Political Popcorn: कहीं कॉकरोच पर वार, तो कहीं कुर्सी की दरकार… सियासी गलियारों में मची हलचल

Political Popcorn: दिल्ली में कॉकरोच के पुतले पर सियासी तंज से लेकर कांग्रेस की मुश्किलों और डोनाल्ड ट्रंप के यू-टर्न तक, जानें राजनीति के गलियारों में चल रही हलचल के पीछे की पूरी कहानी.

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Political Popcorn

1.दशहरे की आग में 'कीट-पतंग' की बलि..रावण-मेघनाद के साथ जलेगा 30 फीट का कॉकरोच !

सफाई का संदेश या छात्र आंदोलन पर तीखा तंज?

दिल्ली के पीतमपुरा स्थित श्री केशव रामलीला समिति ने इस दशहरे पर एक अनोखा सियासी-सांस्कृतिक शिगूफा छोड़ दिया है, जहां रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पारंपरिक पुतलों के साथ-साथ 30 फीट ऊंचा 'कॉकरोच' भी धू-धू कर जलेगा. समिति के अध्यक्ष और भाजपा विधायक अशोक गोयल का दावा है कि कॉकरोच मैल और गंदगी का प्रतीक है, इसलिए इसे 'स्वच्छ भारत, स्वच्छ दिल्ली' का संदेश देने के लिए जलाया जा रहा है और इसके पीछे रत्ती भर भी कोई राजनीतिक मंशा नहीं है. अलबत्ता दिल्ली की मौजूदा सियासी तपिश में कोई भी इसे महज स्वच्छता अभियान मानने को तैयार नहीं है, राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि कला और परंपरा की आड़ में छात्र आंदोलन और विपक्षी खेमे के 'कॉकरोच' सिंबल पर यह भाजपा का बेहद सधा हुआ और सांकेतिक पलटवार है. सचमुच जब 30 फीट का पुतला सिर्फ 'सफाई' के नाम पर खड़ा किया जाए, तो जनता संकेतों की गहराई खुद-ब-खुद भांप लेती है. अब सियासी चौपालों में यक्ष प्रश्न यही तैर रहा है कि क्या पुतला दहन से सड़क पर चल रही कॉकरोच जनता पार्टी की सियासत भस्म होगी ?

2- दिल्ली में हंगामा, नजरें संभाजीनगर पर!

क्या दिल्ली को सिर्फ लॉन्च पैड बना रहे अभिजीत दीपके?

राहुल गांधी के आवास पर हुई चाय पार्टी में यह तय हुआ था कि दिवाली के त्योहारी सीजन और कारोबारियों के नुकसान को देखते हुए विरोध प्रदर्शन टाले जाएंगे, लेकिन सीजेपी ने कनॉट प्लेस में तिरंगा मार्च निकालकर सबको हैरत में डाल दिया. कांग्रेस नेताओं के मुताबिक अभिजीत दीपके को दिल्ली के व्यापार और हजारों करोड़ के नुकसान की फिक्र इसलिए नहीं है क्योंकि उनका असली मकसद महाराष्ट्र की जमीन तैयार करना है. अलबत्ता चर्चा है कि दिल्ली के इस पूरे हो-हल्ले की आड़ में दीपके संभाजीनगर लोकसभा सीट पर नजरें गड़ाए हुए हैं, जहां से 2019 में इम्तियाज जलील जीते थे और वे चाहते हैं कि विपक्ष यह सीट उनके लिए छोड़ दे. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि अजिंक्य शिंदे और दीपके की यह सक्रियता राष्ट्रीय मुद्दों के नाम पर प्रादेशिक चुनावी बिसात बिछाने की सोची-समझी रणनीति है. सचमुच जब प्रदर्शन राजधानी में हो और नजरें राज्य की एक खास सीट पर टिकी हों, तो नीयत पर सवाल उठना लाजिमी है. अब सियासी हलकों में यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि क्या विपक्षी पार्टियां अपने ही सहयोगियों के चुनावी एजेंडे के लिए दिल्ली के व्यापारियों की नाराजगी मोल लेती रहेंगी?

3- बेगानी शादी में 'रिजीम चेंज' का अब्दुल्ला दीवाना !

नेहा बोरा और प्रशांत भूषण के बयानों से बैकफुट पर कांग्रेस !

कॉकरोच जनता पार्टी, आइसा और कुछ अति-उत्साही चेहरों के बयानों ने कांग्रेस को भारी सियासी भंवर में फंसा दिया है. आइसा नेता नेहा बोरा का बांग्लादेश आंदोलन से प्रेरणा लेने वाला बयान और प्रशांत भूषण द्वारा 'रिजीम चेंज' की बात कहना भाजपा के लिए मुफीद हथियार बन गया, जिसे लेकर राजनाथ सिंह खुद मैदान में उतर आए.अलबत्ता, भाजपा द्वारा इसे 'भारत में बांग्लादेश मॉडल' करार दिए जाने के बाद जयराम रमेश समेत पूरी कांग्रेस सफाई देने में जुटी है, जबकि विवाद छेड़ने वाले चेहरों पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट मार्च के दौरान राहुल गांधी का नेहा बोरा को तरजीह देना और फिर चाय पार्टी में बुलाना पार्टी के लिए आत्मघाती दांव साबित हुआ, जिसे कांग्रेसी नेता अब निजी बातचीत में स्वीकार भी कर रहे हैं. सचमुच जब दूसरों की अति-उत्साही बयानबाजी की कीमत मुख्य विपक्षी दल को अपनी साख देकर चुकानी पड़े, तो सियासत में मुश्किलें बढ़ जाती हैं. ऐसे में यक्ष प्रश्न यह उठता है कि क्या कांग्रेस ऐसे अनियंत्रित सहयोगियों से दूरी बनाएगी या उनके बयानों का बोझ ढोकर ही बैकफुट पर खेलती रहेगी?

4- स्कूल सुधार का झंडा गिरा, कुर्सी की जंग पर डेरा !

सीजेपी ने बिसरा दिया शिक्षा का एजेंडा?.. दुनिया के सामने आ गई असली सूरत !

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद स्कूलों की सूरत बदलने का दम भरने वाली कॉकरोच जनता पार्टी अब शिक्षा के बुनियादी सवालों से पूरी तरह गायब नजर आ रही है. नंदन नीलेकणी कमेटी ने कंप्यूटर-बेस्ड परीक्षा और एआई आधारित प्रश्न बैंक की सिफारिशें तैयार कर दी हैं, साथ ही एनटीए ने संसदीय समिति के सामने नौ साल में एक भी पेपर लीक न होने का बड़ा दावा ठोक दिया, लेकिन सीजेपी की तरफ से कोई सुगबुगाहट नहीं हुई. अलबत्ता मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग में दिन-रात एक करने वाले इन छात्र नेताओं की चुप्पी छात्रों और युवाओं के बीच भारी अचरज का विषय बनी हुई है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे विशुद्ध रूप से मुद्दों की अवसरवादिता करार दे रहे हैं, जहां पहले भाजपा शासित राज्यों के स्कूलों को निशाना बनाया गया और गैर-भाजपा राज्यों से सिर्फ चमचमाती तस्वीरें दिखाई गईं. सचमुच जब लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े सुधारों पर आंदोलनकारी मौन साध लें, तो उनके असल मकसदों पर उंगलियां उठना तय है. अब यक्ष प्रश्न यही तैर रहा है कि क्या सीजेपी का शिक्षा सुधार आंदोलन सिर्फ चुनावी लाभ और हेडलाइन बटोरने का एक जरिया भर था?

5- पहले आंखें तरेरीं, फिर खुद ही पलकें झपका लीं!

100% टैरिफ की धमकी देकर नरम पड़े डोनाल्ड ट्रंप..भारत को राहत या व्हाइट हाउस की घरेलू मजबूरी?

रूसी तेल और गैस खरीदने वाले मुल्कों पर 100% अतिरिक्त टैरिफ का चाबुक चलाने की हुंकार भरने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तेवर ऐन वक्त पर ढीले पड़ गए हैं. कड़े प्रतिबंधों और टैरिफ से भारत, चीन सहित तेल खरीदार देशों को अंतिम क्षणों में छूट दे दी गई. 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' पर दस्तखत करने के बाद ट्रंप इसे अमेरिका के हित में उठाया गया कदम बता रहे हैं. अलबत्ता, वॉशिंगटन के अंदरूनी हलकों में चर्चा है कि खुद रूस से डीजल खरीदने के दोहरे मापदंडों पर घिरने और घर में तेल की बढ़ती कीमतों के चलते ट्रंप को यह 'यू-टर्न' लेना पड़ा. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि नवंबर में सिर पर खड़े अमेरिकी मिडटर्म चुनाव और संसद में बहुमत खिसकने के खौफ ने ट्रंप के टैरिफ वाले तीखे तेवरों को ठंडा कर दिया. सचमुच अंतरराष्ट्रीय मंच पर 'टैरिफ किंग' बनकर धाक जमाने की कोशिश करने वाले ट्रंप घरेलू महंगाई के चक्रव्यूह में उलझकर खुद ही बैकफुट पर आ गए. अब वैश्विक कूटनीति के गलियारों में यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि क्या ट्रंप का यह फैसला भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की जीत है या सिर्फ चुनावी मौसम में ट्रंप का अपनी ही आग से बचने का दांव?

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