जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं रह गया है, बल्कि यह तेज़ी से वर्तमान की सच्चाई बनता जा रहा है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक हालिया वैज्ञानिक रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले दशकों में दुनिया का बड़ा हिस्सा ऐसी गर्मी का सामना करेगा जो मानव शरीर की सहनशीलता से बाहर होगी.
अध्ययन बताता है कि वर्ष 2050 तक पृथ्वी की लगभग 40 प्रतिशत आबादी यानी करीब 4 अरब लोग अत्यधिक तापमान वाले क्षेत्रों में रहने को मजबूर होंगे. यह स्थिति केवल असहज नहीं, बल्कि जानलेवा हो सकती है.
भारत के लिए क्यों है सबसे गंभीर चेतावनी?
रिपोर्ट में भारत को “रेड अलर्ट ज़ोन” में रखा गया है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भारत, नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे देश अत्यधिक गर्मी के सबसे बड़े केंद्र बन सकते हैं. आने वाले वर्षों में कई इलाकों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है.
इतनी अधिक गर्मी में मानव शरीर की प्राकृतिक ठंडा रखने की प्रणाली (थर्मोरेगुलेशन) काम करना बंद कर सकती है. इसका मतलब है कि चाहे व्यक्ति छांव में ही क्यों न हो, उसका शरीर अंदर से ज़्यादा गर्म होता जाएगा, जिससे हीट स्ट्रोक और अंगों के फेल होने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा.
भारत में समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी के पास एयर कंडीशनिंग या ठंडे वातावरण की सुविधा नहीं है. वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहे, तो गर्मी से होने वाली मौतों की संख्या आने वाले दशकों में तेज़ी से बढ़ेगी.
खतरे में कितने लोग?
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2010 में लगभग 1.5 अरब लोग अत्यधिक गर्मी के जोखिम में थे. लेकिन 2050 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 3.8 अरब हो सकती है. यानी सिर्फ 40 सालों में यह खतरा दोगुने से भी ज़्यादा लोगों को अपनी चपेट में ले लेगा.
वैज्ञानिकों का कहना है कि हम ऐसे ग्रह की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ बड़े क्षेत्रों की पहचान गर्मी, आग और धुएँ से होगी, न कि रहने योग्य वातावरण से.
ठंडे देश भी सुरक्षित नहीं रहेंगे
आम धारणा है कि रूस, कनाडा या फिनलैंड जैसे ठंडे देश जलवायु संकट से बचे रहेंगे. लेकिन रिपोर्ट इस सोच को खारिज करती है. इन देशों के घर और बुनियादी ढाँचे ठंड को रोकने के लिए बनाए गए हैं, न कि अत्यधिक गर्मी को बाहर रखने के लिए.
जैसे ही तापमान बढ़ेगा, ये इमारतें गर्मी को फँसाने लगेंगी, जिससे घरों के अंदर का वातावरण बेहद खतरनाक हो सकता है. इसके अलावा, इन देशों की परिवहन और स्वास्थ्य प्रणालियाँ भी लंबे समय तक भीषण गर्मी सहने के लिए तैयार नहीं हैं.
1.5 डिग्री की सीमा पार करने के नतीजे
ऑक्सफोर्ड की शोधकर्ता राधिका खोसला के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार कर जाती है, तो इसके असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेंगे. शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ और कृषि प्रणाली पर गहरा संकट आएगा.
फसलें या तो अत्यधिक गर्मी में झुलस जाएँगी या पानी की कमी से सूख जाएँगी. इससे खाद्य संकट और भूखमरी फैलने की आशंका है. हालात इतने गंभीर हो सकते हैं कि करोड़ों लोगों को सुरक्षित और रहने योग्य स्थानों की तलाश में अपना घर छोड़ना पड़े.
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