Political Popcorn: 'साइकिल' की नई सारथी से 'राव-रार' तक... सियासत के गलियारों की 5 अंदरूनी खबरें

Political Popcorn: गठबंधन की सियासत में बढ़ती हलचल के बीच सहयोगी दलों के बदले तेवर ने बढ़ाई राजनीतिक सरगर्मी.

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Political Popcorn

1.चाय की चुस्कियों में गठबंधन का नया स्वाद !

लुटियंस दिल्ली के डिनर डिप्लोमेसी में सहयोगियों की चुप्पी और मुस्कान !

राजधानी के सत्ता गलियारों में इन दिनों चाय से ज्यादा तापमान बयानों का बढ़ा हुआ है. बुधवार शाम एक प्रमुख सहयोगी दल के नेता के आवास पर सजी महफिल में जब गाढ़ी मलाई वाली चाय परोसी गई, तो चर्चा सिर्फ नीतिगत फैसलों तक सीमित नहीं रही. राजनीतिक प्रेक्षक इस बात पर बारीकी से नजर गड़ाए हुए हैं कि गठबंधन के अहम घटक दल अब सिर्फ सहमति में सिर हिलाने के बजाय अपनी बात को मुस्कुराते हुए नफासत से टेबल पर रख रहे हैं. अलबत्ता सत्ता पक्ष के रणनीतिकार भी पूरी तरह मुस्तैद हैं और हर संशय को चुटकियों में सुलझाने का दावा कर रहे हैं. सचमुच जब संख्या बल का संतुलन नाजुक हो तो डिनर के मेन्यू से ज्यादा मायने यह रखता है कि कौन किसके बगल में बैठा है ?

2.'साइकिल' के हैंडल पर नई पकड़ ?

आधी आबादी के बहाने पूरी कमान का रोडमैप? लाल टोपी के आंगन में नई 'सारथी' का पदार्पण !

​सूबे की सबसे रसूखदार सियासत के आंगन में इन दिनों मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है. अब तक जो चेहरा रैलियों में मौन मुस्कान और सधे हुए संक्षिप्त बयानों तक सीमित रहता था, वह पहली बार सीधे मुख्य माइक संभालने जा रहा है.​अलबत्ता पूर्व मुख्यमंत्री जी खुद मंच पर मौजूद तो रहेंगे, लेकिन इस बार 'फ्रंट सीट' पर बैठने के बजाय बगल की कुर्सी से सिर्फ रणनीतिक मौन साधेंगे. सचमुच जब पार्टी के शीर्ष नेता खुद माइक किसी और के हवाले करें, तो संदेश साफ होता है कि यह केवल एक प्रेस वार्ता नहीं, बल्कि संगठन की 'सेकंड-इन-कमांड' की अनौपचारिक ताजपोशी का पूर्वाभ्यास है.इस नए शक्ति-प्रदर्शन ने खानदान और संगठन के उन पुराने अलंबरदारों की पेशानी पर बल ला दिए हैं, जो खुद को संस्थापक दौर का स्वाभाविक वारिस मानते रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक इस बात पर पैनी नजर गड़ाए हुए हैं कि चाचा-ताऊ की अनुभवी मंडली अब सिर्फ मार्गदर्शक मंडल की शोभा बढ़ाएगी या पर्दे के पीछे से अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने का कोई नया दांव चलेगी !

3.'बायकॉट' की लिस्ट और शुभकामनाओं की चिट्ठी!

सुबह 'पक्षपाती' का लेबल, शाम को फूलों का गुलदस्ता !

 ​देश की सबसे पुरानी पार्टी के वॉर रूम में इन दिनों संवाद से ज्यादा सन्नाटा गूंज रहा है. मामला एक प्रमुख मीडिया के नए कलेवर और री-लॉन्चिंग से जुड़ा है, जिसे पार्टी मंचों से अक्सर 'दरबारी' और 'पक्षपाती' का तमगा दिया जाता रहा है. चौंकने वाली बात तब हुई जब उसी चैनल के नए दफ्तर पर पार्टी के कुछ दिग्गज प्रवक्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के दस्तखत वाले बधाई संदेश और फूलों के गुलदस्ते पहुंच गए.
​अलबत्ता जैसे ही यह खबर सर्वोच्च नेता के कानों तक पहुंची पार्टी की मीडिया विंग की सांसें अटक गईं. नेताजी ने दो टूक शब्दों में पूरी टीम की क्लास लगाते हुए पूछा कि जिस मंच को दिन-रात सार्वजनिक तौर पर घेरा जाता है, उसे बंद कमरों में 'सद्भावना पत्र' भेजने की यह कौन सी दोहरी कूटनीति है? ​सचमुच कैमरे के सामने बहिष्कार का तेवर दिखाना और ऑफ-कैमरा निजी रसूख चमकाने के लिए रिश्ते साधना, पार्टी के अनुशासन पर बड़ा सवालिया निशान लगा गया ?

4.साइबर सिटी का पानी और सियासत की 'राव-रार'!

अहीरवाल के 'राजा साहब' के पुराने प्रेम पर संगठन का नया मोर्चा !

​मिलेनियम सिटी की चमचमाती सड़कों पर जब मॉनसून का पानी भरा तो उसके छींटे सीधे सत्ताधारी दल के संगठन पर जा गिरे. अहीरवाल के सियासी 'राजा साहब' और कद्दावर सांसद ने जब जलभराव पर अफसरों को लताड़ते हुए पुराने विपक्षी राज के ड्रेनेज सिस्टम की तारीफों के पुल बांध दिए, तो स्थानीय संगठन का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.
​अलबत्ता, अपनी ही सरकार के जल-निकासी मॉडल को आईना दिखाने का यह अंदाज जिला इकाई को कतई रास नहीं आया. संगठन के पदाधिकारियों ने आनन-फानन में कलम उठाकर सीधे प्रदेश आलाकमान को एक लंबी चिट्ठी भेज दी, जिसमें सीधा आरोप जड़ा गया कि सांसद महोदय अपनी पार्टी का काम भूलकर रोहतक वाले 'पूर्व मुख्यमंत्री' के पुराने दौर का कसीदा पढ़ रहे हैं. चिट्ठी में तल्ख लहजे में यह सवाल भी दाग दिया गया कि सांसद जी का दिल आज भी किस झंडे के लिए धड़कता है? ​सचमुच जब इलाके का सबसे बड़ा क्षत्रप अपनी ही सरकार की मशीनरी पर सवाल उठाने लगे तो संगठन के कार्यकर्ताओं का असहज होना लाजिमी है !

5.लाल डायरी नहीं, इस बार डिजिटल टैबलेट का खौफ !

विपक्षी खेमे में आंतरिक सर्वे रिपोर्ट बनते ही कई चेहरों पर पसरा सन्नाटा !

मुख्य विपक्षी पार्टी के वॉर रूम में आजकल पुरानी फाइलों की जगह हाई-टेक डिजिटल डैशबोर्ड ने ले ली है. राज्यों के आगामी चुनावी मिजाज को भांपने के लिए कराए गए आंतरिक सर्वे के नतीजे जैसे ही स्क्रीन पर चमके, कई दिग्गज नेताओं की पेशानी पर पसीना साफ नजर आने लगा. पार्टी आलाकमान ने साफ संकेत दिए हैं कि इस बार टिकट केवल 'निष्ठा' पर नहीं, बल्कि 'जनता के बीच रेटिंग' पर मिलेंगे. अलबत्ता पुराने क्षत्रपों को यह कॉर्पोरेट स्टाइल राजनीति कतई रास नहीं आ रही है. वे दबी जुबान में कह रहे हैं कि जमीन की धूल फांकने का अनुभव किसी एल्गोरिदम में नहीं समा सकता. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि हाईकमान का यह कदम पार्टी में नई जान फूंकने के लिए जरूरी है, लेकिन पुराने वफादारों को साधे रखना भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं !

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