कागज नहीं अब प्लास्टिक के होंगे भारतीय नोट! RBI कर रहा पॉलिमर करेंसी लाने की तैयारी, जानें वजह

देश में जल्द ही नोटों का स्वरूप बदल सकता है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब पारंपरिक कागज के नोटों की जगह पॉलिमर यानी प्लास्टिक से बने नोटों को चलन में लाने की संभावना पर गंभीरता से काम कर रहा है.

RBI is preparing to introduce polymer currency plastic indian notes
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

देश में जल्द ही नोटों का स्वरूप बदल सकता है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब पारंपरिक कागज के नोटों की जगह पॉलिमर यानी प्लास्टिक से बने नोटों को चलन में लाने की संभावना पर गंभीरता से काम कर रहा है. हाल के महीनों में हुई केंद्रीय बैंक की बोर्ड बैठकों में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है. माना जा रहा है कि आने वाले समय में आम लोगों के लिए पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर प्लास्टिक नोटों की शुरुआत की जा सकती है.

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में देश में नकदी की मांग लगातार तेजी से बढ़ी है. इसके साथ ही कागज के नोटों की छपाई पर होने वाला खर्च भी काफी बढ़ गया है. कागज के नोट जल्दी फट जाते हैं, गंदे हो जाते हैं और उनकी उम्र सीमित होती है. इन्हीं समस्याओं को देखते हुए RBI अब ऐसे विकल्प की तलाश में है जो लंबे समय तक टिकाऊ होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी फायदेमंद साबित हो.

नोट छापने की लागत लगातार बढ़ रही

RBI की वित्त वर्ष 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, नोटों की छपाई पर 6,372.8 करोड़ रुपये का खर्च आया. इससे पहले के वित्त वर्ष में यह आंकड़ा 5,101.4 करोड़ रुपये था. यानी सिर्फ एक साल में नोट छापने की लागत में बड़ा उछाल देखने को मिला है. विशेषज्ञों का मानना है कि पॉलिमर नोट शुरुआती स्तर पर थोड़े महंगे जरूर होते हैं, लेकिन उनकी लंबी उम्र के कारण लंबे समय में वे ज्यादा किफायती साबित होते हैं.

सूत्रों के मुताबिक, देश के अधिकांश एटीएम और कैश प्रोसेसिंग मशीनें अब इतनी आधुनिक हो चुकी हैं कि वे आसानी से पॉलिमर नोटों को पहचान सकती हैं. यही कारण है कि तकनीकी स्तर पर अब पहले जैसी दिक्कतें नहीं बची हैं.

कटे-फटे नोटों की समस्या से मिलेगी राहत

देश में हर साल बड़ी संख्या में खराब और फटे नोटों को चलन से हटाना पड़ता है. वित्त वर्ष 2025 के दौरान करीब 23.8 अरब खराब नोटों को सिस्टम से बाहर किया गया. यह पिछले वर्ष के मुकाबले लगभग 12.3 प्रतिशत अधिक है. इनमें सबसे ज्यादा 500 रुपये के नोट शामिल थे, जबकि उसके बाद 100 रुपये के नोटों की संख्या रही.

फटे और मैले नोटों को बदलना, इकट्ठा करना और नष्ट करना RBI के लिए एक बड़ा प्रशासनिक और आर्थिक बोझ बन चुका है. ऐसे में पॉलिमर नोट एक बेहतर विकल्प माने जा रहे हैं क्योंकि ये पानी, धूल और नमी से कम प्रभावित होते हैं. इनकी मजबूती कागज के नोटों से कई गुना अधिक होती है और ये लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं.

डिजिटल पेमेंट बढ़ा, नकदी का इस्तेमाल भी रिकॉर्ड

देश में UPI और डिजिटल भुगतान का दायरा तेजी से बढ़ा है, लेकिन इसके बावजूद नकदी का इस्तेमाल कम नहीं हुआ. 15 मई तक देश में चलन में मौजूद कुल मुद्रा यानी Currency in Circulation (CiC) सालाना आधार पर 11.5 प्रतिशत बढ़कर 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई.

यह आंकड़ा बताता है कि आम लोगों के बीच कैश की जरूरत अब भी बनी हुई है. ऐसे में यदि पॉलिमर नोट लागू होते हैं तो RBI पर बार-बार नए नोट छापने का दबाव कम होगा और नोटों की लाइफ भी बढ़ेगी.

छोटे नोटों की मांग बनी चुनौती

10 रुपये और 20 रुपये जैसे छोटे मूल्य के नोटों की मांग देशभर में लगातार बनी रहती है. हालांकि कुल मुद्रा में इनकी हिस्सेदारी बेहद कम है, लेकिन रोजमर्रा के लेनदेन में इनका महत्व काफी ज्यादा है. RBI ने छोटे नोटों की जगह सिक्कों के इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश भी की, लेकिन लोगों ने नोटों को ज्यादा प्राथमिकता दी.

यही वजह है कि छोटे मूल्य वर्ग के टिकाऊ नोटों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है. पॉलिमर नोट इस दिशा में एक प्रभावी समाधान माने जा रहे हैं.

पहले भी हो चुका है ट्रायल

भारत में पॉलिमर नोटों का विचार नया नहीं है. साल 2012 में तत्कालीन सरकार ने पांच शहरों में 10 रुपये के लगभग एक अरब प्लास्टिक नोटों का परीक्षण शुरू किया था. उस समय उद्देश्य नोटों की टिकाऊ क्षमता को परखना था. हालांकि तकनीकी सीमाओं और अन्य चुनौतियों के चलते यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी.

अब करीब एक दशक बाद परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं. प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी पहले से कहीं अधिक आधुनिक हो गई है और बैंकिंग सिस्टम भी अधिक सक्षम बन चुका है. ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार पॉलिमर नोटों की राह पहले की तुलना में आसान हो सकती है.

दुनिया के कई देशों में सफल है पॉलिमर करेंसी

दुनिया के लगभग 60 देशों में पॉलिमर बैंक नोटों का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसकी शुरुआत 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने 10 डॉलर के प्लास्टिक नोट से की थी. इसके बाद सिंगापुर, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया और कनाडा जैसे कई देशों ने इस तकनीक को अपनाया.

यूरोप में रोमानिया ऐसा पहला देश था जिसने 1998 में प्लास्टिक नोट जारी किए. कनाडा ने 2011 में अपने बैंकिंग सिस्टम में पॉलिमर नोटों को पूरी तरह शामिल कर लिया. वहीं अमेरिकी डॉलर अब भी विशेष कॉटन और लिनन मिश्रण से बनाए जाते हैं, पूरी तरह प्लास्टिक से नहीं.

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