Saudi Arabia Power Struggle: बीते कुछ दिनों में सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय राजनीति और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के तीन अलग-अलग मोर्चों पर झटके झेलने पड़े हैं. 30 जनवरी से शुरू हुई घटनाओं की कड़ी में अमेरिका-ईरान तनाव के बीच सऊदी अरब की दोहरी रणनीति उजागर हुई, तथाकथित ‘इस्लामिक नाटो’ की दिशा में उठाया गया कदम कमजोर पड़ गया और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की सत्ता संरचना में हस्तक्षेप की कोशिश भी सफल नहीं हो सकी. इन तीनों घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि मध्य-पूर्व में सऊदी अरब की कूटनीतिक पकड़ को फिलहाल कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
Met with @SecRubio, @SecWar, and @SEPeaceMissions to review the strategic relations between our countries and explore prospects for enhancing our cooperation. We also discussed our efforts to advance regional and global peace and stability. pic.twitter.com/RKf9ySKIf2
— Khalid bin Salman خالد بن سلمان (@kbsalsaud) January 30, 2026
1. अमेरिका-ईरान तनाव के बीच सऊदी की दोहरी नीति बेनकाब
29 और 30 जनवरी के बीच सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान वॉशिंगटन दौरे पर थे. वह सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के छोटे भाई हैं और अमेरिका के शीर्ष नीति-निर्माताओं से मुलाकात कर रहे थे. इस दौरान उनकी पेंटागन और व्हाइट हाउस में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और राष्ट्रपति ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ से बातचीत हुई.
सार्वजनिक तौर पर सऊदी अरब यह रुख अपनाए हुए था कि वह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के पक्ष में है और किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए अपने एयरस्पेस के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देगा. खुद को मध्यस्थ की भूमिका में पेश करते हुए रियाद यह संदेश दे रहा था कि वह क्षेत्र में युद्ध को टालना चाहता है.
लेकिन इस कूटनीतिक छवि के उलट, वॉशिंगटन में हुई एक कथित गोपनीय बातचीत लीक हो गई. रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रिंस खालिद बिन सलमान ने निजी ब्रीफिंग में यह कहा कि अगर अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी धमकियों को अमल में नहीं लाता, तो तेहरान और ज्यादा मजबूत होकर उभरेगा. बैठक में मौजूद सूत्रों का मानना था कि सऊदी रक्षा मंत्री का रुख यह था कि सैन्य कार्रवाई को टालने से ईरान को यह संदेश जाएगा कि वह बिना किसी ठोस जवाब के अपनी ताकत बढ़ा सकता है.
इस लीक के बाद सऊदी अरब की दोहरी नीति सामने आ गई, एक तरफ दुनिया के सामने शांति और मध्यस्थता की बात, दूसरी तरफ बंद दरवाजों के पीछे सख्त रुख की वकालत. इससे ईरान के प्रति सऊदी नीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठने लगे.
2. ‘इस्लामिक नाटो’ की अवधारणा को झटका, तुर्किये ने दूरी बनाई
सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक अहम रक्षा समझौता हुआ था. इस समझौते के तहत यह तय किया गया कि अगर दोनों में से किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दूसरे देश पर हमला माना जाएगा. इस तरह का प्रावधान NATO के आर्टिकल-5 से मिलता-जुलता है, जिसके अनुसार किसी एक सदस्य देश पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है.
इसी वजह से कई रक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों ने इस समझौते को ‘इस्लामिक नाटो’ की दिशा में पहला ठोस कदम बताया था. चर्चा यह भी थी कि आने वाले समय में तुर्किये जैसे सैन्य रूप से मजबूत मुस्लिम देश इस पहल में शामिल हो सकते हैं. तुर्किये की सेना NATO में अमेरिका के बाद दूसरी सबसे बड़ी मानी जाती है और उसकी ड्रोन टेक्नोलॉजी, रक्षा उत्पादन क्षमता और सैन्य प्रशिक्षण प्रणाली को दुनिया भर में अहम माना जाता है.
हालांकि 1 फरवरी को तुर्किये ने साफ कर दिया कि वह इस तरह के किसी रक्षा समझौते का हिस्सा नहीं बनेगा. तुर्किये के इस फैसले से सऊदी अरब की उस रणनीति को झटका लगा, जिसमें वह व्यापक मुस्लिम रक्षा गठबंधन के जरिए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे को नया आकार देना चाहता था. सऊदी सूत्रों ने भी बाद में कहा कि पाकिस्तान के साथ हुआ समझौता द्विपक्षीय ही रहेगा और इसे किसी बड़े गठबंधन में बदलने की फिलहाल योजना नहीं है.
तुर्किये के पीछे हटने से यह साफ हो गया कि मुस्लिम देशों के बीच एक NATO-जैसा सामूहिक सुरक्षा ढांचा खड़ा करना फिलहाल आसान नहीं है. अलग-अलग देशों के हित, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धाएं और वैश्विक गठबंधनों से जुड़े समीकरण इस राह में बड़ी बाधा बने हुए हैं.
3. UAE की सत्ता राजनीति में सऊदी की रणनीति को झटका
तीसरा बड़ा झटका सऊदी अरब को संयुक्त अरब अमीरात की अंदरूनी सत्ता राजनीति के मोर्चे पर लगा. UAE के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने हाल ही में अपने बेटे को करीब 260 अरब डॉलर की संपत्ति सौंप दी. यह फैसला ऐसे समय लिया गया, जब UAE और सऊदी अरब के रिश्तों में कुछ रणनीतिक मतभेद उभर कर सामने आ रहे हैं.
राष्ट्रपति के इस कदम को सत्ता हस्तांतरण की दिशा में बड़ा संकेत माना जा रहा है. विश्लेषकों के मुताबिक, इससे यह स्पष्ट होता है कि भविष्य में UAE की बागडोर उनके बेटे के हाथों में जाने की तैयारी की जा रही है. वॉल स्ट्रीट जनरल जैसी रिपोर्ट्स में भी इसे सत्ता संरचना को मजबूत करने और उत्तराधिकार को स्पष्ट करने के कदम के रूप में देखा गया है.
इसी बीच, जायद अल नाहयान परिवार के भीतर सत्ता संतुलन को लेकर भी खींचतान की चर्चाएं सामने आईं. सऊदी अरब कथित तौर पर शेख तहनून बिन जायद अल नाहयान को समर्थन दे रहा था. शेख तहनून राष्ट्रपति के छोटे भाई हैं और UAE के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होने के साथ-साथ देश के सबसे बड़े वेल्थ फंड की कमान भी संभालते हैं. वह सुरक्षा और खुफिया मामलों में प्रभावशाली भूमिका के कारण ‘स्पाई शेख’ के नाम से जाने जाते हैं.
तहनून करीब 1.3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के निवेश और संपत्ति नेटवर्क से जुड़े माने जाते हैं, जिसमें सरकारी और निजी फंड शामिल हैं. उनकी वैश्विक निवेश जगत में मजबूत पकड़ है और उन्हें दुनिया के प्रभावशाली निवेशकों में गिना जाता है. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ उनके करीबी रिश्तों की भी चर्चा होती रही है.
लेकिन राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद द्वारा अपने बेटे को संपत्ति और उत्तराधिकार की दिशा में आगे बढ़ाने से यह साफ हो गया कि UAE की सत्ता संरचना पर बाहरी प्रभाव की गुंजाइश सीमित है. इससे सऊदी अरब की वह कोशिश कमजोर पड़ गई, जिसमें वह क्षेत्रीय सहयोगियों के अंदरूनी समीकरणों में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहता था.
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