Middle East War: पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध जैसे हालात का असर अब भारत के एविएशन सेक्टर पर भी साफ दिखाई देने लगा है. खासकर अमेरिका, इजरायल और ईरान से जुड़े तनाव के चलते कच्चे तेल की सप्लाई और हवाई मार्गों पर असर पड़ा है, जिसका सीधा प्रभाव एयरलाइंस कंपनियों के खर्च पर पड़ रहा है. ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या 1 अप्रैल से हवाई यात्रा महंगी हो जाएगी.
केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने इस मुद्दे पर अहम संकेत दिए हैं. उन्होंने बताया कि विमानों के ईंधन यानी एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) की कीमतें हर महीने की पहली तारीख को तय होती हैं, इसलिए अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा रहता है, तो इसका असर 1 अप्रैल से दिखाई दे सकता है.
एटीएफ महंगा होने की आशंका
मंत्री ने साफ किया कि मौजूदा हालात में एटीएफ की कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है. हालांकि, सरकार इस बात को लेकर सतर्क है कि इसका सीधा और तत्काल बोझ यात्रियों पर न पड़े. उन्होंने कहा कि एयरलाइंस कंपनियों के साथ लगातार बातचीत की जा रही है ताकि टिकट कीमतों में अचानक बढ़ोतरी को रोका जा सके.
सरकार की प्राथमिकता फिलहाल दो चीजों पर केंद्रित है- एक, उड़ानों का सुरक्षित संचालन जारी रहे और दूसरा, यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव कम से कम पड़े.
मध्य पूर्व संकट का सीधा असर
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है. साथ ही, खाड़ी देशों के ऊपर से उड़ानों के रूट में बदलाव या प्रतिबंध की वजह से एयरलाइंस की लागत बढ़ रही है. इन हालात में बीमा प्रीमियम भी महंगे हो गए हैं और ऑपरेशनल खर्च में इजाफा हुआ है.
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर एटीएफ पर पड़ेगा, जो एयरलाइंस के कुल खर्च का बड़ा हिस्सा होता है.
एयरलाइंस पर बढ़ता दबाव
मंत्री राम मोहन नायडू ने स्वीकार किया कि मौजूदा समय में एयरलाइंस कंपनियां वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं. ईंधन महंगा होने, लंबी उड़ान दूरी और बढ़ते बीमा खर्च के कारण कंपनियों की लागत तेजी से बढ़ रही है.
इसके बावजूद सरकार का प्रयास है कि एयरलाइंस सेवाएं प्रभावित न हों और यात्रियों को ज्यादा परेशानी न उठानी पड़े.
फ्यूल सरचार्ज से पहले ही बढ़ा बोझ
बढ़ती लागत को संतुलित करने के लिए कई घरेलू एयरलाइंस कंपनियां पहले ही फ्यूल सरचार्ज लागू कर चुकी हैं.
इन सरचार्ज से साफ है कि कंपनियां पहले से ही बढ़ती लागत का कुछ हिस्सा यात्रियों तक पहुंचाने लगी हैं.
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