यूक्रेन युद्ध के चलते रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव पहले से ही चरम पर है. लेकिन अब हालिया घटनाओं से संकेत मिल रहे हैं कि रूस, आर्कटिक क्षेत्र को भविष्य के संघर्ष के एक संभावित मोर्चे के रूप में विकसित कर रहा है. इस क्षेत्र में रूस की बढ़ती सैन्य गतिविधियों, खासकर परमाणु पनडुब्बियों द्वारा मिसाइल परीक्षणों ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है.
परमाणु पनडुब्बियों से मिसाइल लॉन्च
सितंबर की शुरुआत में रूस की पैसिफिक फ्लीट की एक ऑस्कर-II क्लास की परमाणु पनडुब्बी "ओम्स्क" ने उत्तरी प्रशांत महासागर में P-700 ग्रेनिट सुपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल का सफल परीक्षण किया. इस मिसाइल ने लगभग 2.5 मैक की रफ्तार से 250 किलोमीटर दूर स्थित लक्ष्य को निशाना बनाया. इसी ऑपरेशन के दौरान यासेन-एम क्लास की पनडुब्बी "क्रास्नोयार्स्क" ने भी दो P-800 ओनिक्स मिसाइलें दागीं, जो अपने हाई-स्पीड और सटीकता के लिए जानी जाती हैं.
इस सैन्य अभ्यास ने साफ संकेत दे दिया है कि रूस न केवल अपनी समुद्री ताकत का प्रदर्शन कर रहा है, बल्कि वह प्रशांत क्षेत्र और आर्कटिक के बीच के सामरिक मार्गों की सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है.
2000 की कुर्स्क त्रासदी से रूस ने सबक लिया?
यह उल्लेखनीय है कि 12 अगस्त 2000 को रूस की परमाणु पनडुब्बी "कुर्स्क" एक नौसैनिक अभ्यास के दौरान बारेंट्स सागर में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी, जिसमें सभी 118 नौसैनिक मारे गए थे. इस हादसे ने रूस को अपनी पनडुब्बी प्रणाली और बचाव प्रबंधन की गंभीर समीक्षा करने पर मजबूर किया. उसी के बाद से रूस ने अपनी ऑस्कर-II पनडुब्बियों को तकनीकी रूप से उन्नत करने, उनकी मिसाइल क्षमताओं को बेहतर बनाने और समुद्री अवरोधन (Sea Denial) क्षमताओं को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए.
आज, रूस की यही पनडुब्बियां अत्याधुनिक सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों से लैस हैं, जिनमें P-700 ग्रेनिट, P-800 ओनिक्स, और 3M22 जिरकॉन जैसे हथियार शामिल हैं. इन मिसाइलों की रेंज और गति इतनी अधिक है कि वे पश्चिमी नौसेना बलों के लिए एक गंभीर चुनौती पेश कर सकती हैं.
आर्कटिक क्षेत्र क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
आर्कटिक क्षेत्र, विशेष रूप से Northern Sea Route (NSR), वैश्विक व्यापार और सामरिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण होता जा रहा है. जलवायु परिवर्तन के चलते इस क्षेत्र में बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं. ये मार्ग एशिया से यूरोप तक की दूरी को 30-40% तक कम कर सकते हैं.
उदाहरण के लिए:
रूस ने इस संभावना को भांपते हुए अपने आर्कटिक तट पर बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स टर्मिनल, और आइसब्रेकर बेड़े का तेजी से विकास किया है. इसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों (जैसे तेल और गैस) का दोहन करना और वैश्विक व्यापार में एक निर्णायक भूमिका निभाना है.
अमेरिका और NATO की क्यों बढ़ी चिंता?
रूस की यह रणनीति पश्चिमी देशों के लिए एक नई चुनौती बनती जा रही है. अगस्त 2025 में अमेरिका और कनाडा ने अलास्का में "नॉर्दर्न एज 2025" नामक एक बड़ा सैन्य अभ्यास किया, जिसमें 6,400 सैनिक, 100 से अधिक विमान, और 7 युद्धपोत शामिल थे. जवाब में, रूस और चीन ने भी "संयुक्त सागर 2025" नाम से एक सैन्य अभ्यास किया, जो अमेरिका की गतिविधियों के बिल्कुल करीब आयोजित किया गया.
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका, रूस और उनके सहयोगी अब सिर्फ यूक्रेन या यूरोप तक ही सीमित नहीं हैं, प्रशांत और आर्कटिक क्षेत्र भी इस वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्ष के नए मोर्चे बनते जा रहे हैं.
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