'पाकिस्तान के न्यूक्लियर हथियारों की चाभी हमारे हाथों में...' 26/11 हमले पर पूर्व CIA एजेंट का दावा

अमेरिकी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) के पूर्व अधिकारी जॉन किरियाकू ने हाल ही में पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और अमेरिका के बीच हुए कथित समझौते को लेकर बड़ा खुलासा किया है.

Pakistans nuclear weapons were under Americas control
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अमेरिकी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) के पूर्व अधिकारी जॉन किरियाकू ने हाल ही में पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और अमेरिका के बीच हुए कथित समझौते को लेकर बड़ा खुलासा किया है. उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने अपने शासनकाल में देश के परमाणु हथियारों का नियंत्रण अमेरिका के हाथों में सौंप दिया था.

2002 की घटनाओं का खुलासा

जॉन किरियाकू के अनुसार, जब वह वर्ष 2002 में पाकिस्तान में तैनात थे, तब उन्हें अनौपचारिक रूप से यह बताया गया कि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (Pentagon) पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की निगरानी और नियंत्रण कर रहा है. उन्होंने कहा कि जनरल मुशर्रफ को यह डर था कि कहीं ये हथियार आतंकियों या कट्टरपंथी समूहों के हाथ न लग जाएँ, इसलिए उन्होंने यह नियंत्रण अमेरिका को सौंप दिया.

किरियाकू ने यह भी कहा कि इस कदम के बदले अमेरिका ने पाकिस्तान को करोड़ों डॉलर की आर्थिक और सैन्य सहायता दी थी. यह सहायता आतंकवाद-विरोधी अभियानों के नाम पर दी गई थी, लेकिन वास्तव में इसका एक बड़ा हिस्सा अमेरिका-पाकिस्तान के रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल हुआ.

अमेरिका ने मुशर्रफ को खरीद लिया था- किरियाकू

पूर्व CIA अधिकारी का कहना है कि उस समय अमेरिका और पाकिस्तान के बीच काफी करीबी संबंध थे. अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकी संगठनों के खिलाफ सहयोग देने के लिए आर्थिक सहायता दी और बदले में पाकिस्तान ने अमेरिका को अपने सैन्य ढांचे के भीतर काम करने की खुली अनुमति दी.

उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका को लोकतांत्रिक नेताओं की तुलना में सैन्य तानाशाहों के साथ काम करना ज्यादा आसान लगता है, क्योंकि तानाशाहों को जनता या मीडिया के दबाव की चिंता नहीं करनी पड़ती. उन्होंने कहा, "हमने परवेज मुशर्रफ को खरीद लिया था."

किरियाकू के अनुसार, मुशर्रफ ने अमेरिका के साथ सहयोग का दिखावा करते हुए अपने देश की सेना और चरमपंथी समूहों को भी संतुष्ट रखा. उन्होंने काउंटर-टेररिज्म के नाम पर अमेरिका को समर्थन दिया, लेकिन भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियाँ जारी रखने की छूट दी.

पाकिस्तानी सेना का ध्यान भारत पर केंद्रित

पूर्व CIA अधिकारी ने बताया कि पाकिस्तान की सेना का ध्यान अल-कायदा पर नहीं, बल्कि भारत पर केंद्रित था. मुशर्रफ को सेना का समर्थन बनाए रखना था, इसलिए उन्होंने अमेरिका को यह दिखाया कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ है, जबकि अंदरूनी तौर पर भारत के खिलाफ आतंक फैलाने वाले संगठनों को सहन किया गया.

इस दोहरी नीति के कारण पाकिस्तान ने एक ओर तो अमेरिका से अरबों डॉलर की सहायता प्राप्त की, और दूसरी ओर भारत के खिलाफ आतंकी नेटवर्क को चलने दिया.

भारत की नीति पर अमेरिकी दृष्टिकोण

जॉन किरियाकू ने 2001 के संसद हमले और 2008 के मुंबई आतंकी हमलों (26/11) का भी ज़िक्र किया. उन्होंने कहा कि उन हमलों के बाद अमेरिका को पूरी उम्मीद थी कि भारत पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी सैन्य कार्रवाई करेगा.

लेकिन जब भारत ने तत्काल जवाबी हमला नहीं किया, तो CIA ने भारत की इस नीति को “रणनीतिक धैर्य” (Strategic Patience) कहा. व्हाइट हाउस में भारतीय नीति की तारीफ करते हुए इसे “परिपक्व विदेश नीति” बताया गया.

किरियाकू के अनुसार, भारत के संयम ने उस समय संभावित परमाणु युद्ध को टालने में बड़ी भूमिका निभाई. उन्होंने कहा, "हम उम्मीद कर रहे थे कि भारत हमला करेगा, लेकिन उसने नहीं किया और इसी वजह से दुनिया परमाणु संघर्ष से बच गई."

हालाँकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब भारत उस स्थिति में पहुँच गया है जहाँ उसका “रणनीतिक धैर्य” कमजोरी के रूप में नहीं देखा जा सकता. इसलिए हाल के वर्षों में भारत को सीमाओं पर या आतंकी घटनाओं के जवाब में कड़ा रुख अपनाना पड़ा है.

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