नई दिल्ली: भारत-पाकिस्तान के बीच 1960 से लागू सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर वर्तमान में गंभीर कूटनीतिक गतिरोध की स्थिति बन गई है. हाल ही में भारत द्वारा संधि को स्थगित किए जाने के बाद, पाकिस्तान ने इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के मंच पर अपनी चिंता व्यक्त की है और सदस्य देशों से समर्थन मांगा है.
पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि सैयद फवाद शेर ने जेद्दा में आयोजित OIC स्वतंत्र स्थायी मानवाधिकार आयोग (IPHRC) के 25वें सत्र में कहा कि भारत की कार्रवाई एकतरफा और चिंताजनक है, जो पाकिस्तान के लिए जल संकट को और गहरा कर सकती है.
OIC मंच पर उठाई आवाज
"जल के अधिकार" पर आधारित इस सत्र में शेर ने कहा कि सिंधु जल संधि केवल एक तकनीकी दस्तावेज नहीं, बल्कि मानवाधिकार और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है. उन्होंने भारत द्वारा हालिया निर्णयों पर OIC के सदस्य देशों से चिंतन और हस्तक्षेप की अपील की.
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि OIC के विदेश मंत्री पहले ही इस मामले में चिंता व्यक्त कर चुके हैं. शेर के अनुसार, भारत की नीति से न केवल पाकिस्तान प्रभावित हो रहा है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की जलवायु सुरक्षा के लिए भी खतरा है.
भारत का रुख: 'आतंक और शांति साथ नहीं'
भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया था. इस हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई थी, जिसके बाद भारत ने इसे एक राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बताया और पाकिस्तान से ‘ठोस और स्थायी’ कार्रवाई की मांग की.
भारत सरकार के अनुसार, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को रोकने के लिए प्रामाणिक और अपरिवर्तनीय कदम नहीं उठाता, तब तक यह संधि बहाल नहीं की जाएगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट सुरक्षा समिति (CCS) की बैठक के बाद यह रुख स्पष्ट करते हुए कहा था, "पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते. आतंक और बातचीत साथ नहीं चल सकते."
सिंधु जल संधि की पृष्ठभूमि
सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षरित एक ऐतिहासिक समझौता है, जिसके अंतर्गत सिंधु प्रणाली की छह नदियों — सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, व्यास और सतलुज — का बंटवारा किया गया था.
इस संधि के तहत, भारत पूर्वी नदियों (रावी, व्यास, सतलुज) का पूर्ण उपयोग कर सकता है, जबकि पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) का प्राथमिक उपयोग पाकिस्तान को दिया गया है. भारत को इन नदियों पर सीमित परियोजनाएं चलाने की अनुमति है, बशर्ते वे संधि की शर्तों के अनुरूप हों.
राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय संकेत
पाकिस्तान के विदेश मंत्री और उप प्रधानमंत्री इशाक डार सहित कई शीर्ष अधिकारी हाल के सप्ताहों में भारत के इस निर्णय के खिलाफ बयान दे चुके हैं. पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (NSC) ने भी इस पर विचार विमर्श किया है.
वहीं भारत, संधि के निलंबन को अपनी सुरक्षा नीति के अनुरूप और न्यायोचित ठहरा रहा है.
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