रूस-यूक्रेन सीजफायर पर संशय बरकरार! इन 19 बिंदुओं को मानने को राजी हुए जेलेंस्की, लेकिन 9 पर नहीं आया अपडेट

Russia Ukraine War Update: लगभग तीन साल से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध को थामने के लिए अब कूटनीतिक कोशिशों में बड़ा मोड़ आ गया है. पहली बार ऐसा हो रहा है जब अमेरिका, रूस और यूक्रेन, तीनों के बीच एक साझा ढांचा बन रहा है.

Russia-Ukraine ceasefire Zelensky agreed to accept these 19 points
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Russia Ukraine War Update: लगभग तीन साल से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध को थामने के लिए अब कूटनीतिक कोशिशों में बड़ा मोड़ आ गया है. पहली बार ऐसा हो रहा है जब अमेरिका, रूस और यूक्रेन, तीनों के बीच एक साझा ढांचा बन रहा है. स्विट्जरलैंड के जिनेवा में चल रही गुप्त लेकिन निर्णायक वार्ताओं के बीच अमेरिकी पहल पर तैयार किए गए शांति समझौते में भारी बदलाव किए गए हैं. पहले जहां युद्ध विराम के लिए 28 सूत्रीय ब्लूप्रिंट तैयार किया गया था, अब उसे घटाकर 19 बिंदुओं में समेट दिया गया है. यह संकेत है कि बातचीत अधिक वास्तविक और व्यावहारिक दिशा में बढ़ रही है.

अमेरिका और रूस द्वारा तैयार मसौदा, जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सामने आया, तब उसे "अस्वीकार्य" और "समर्पण जैसा" बताया गया था. लेकिन अब जिनेवा में यूक्रेनी, यूरोपीय और अमेरिकी प्रतिनिधियों के बीच लंबी और गहन बातचीत के बाद मसौदे को दोबारा आकार दिया गया है. इसमें उन सभी धाराओं को हटाया गया है, जिन पर यूक्रेन ने तीखी आपत्ति दर्ज की थी.

जेलेंस्की आखिर क्यों हुए संतुष्ट?

जिनेवा बैठक के बाद जेलेंस्की ने बताया कि संशोधित मसौदा कहीं अधिक “व्यवहारिक” और “संतुलित” है. उनके अनुसार अब फ्रेमवर्क में वही बिंदु बचे हैं जो युद्ध को रोकने और सुरक्षा की गारंटी देने के लिए जरूरी हैं. इससे यह भी स्पष्ट संदेश गया है कि यूक्रेन पीछे हटने को तैयार नहीं, बल्कि अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए समझौते की दिशा में बढ़ रहा है.

यह संशोधन इस बात का संकेत भी है कि अमेरिका अब अपनी शांति रणनीति को यूक्रेन की सहमति के बगैर आगे नहीं बढ़ा सकता, ठीक वैसे ही जैसे 2021 की अलास्का वार्ता के बाद अमेरिका की एकतरफा कोशिशों पर यूरोप ने विरोध जताया था.

रूस की सतर्क प्रतिक्रिया, अभी दस्तावेज नहीं देखा

क्रेमलिन की प्रतिक्रिया फिलहाल सावधानी भरी है. प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि “अभी तक हमें किसी आधिकारिक दस्तावेज की प्रतिलिपि नहीं मिली है, केवल मीडिया रिपोर्टें देख रहे हैं. इसलिए प्रतिक्रिया देना जल्दबाजी होगी.”

हालांकि, रूस के वरिष्ठ विदेश नीति सलाहकार यूरी उशाकोव ने कहा कि अमेरिकी मसौदे के कई हिस्से स्वीकार्य हैं, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को दोबारा तैयार करने की जरूरत है. यह संकेत भी मिलता है कि रूस बातचीत बंद नहीं करना चाहता, लेकिन अंतिम मसौदा उसके हितों के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें शायद क्षेत्रीय नियंत्रण, सुरक्षा ज़ोन और भविष्य में नाटो के विस्तार को लेकर बड़े निर्णय शामिल होंगे.

यूरोप को अमेरिका की पहल पर क्यों शक है?

अमेरिका की इस अग्रणी भूमिका से यूरोप खुश नहीं है. यूरोपीय देशों ने भी अपना 28 बिंदुओं वाला फ्रेमवर्क तैयार किया था और इसके लिए अंगोला में आपात बैठक भी हुई. यूरोप की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अमेरिका बिना समन्वय के यूक्रेन पर दबाव ना बना दे, जैसा कि अतीत में देखा गया है.

यूरोपीय दृष्टिकोण स्पष्ट है कि जो भी समझौता हो, वह वर्तमान सैन्य रेखा पर आधारित होना चाहिए, न कि यूक्रेन से ज़मीन वापस करने की कोई बाध्यता. दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन का रवैया यूरोप से बिल्कुल अलग दिख रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में यूक्रेन पर दबाव कम कर दिया है और वे किसी भी तरह जल्द से जल्द समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं. उनके लिए यह संघर्ष रणनीतिक कम और आर्थिक-राजनीतिक सौदेबाजी का विषय अधिक है.

युद्धविराम की कोशिशें और मैदान में बढ़ते हमले

कूटनीतिक बातचीत के बावजूद युद्ध की आग अभी भी नहीं बुझी है. 25 नवंबर को रूस ने कीव पर ड्रोन और किंझल बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया, जिसमें चार नागरिकों की मौत हुई और आठ घायल हुए. उधर, यूक्रेन भी जवाबी कार्रवाई में पीछे नहीं हट रहा. यूक्रेनी ड्रोन ने रूस के क्रास्नोडर क्राइ और रोस्तोव ओब्लास्ट क्षेत्रों को निशाना बनाया.

इससे साफ है कि जबकि वार्ताएं जिनेवा की मेज पर जारी हैं, युद्धभूमि पर दोनों पक्ष अपनी स्थिति मजबूत करने में लगे हुए हैं, जो किसी भी भविष्य के समझौते को प्रभावित करेगा.

क्या सच में शांति की उम्मीद की जा सकती है?

अगर अमेरिका, रूस और यूक्रेन किसी साझा फ्रेमवर्क पर सहमत होते हैं, तो यह 2022 के युद्ध की शुरुआत के बाद पहला बड़ा कूटनीतिक ब्रेकथ्रू होगा. 19 सूत्रीय मसौदे का स्वीकार होना यह संकेत देता है कि सभी पक्ष किसी रास्ते की तलाश करना चाहते हैं, लेकिन जमीन पर लड़ाई की आक्रामकता यह भी दिखाती है कि अंतिम समझौता आसान नहीं होगा.

फिलहाल दुनिया की निगाहें जिनेवा की मेज पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि क्या यह युद्ध ठहराव पर पहुंचेगा, या बर्फ की तरह धीरे-धीरे पिघलता हुआ एक नए भू-राजनीतिक समीकरण का रूप लेगा.

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