इस साल 30 अप्रैल को पाकिस्तान ने चीन के सान्या शहर में आयोजित एक समारोह में पीएनएस हैंगोर को नौसेना में शामिल किया. इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और नौसेना प्रमुख एडमिरल नवीन अशरफ भी मौजूद थे. पाकिस्तान इसे अपनी नौसैनिक ताकत में बड़ा बदलाव और अरब सागर में समुद्री रणनीति को मजबूत करने वाला कदम बता रहा है. यह पनडुब्बी चीन के सहयोग से बनाई गई है और युआन-क्लास डिजाइन के निर्यात संस्करण पर आधारित है.
हालांकि पाकिस्तान की तरफ से इसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया गया, लेकिन इस परियोजना से जुड़े कई अहम सवाल अब भी अनुत्तरित हैं. सरकारी दावों और वास्तविक स्थिति के बीच का यही अंतर सबसे बड़ी चर्चा का विषय बन गया है.
हैंगोर पनडुब्बियों के इंजन पर सवाल
पहला सवाल इंजन को लेकर उठता है. हैंगोर क्लास को मूल रूप से जर्मनी के एमटीयू 12वी 396 मरीन इंजन के आधार पर तैयार किया गया था. लेकिन 2021 में यह सामने आया कि ये इंजन यूरोपीय संघ के हथियार प्रतिबंध का उल्लंघन करते हुए चीनी युद्धपोतों में इस्तेमाल हो रहे थे. इसके बाद जर्मनी ने चीन को इन इंजनों का निर्यात रोक दिया और पाकिस्तान के लिए बनने वाली पनडुब्बियों में भी इनका उपयोग बंद हो गया.
इसके बाद चीन ने अपने देश में बने सीएचडी620 इंजन को विकल्प के रूप में पेश किया, जिसे पाकिस्तान ने स्वीकार कर लिया. लेकिन यहीं से नई चिंताएं शुरू हुईं. थाईलैंड की नौसेना, जो इसी तरह की एस26टी पनडुब्बी परियोजना पर काम कर रही थी, ने शुरुआत में इस इंजन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. थाई नौसेना प्रमुख ने कहा था कि जब तक इसकी गुणवत्ता की गारंटी नहीं होगी, तब तक यह भरोसा नहीं किया जा सकता कि इंजन वास्तव में अच्छा है. बाद में चीन ने इस इंजन का 6000 घंटे से ज्यादा समय तक परीक्षण किया, जिसके बाद थाईलैंड ने शर्तों के साथ इसे मंजूरी दी.
इंजन तय प्रदर्शन मानकों के अनुरूप
थाई नौसेना ने यह कहा कि सीएचडी620 इंजन समझौते में तय प्रदर्शन मानकों के अनुरूप है. लेकिन यह केवल अनुबंध के आधार पर किया गया मूल्यांकन था, स्वतंत्र संचालन परीक्षण नहीं. सबसे बड़ी बात यह है कि किसी भी सार्वजनिक रूप से पुष्टि की गई नौसेना ने अब तक इस इंजन को सक्रिय पनडुब्बी सेवा में इस्तेमाल नहीं किया है. पाकिस्तान ने भी कोई ऐसा तकनीकी दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया है जिससे साबित हो सके कि यह इंजन मूल परियोजना की आवश्यकताओं को पूरा करता है.
दूसरा बड़ा सवाल समय-सीमा को लेकर है. पाकिस्तान और चीन के बीच मूल योजना के अनुसार 2022 से 2028 के बीच आठों पनडुब्बियों की डिलीवरी होनी थी. लेकिन अब यह परियोजना देरी का शिकार दिखाई दे रही है.
चार पनडुब्बियों में से केवल एक शामिल
चीन में बनाई जा रही चार पनडुब्बियों में से केवल पीएनएस हैंगोर को ही अब तक शामिल किया गया है. बाकी पीएनएस शुशुक, पीएनएस मैंग्रो और पीएनएस गाजी को 2025 में लॉन्च किया गया, लेकिन वे अब भी अंतिम समुद्री परीक्षणों से गुजर रही हैं. वहीं कराची शिपयार्ड में तैयार की जा रही चार अन्य पनडुब्बियां और पीछे चल रही हैं. पांचवीं पनडुब्बी के लिए स्टील दिसंबर 2021 में काटा गया था, जबकि छठी का कील फरवरी 2025 में रखा गया. अब पूरी परियोजना के 2028 से 2030 के बीच पूरी होने की संभावना जताई जा रही है. पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर देरी की वजह नहीं बताई है.
तीसरा सवाल क्षमता को लेकर है. हैंगोर पनडुब्बी चीन की टाइप 039ए/बी युआन क्लास का निर्यात संस्करण है. यह वही मॉडल नहीं है जिसे चीन खुद अपनी नौसेना में इस्तेमाल करता है. निर्यात के लिए बनाए गए संस्करणों में आमतौर पर सेंसर, लड़ाकू प्रबंधन प्रणाली और ध्वनि नियंत्रण तकनीक जैसी क्षमताएं अलग होती हैं.
यह प्लेटफॉर्म मूल युआन-क्लास जितना सक्षम नहीं
विश्लेषकों का मानना है कि चीन अपनी सबसे उन्नत तकनीक केवल घरेलू उपयोग के लिए सुरक्षित रखता है. इसलिए हैंगोर परियोजना को कई विशेषज्ञ मुख्य रूप से पुरानी पनडुब्बियों को बदलने और रणनीतिक संदेश देने वाला कार्यक्रम मानते हैं. स्वतंत्र विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि यह प्लेटफॉर्म मूल युआन-क्लास जितना सक्षम नहीं है. पाकिस्तान ने इस दावे का सार्वजनिक रूप से विरोध नहीं किया है.
चौथा सवाल इसकी युद्ध स्थितियों में टिके रहने की क्षमता को लेकर है. भारत इस समय 12 पी-8आई समुद्री निगरानी विमान संचालित कर रहा है, जो अरब सागर में लगातार पनडुब्बी रोधी निगरानी अभियान चला रहे हैं. भारत ने अतिरिक्त छह विमानों को मंजूरी भी दे दी है, जिससे यह संख्या बढ़कर 18 हो जाएगी.
लगातार बढ़ रही है भारत की निगरानी क्षमता
इसके अलावा भारत के पास सोनार सिस्टम से लैस युद्धपोत और बढ़ता पनडुब्बी बेड़ा भी है. विश्लेषकों के अनुसार सीएचडी620 इंजन ध्वनि के मामले में पुराने एमटीयू 396 इंजन से कमतर हो सकता है. ऐसे में उस क्षेत्र में जहां भारत की निगरानी क्षमता लगातार बढ़ रही है, वहां हैंगोर क्लास की पनडुब्बियों के सुरक्षित रहने पर सवाल उठ रहे हैं. पाकिस्तान ने इस पर कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया है.
पांचवां सवाल लागत को लेकर है. इस परियोजना की अनुमानित कीमत 4 से 5 अरब डॉलर बताई जाती है. समझौते के समय यह चीन के सैन्य इतिहास का सबसे बड़ा हथियार निर्यात सौदा था. यह सौदा ऐसे समय में किया गया जब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ की वित्तीय निगरानी में काम कर रहा है. आने वाले वर्षों में रखरखाव और संचालन पर होने वाला खर्च भी काफी बड़ा होगा. इसके आर्थिक पक्ष को लेकर पाकिस्तान ने अब तक कोई स्पष्ट सार्वजनिक विवरण नहीं दिया है.
चीन पर निर्भर है हैंगोर परियोजना
छठा सवाल निर्भरता को लेकर है. हैंगोर परियोजना की लगभग हर बड़ी प्रणाली- इंजन, इलेक्ट्रॉनिक्स, हथियार और स्पेयर पार्ट्स चीन पर निर्भर हैं. इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान की पनडुब्बी क्षमता लंबे समय तक चीन की तकनीकी और सामग्री सहायता के बिना खुद को बनाए नहीं रख सकती.
ये सवाल किसी राजनीतिक विरोध का हिस्सा नहीं हैं. ये वही सामान्य सवाल हैं जो किसी भी बड़े रक्षा सौदे पर उठाए जाते हैं. पाकिस्तान की हैंगोर परियोजना को इनका जवाब देने में सक्षम होना चाहिए, लेकिन अब तक उसने ऐसा करने की कोशिश नहीं की है.