संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर बेंजामिन नेतन्याहू का भाषण उस वक्त विवादों में घिर गया, जब कई देशों के प्रतिनिधियों ने हॉल छोड़ दिया. वॉकआउट करने वालों में अरब और अफ्रीका के कई देश शामिल थे. इसके परिणामस्वरूप, नेतन्याहू के समक्ष खाली कुर्सियों का दृश्य सामने था.
इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह खामेनेई ने सोशल मीडिया पर तीखा तंज कसा. उन्होंने कहा कि आज यहूदी राज्य “दुनिया में सबसे अधिक घोर और अलग-थलग” देश बन गया है. उन्होंने नेतन्याहू की एक तस्वीर भी साझा की, जिसमें उनके सामने सुनसान कुर्सियों की पंक्तियाँ दिख रही हैं.
वॉकआउट की तैयारी और प्रतिक्रिया
रिपोर्ट्स कहती हैं कि वाकआउट केवल बातचीत का भाग नहीं था. इसे योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया था. फिलिस्तीनी प्रशासन के पास इसकी रूपरेखा बनाई गई थी. उनमें न केवल मुस्लिम देशों की भागीदारी थी, बल्कि एशिया और यूरोप के कई देशों ने भी इस कदम का समर्थन किया. नेतन्याहू ने अपने भाषण में कहा कि वे “नाक के नीचे आतंकवाद के बीज” नहीं बोने देंगे और जो मीडिया एक पक्ष अपना रहा है, वह राष्ट्र को जोखिम में नहीं डाल सकता.
इसके बावजूद, कई सीटें खाली ही रहीं. खामेनेई ने इस दृश्य को प्रतीकात्मक बताया — जैसे वैश्विक स्तर पर इज़राइल को समर्थन मिले ही न हो. उन्होंने ईरान की सीट पर चिपकी कुछ तस्वीरों का उपयोग भी किया, जिसमें जून में हुए इजरायली हमलों में बच्चों की मौत के फोटो दिखाए गए.
इजरायल का अलगाव और वैश्विक दबाव
इन घटनाओं के बीच यह स्पष्ट हो रहा है कि इजरायल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग होता जा रहा है. कई देश अब फिलिस्तीनी राष्ट्र को मान्यता देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और यह संख्या समय के साथ बढ़ती जा रही है. इज़राइल और नेतन्याहू इस मान्यता को ठुकरा चुके हैं, लेकिन वैश्विक दबाव निरंतर बढ़ रहा है. कई देशों ने अमेरिकी राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वे इज़राइल पर संघर्ष विराम और मध्यस्थता को लेकर दबाव बनाएं. अमेरिका की भूमिका इस बीच विशेष रूप से ज़रूरी मानी जा रही है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यक्रम में कहा कि उन्हें लगता है कि संयुक्त राज्य गाज़ा में संघर्ष विराम को बहुत निकट ले गया है. उनका दावा है कि बंधकों की वापसी होगी और युद्ध को समाप्त करने की दिशा में बातचीत “गहन” स्तर पर चल रही है. ट्रंप और नेतन्याहू के बीच सोमवार को एक शिखर बैठक भी होनी है — ऐसे में यह साफ है कि अगले कुछ दिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में महत्वपूर्ण मोड़ लाएंगे.
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