति, डिवाइस और उससे जुड़ी दूसरी जानकारी दर्ज करना है, ताकि बाद में उसकी डिजिटल हिस्ट्री की जांच की जा सके.

एपल भी ला सकता है ऑथेंटिसिटी फीचर

एपल भी तस्वीरों की प्रामाणिकता से जुड़ी व्यवस्था पर काम कर सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी के अगले ऑपरेटिंग सिस्टम में 'रेफरेंस इमेज' जैसा फीचर देखने को मिल सकता है. इसके जरिए तस्वीर के साथ मेटाडाटा सुरक्षित रखा जा सकेगा. साथ ही तस्वीर को एक यूनिक आइडी मिलने की संभावना है, जिससे उसके बनाए जाने का समय और इस्तेमाल किए गए डिवाइस जैसी जानकारी जुटाई जा सकेगी.

हर तस्वीर को सत्यापित करने की गारंटी नहीं

हालांकि, ऐसी तकनीक को AI फेक तस्वीरों का अंतिम समाधान मानना सही नहीं होगा. कई मामलों में ऑथेंटिसिटी फीचर डिफॉल्ट रूप से बंद रह सकता है और यूजर को इसे खुद सक्रिय करना पड़ सकता है. इसके अलावा, पहले से मौजूद तस्वीरों पर यह व्यवस्था लागू नहीं होगी. यानी तस्वीर लेते समय ही उसकी डिजिटल प्रामाणिकता दर्ज करने की जरूरत होगी, तभी बाद में उसकी पुष्टि की जा सकेगी.

असली तस्वीर भी दे सकती है गलत संदेश

तस्वीर का वेरिफाइड होना यह साबित नहीं करता कि उससे निकाला गया हर निष्कर्ष सही है. कैमरा किस एंगल से तस्वीर ले रहा था, तस्वीर कितनी दूरी से खींची गई और उस वक्त वहां की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं, इन सबका असर उसके अर्थ पर पड़ता है. इसलिए एक वास्तविक तस्वीर भी अधूरे संदर्भ या गलत दावे के साथ लोगों को गुमराह कर सकती है.

'वेरिफाइड' टैग को भी समझदारी से देखें

किसी तस्वीर पर प्रामाणिकता का निशान दिखने पर उसे बिना सवाल किए सच मान लेना ठीक नहीं होगा. उसी तरह किसी तस्वीर पर ऐसा कोई निशान नहीं है तो इसका अर्थ यह भी नहीं कि तस्वीर नकली है. कंटेंट ऑथेंटिसिटी तकनीक तस्वीर के स्रोत और उसकी डिजिटल यात्रा के बारे में अहम संकेत दे सकती है, लेकिन वह तस्वीर के पीछे की पूरी कहानी बताने में सक्षम नहीं है.

AI के दौर में तकनीक के साथ समझ भी जरूरी

आने वाले समय में तस्वीरों की विश्वसनीयता जांचने के लिए कंटेंट ऑथेंटिसिटी तकनीक अहम भूमिका निभा सकती है, लेकिन इसका इस्तेमाल अकेले काफी नहीं होगा. तस्वीर कहां से आई, उसे किसने साझा किया और उसके स्रोत पर कितना भरोसा किया जा सकता है, इन सवालों की पड़ताल भी जरूरी रहेगी. AI के दौर में तस्वीर पर भरोसा करने का सही तरीका तकनीक और इंसानी समझ, दोनों को साथ लेकर चलना ही होगा.

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