1. दफ्तर में बायोमेट्रिक या फाइलों की कसरत?
बाबुओं का 'संडे वर्किंग' तनाव !
राजधानी के लुटियंस जोन में नौकरशाही का पसीना इन दिनों बारिश में भी छूट रहा है. नए प्रोजेक्ट्स और 'विकसित भारत 2047' के रोडमैप की समीक्षा बैठकें देर रात तक खिंच रही हैं. अलबत्ता शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली से फाइलें तेजी से आगे बढ़ रही हैं, जिससे आम जनता को योजनाओं का त्वरित लाभ मिल रहा है. लेकिन सचमुच दफ्तरों के लंच रूम में चाय के कप के साथ बाबुओं का दर्द भी छलक आता है. वीकेंड पर गोल्फ खेलने वाले अफसर अब पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन की स्लाइडें सुधारते दिखते हैं. राजनीतिक प्रेक्षक कहते हैं कि सुशासन की यह गति तारीफ के काबिल है, मगर ब्यूरोक्रेसी की नींद थोड़ी उड़ गई है. अब गलियारों में प्रश्न यही गूंज रहा है कि अगली कैबिनेट फेरबदल की चिट्ठी किस-किस के परफॉर्मेंस स्कोरकार्ड पर मुहर लगाएगी !
2. बयानबाज़ी के तीर या अपनी ही नाव में छेद?
सोशल मीडिया वॉर रूम के शूरवीरों का 'एक्स-फैक्टर' !
पार्टियों के आईटी सेल और प्रवक्ता इन दिनों 'एक्स' पर 24 घंटे की ड्यूटी बजा रहे हैं. सुबह उठते ही एक दल ट्रेंड बनाता है, दोपहर तक दूसरा दल उसका काउंटर हैशटैग चला देता है. अलबत्ता टीवी डिबेट में चीखने वाले दोनों प्रवक्ता शाम को स्टूडियो की कैंटीन में साथ समोसे खाते देखे जाते हैं. सचमुच कार्यकर्ताओं को लगता है कि सीमा पर असली जंग उनके सोशल मीडिया वॉरियर ही लड़ रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि डिजिटल क्रांति ने नैरेटिव की जंग को घर-घर पहुंचा दिया है, हालांकि जमीन पर वोटर अभी भी बिजली-सड़क-पानी का हिसाब मांग रहा है. ऐसे में यक्ष प्रश्न यह उठता है कि क्या करोड़ों व्यूज और लाइक्स पोलिंग बूथ तक वोट बनकर सच में तब्दील हो पाएंगे !
3. कुर्सी से राजभवन तक प्रमोशन या सम्मानजनक विदाई?
दिल्ली से लेकर प्रांतीय महलों तक 'गवर्नर फॉर्मूले' की तेज सरगोशियां !
लुटियंस दिल्ली के सत्ता गलियारों में इन दिनों एक नया प्रशासनिक और सियासी समीकरण चर्चा का विषय बना हुआ है. अलबत्ता चर्चाएं तो सिर्फ कानाफूसी के स्तर पर हैं, मगर कयास लगाए जा रहे हैं कि किसी कद्दावर मुख्यमंत्री को एक रणनीतिक और संवेदनशील राज्य के राजभवन की कमान सौंपी जा सकती है. सचमुच इस खबर के तैरते ही कई राज्यों के पावर कॉरिडोर में हलचल मच गई है और नेताजी के करीबी अपनी-अपनी डायरियां टटोलने लगे हैं. सत्ता पक्ष की रणनीति इसे अनुभव के बेहतर इस्तेमाल और प्रशासनिक कसावट के तौर पर देख रही है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि अगर यह 'सीएम टू गवर्नर' फॉर्मूला जमीन पर उतरा, तो यह सांगठनिक बदलाव और राज्य की राजनीति में नई पीढ़ी को मौका देने का एक मास्टरस्ट्रोक साबित होगा. अब सियासी चौपालों पर सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि लिफाफे में बंद वह 'गोपनीय' नाम आखिर किस दिग्गज का है, जिसकी अगली नेमप्लेट राजभवन के मुख्य द्वार पर सजने वाली है !
4. टोक्यो में 'मेक इन इंडिया' की गूंज या निवेश की बुलेट ट्रेन?
पीयूष गोयल के नेतृत्व में 200 दिग्गजों की टोली, भारत-जापान ट्रेड को मिलेगा नया बूस्ट !
दिल्ली के उद्योग भवन से लेकर टोक्यो के व्यापारिक गलियारों तक इस हफ्ते हलचल तेज रहने वाली है. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल आज से 27 अगस्त तक जापान के अहम मिशन पर हैं. अलबत्ता विदेशी दौरे तो कई होते हैं,लेकिन इस बार मंत्री जी अकेले नहीं बल्कि देश के अब तक के सबसे बड़े बिज़नेस डेलिगेशन की अगुआई कर रहे हैं. सचमुच 200 से अधिक शीर्ष उद्योगपतियों, दिग्गज आंत्रप्रेन्योर्स और बिजनेस लीडर्स का एक साथ टोक्यो पहुंचना इस बात का सबूत है कि भारत अब वैश्विक सप्लाई चेन में बैकसीट पर बैठने के मूड में नहीं है. सरकार का पूरा फोकस द्विपक्षीय रणनीतिक व्यापार को नई रफ्तार देने और इंडस्ट्रियल पार्टनरशिप को पंख लगाने पर है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे केवल एक औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में भारत की स्थिति मजबूत करने का बड़ा आर्थिक कदम मान रहे हैं. अब दोनों देशों के व्यापारिक दिग्गजों के बीच यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि 27 अगस्त तक इस मेगा बिजनेस मिशन से कितने अरब डॉलर के नए समझौतों और निवेश की झड़ी लगती है !
5. मीटर डाउन पर भाषा का इम्तिहान या वोटबैंक का नया रूट?
सड़क पर मराठी की क्लास और राष्ट्रीय समीकरणों के बीच रणनीतिक चुप्पी !
मायानगरी की सड़कों पर इन दिनों ऑटो-टैक्सी के मीटर से ज्यादा चर्चा मराठी भाषा के 'ड्राइविंग टेस्ट' की हो रही है. प्रशासन द्वारा शुरू की गई इस नई व्यवस्था के तहत चालकों के लिए स्थानीय भाषा की बुनियादी समझ अनिवार्य की जा रही है. अलबत्ता, स्थानीय राजनीति में क्षेत्रीय अस्मिता का झंडा बुलंद रखने वाले सहयोगी दल इस फैसले पर पूरी तरह ताल ठोक रहे हैं. सचमुच, वर्दीधारी अमले की मौजूदगी में चल रहे इन औचक भाषा इम्तिहानों ने रोजी-रोटी की कतार में खड़े ड्राइवरों की धड़कनें तेज कर दी हैं. राज्य के नीति-नियंताओं का मानना है कि स्थानीय संवाद से प्रशासनिक व्यवस्था और यात्री सुविधा सुगम होती है. राजनीतिक प्रेक्षक इस कदम को क्षेत्रीय भावनाओं को साधने और साथ ही हिंदी भाषी राज्यों के जनमानस के बीच संतुलन बनाए रखने की एक बारीक सियासी जुगलबंदी के रूप में देख रहे हैं. अब गलियारों में सबसे बड़ा प्रश्न यही बना हुआ है कि स्थानीय अस्मिता के मान और राष्ट्रीय फलक के सामाजिक समीकरणों के बीच यह भाषाई प्रयोग कितना मुफीद साबित होगा ?