Pakistan ISI Terror Plan: पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस यानी ISI ने जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठनों के लिए पाकिस्तान के पूर्व सेना और नौसेना कर्मियों की भर्ती शुरू की है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस अभियान का मकसद जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को बढ़ाना और आतंकियों की कमी को पूरा करना है.
पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा को ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रशिक्षित कैडर की कमी का सामना करना पड़ रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कई आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था.
ISI पूर्व सैनिकों की भर्ती क्यों कर रही?
रिपोर्ट के मुताबिक, ISI अब पाकिस्तान के रिटायर्ड आर्मी और नेवी कर्मियों को आतंकी संगठनों से जोड़ने की कोशिश कर रही है. इसके पीछे एक बड़ी वजह आतंकियों को ट्रेनिंग देने में लगने वाला समय बताया जा रहा है. पूर्व सैनिकों के पास सैन्य अनुभव और ट्रेनिंग पहले से होती है, इसलिए उनका इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में अभियानों को संभालने के लिए किया जा सकता है.
इसका मकसद आतंकी संगठनों में कैडर की कमी को दूर करना और उनकी ऑपरेशनल क्षमता बनाए रखना है. पाकिस्तान चाहता है कि लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद उसके समर्थन से आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए तैयार रहें और उन्हें प्रशिक्षित लोगों की कमी का सामना न करना पड़े.
आतंकियों की कमी से जूझ रहे लश्कर-जैश
सूत्रों के अनुसार, पिछले साल मई में ऑपरेशन सिंदूर के बाद लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के सामने नए कैडर तैयार करने की चुनौती बढ़ गई है. हाल के समय में इन संगठनों ने भर्ती तेज करने की कोशिश की है, लेकिन नए लोगों को भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों के लिए तैयार करने में काफी समय लगता है.
यही वजह है कि ISI ऐसे लोगों की तलाश में है, जिन्हें पहले से सैन्य प्रशिक्षण और ऑपरेशन का अनुभव हासिल है. पूर्व सैनिकों की भर्ती के जरिए आतंकी संगठनों को कम समय में अनुभवी लोग मिल सकते हैं और उनकी ऑपरेशनल क्षमता को बनाए रखने की कोशिश की जा सकती है.
पाकिस्तानी सेना पर आतंकियों की मदद का आरोप
रिपोर्टों में पाकिस्तान की सेना पर आतंकी संगठनों को सीमा पार कराने, लॉजिस्टिक मदद देने और लॉन्च पैड तक पहुंचाने में सहायता करने के आरोप लगते रहे हैं. इसके अलावा इन संगठनों को ट्रेनिंग, हथियार और आर्थिक मदद उपलब्ध कराने की भी बात सामने आती रही है.
आरोप है कि जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठनों के साथ-साथ उनके स्लीपर सेल तक मदद पहुंचाने के लिए हथियारों और ड्रग्स की तस्करी का सहारा लिया जाता है. सुरक्षा एजेंसियां इसी नेटवर्क को आतंकवाद के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रमुख सपोर्ट सिस्टम के तौर पर देखती हैं.
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