Political Popcorn: गडकरी के 'पीढ़ीगत बदलाव' से पंजाब के नए गठजोड़ तक... सियासी गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज

वन नेशन-वन इलेक्शन की चर्चा, नितिन गडकरी के बयान, गुजरात में नेतृत्व को लेकर अटकलों और पंजाब में BJP-अकाली गठबंधन की सुगबुगाहट ने सियासी गलियारों का तापमान बढ़ा दिया है.

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Political Popcorn

1.घड़ी की सुई एक, पर धड़कनें अनेक !

'एक देश, एक चुनाव' की सुगबुगाहट !

संसद की संयुक्त समिति जब से 'वन नेशन, वन इलेक्शन' को लेकर अलग-अलग राज्यों के दौरे पर निकली है, नेताओं की कलाई पर बंधी घड़ियां कुछ ज्यादा ही तेज चलने लगी हैं. सत्ता पक्ष का तर्क है कि बार-बार के चुनावी खर्च और आचार संहिता के पहिए से विकास की गाड़ी रुकती है, जो अपनी जगह वाजिब भी दिखता है. अलबत्ता क्षेत्रीय क्षत्रपों की चिंता यह है कि कहीं राष्ट्रीय मुद्दों की आंधी में उनके स्थानीय समीकरण न उड़ जाएं. बैठक के कमरों में चाय के प्यालों से भाप कम और तारीखों के नफे-नुकसान का धुआं ज्यादा निकल रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक इस माथापच्ची को देख कर मुस्कुरा रहे हैं कि जो दल कल तक समय से पहले चुनाव की मांग करते थे, वे अब कैलेंडर को धीरे पलटने की वकालत कर रहे हैं. अब देखना यह है कि साझा सहमति की यह रेल किस स्टेशन पर जाकर रुकती है !

2.आखिर क्यों उदास है नितिन गडकरी का मन ?

गडकरी का 'पीढ़ीगत बदलाव' वाला फलसफा,संकोच, सच या सियासी संकेतों का नया मोड़?  

​देश भर में सड़कों और हाईवे का जाल बिछाकर दूरी नापने वाले केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी जब अपने गृह नगर नागपुर में माइक थामते हैं, तो उनकी हर बात का एक अलग वजन होता है. एकल विद्यालय से जुड़े एक कार्यक्रम में उन्होंने सहज भाव से कहा-"30 साल से सार्वजनिक जीवन में काम कर रहा हूं, बहुत उतार-चढ़ाव देखे... लेकिन अब मैं ज्यादा काम नहीं कर सकता, नई पीढ़ी आगे आए" गडकरी का यह बयान सामने आते ही दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक के सियासी गलियारों में सुगबुगाहटों का पारा अचानक चढ़ गया.  

​सचमुच अपने बेबाक अंदाज और लीक से हटकर काम करने की शैली के लिए मशहूर नेता जब खुद काम से थोड़ा पीछे हटने की बात करे, तो चर्चाएं होना लाजिमी है. अलबत्ता उनके कार्यालय ने जल्द ही स्थिति साफ करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि यह बात किसी राजनीतिक संन्यास की नहीं, बल्कि नागपुर के सामाजिक ट्रस्ट और उसके कार्यों में युवाओं को जिम्मेदारी सौंपने के संदर्भ में कही गई थी !

3.गुजरात में 'कमल' की कमान: अफवाहों का धुआं छंटा !

भूपेंद्र पटेल की अगुवाई में ही आगे बढ़ने का खाका !

गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक पिछले कुछ दिनों से यह कानाफूसी तैर रही थी कि क्या गुजरात में भी संगठन नए चेहरे के तौर पर हर्ष सांघवी की ताजपोशी की तैयारी कर रहा है. अलबत्ता जानकार सूत्रों ने साफ कर दिया है कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन का फिलहाल दूर-दूर तक कोई प्रस्ताव नहीं है और आगामी चुनावी वैतरणी मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के शांत नेतृत्व में ही पार की जाएगी. सचमुच गुजरात की सियासी तासीर ऐसी है कि पर्दे के पीछे चाहे जितनी भी चर्चाएं हों, आखिरी फैसला हमेशा चौंकाता है. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि कमान चाहे किसी के भी हाथ में रहे, यह यक्ष प्रश्न सबको पता है कि असल में चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे और अमित शाह की चुनावी रणनीति के दम पर ही लड़ा जाता है !

4.ड्राइंग रूम से वोटों की फसल काटने की तैयारी !

पंजाब में संघ का 'हरियाणा मॉडल': ड्राइंग रूम की बैठकों से साधे जाएंगे समीकरण !

हरियाणा में मिली सियासी कामयाबी के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पंजाब के लिए अपना साइलेंट एक्शन प्लान एक्टिव कर दिया है. योजना के तहत बड़े जलसों के बजाय मोहल्लों और कॉलोनियों में 'ड्राइंग रूम बैठकें' शुरू की जा रही हैं. नशे के गंभीर संकट के खिलाफ राष्ट्र सेविका समिति की महिलाएं घर-घर जाकर मोर्चा संभालेंगी, ताकि 47% महिला आबादी और परिवारों से सीधा संवाद साधा जा सके. सचमुच बी.एल. संतोष के पंजाब प्रवास ने संगठन के पहियों में नई रफ्तार भर दी है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जमीन तैयार करने का यह संघी मॉडल पंजाब की उलझी हुई सियासत में क्या नया असर दिखा पाता है !

5.पुराने रिश्तों की नई शर्तें और 'बड़े भाई' का रोल !

पंजाब में 'कमल' और 'हल' का फिर से मेल ? 

पंजाब के सियासी चौसर पर भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की पुरानी गाड़ी को दोबारा पटरी पर लाने की कवायद लगभग निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है. इस बार समीकरण बदले हुए हैं और भाजपा खुद को जूनियर पार्टनर के बजाय 'बड़े भाई' की भूमिका में देख रही है. कुछ ग्रामीण सीटों पर अकाली नेताओं को तैयारी धीमी करने के मिले संकेत इसी बदलाव की गवाही दे रहे हैं. अलबत्ता बी.एल. संतोष ने पार्टी काडर को सभी 117 सीटों पर सक्रिय रहने का निर्देश देकर दबाव भी बनाए रखा है. राजनीतिक प्रेक्षक इस पर नजर गड़ाए हुए हैं कि सीट शेयरिंग की नई शर्तों पर दोनों दल किस समझौते पर मुहर लगाते हैं !

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