Mercator Map: विश्वास करना मुश्किल लग सकता है, लेकिन स्कूल-कॉलेज में जिस दुनिया के नक्शे को देखकर हमने देशों और महाद्वीपों का आकार समझा, उसमें जमीन का असली आकार सही तरीके से नहीं दिखता था. यही वजह है कि नक्शे पर ग्रीनलैंड और अफ्रीका लगभग एक जैसे बड़े नजर आते हैं, जबकि असल में दोनों के क्षेत्रफल में बहुत बड़ा अंतर है.
एक आसान उदाहरण से इसे समझिए. दुनिया के सामान्य नक्शे में अफ्रीका और ग्रीनलैंड को लगभग बराबर आकार का दिखाया जाता है. लेकिन असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है. ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 21.66 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि अफ्रीका करीब 3.04 करोड़ वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है.
अफ्रीका के अंदर समा सकते हैं कई बड़े देश
अफ्रीका के असली आकार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मेक्सिको और पश्चिमी यूरोप के बड़े हिस्से को एक साथ रखा जाए तो भी काफी जगह बच सकती है.
अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 30.37 मिलियन वर्ग किलोमीटर है. इसके मुकाबले अमेरिका करीब 9.83 मिलियन, चीन 9.6 मिलियन और भारत 3.29 मिलियन वर्ग किलोमीटर में फैले हैं. पश्चिमी यूरोप के बड़े हिस्से को भी जोड़ दिया जाए तो इनका कुल क्षेत्रफल अफ्रीका से कम ही रहेगा.
अब सोचिए, अगर कोई बच्चा वर्षों तक ऐसा नक्शा देखे जिसमें अफ्रीका और ग्रीनलैंड लगभग बराबर नजर आते हैं, तो उसके दिमाग में दुनिया का आकार कैसा बनेगा? यही वजह है कि इस नक्शे को लेकर सामाजिक और राजनीतिक बहस भी होती रही है.
Mercator Projection vs. Reality: The True Size of Every Country pic.twitter.com/cfjJPllQLD
— African Maps (@MapsAfrican) September 6, 2026
1569 में बना था मर्केटर का नक्शा
इस पूरी कहानी की शुरुआत करीब 450 साल पहले हुई थी. 1569 में फ्लेमिश नक्शाकार जेरार्डस मर्केटर ने एक ऐसा नक्शा तैयार किया था, जो समुद्री यात्राओं के लिए काफी उपयोगी था. इसका मकसद देशों को बड़ा या छोटा दिखाना नहीं था, बल्कि समुद्र में दिशा और रास्ता समझना आसान बनाना था.
मर्केटर के नक्शे में दिशा और कोण सही तरीके से दिखते थे. इसलिए बाद में यूरोपीय समुद्री शक्तियों ने इसका इस्तेमाल समुद्री नक्शों के तौर पर किया. धीरे-धीरे यह नक्शा एटलस, स्कूल की किताबों और दीवारों पर लगे दुनिया के नक्शों तक पहुंच गया.
गोल धरती को सपाट नक्शे पर दिखाने की समस्या
धरती गोल है, लेकिन नक्शा कागज या मोबाइल की सपाट स्क्रीन पर बनाना पड़ता है. यहीं से असली परेशानी शुरू होती है. गोल धरती को सपाट रूप में दिखाते समय कुछ न कुछ बदलाव करना ही पड़ता है.
मर्केटर नक्शे में भूमध्य रेखा के पास के इलाके लगभग सही आकार में दिखते हैं. लेकिन जैसे-जैसे भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर जाते हैं, जमीन का आकार नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है. यही कारण है कि ग्रीनलैंड जैसे इलाके नक्शे पर बहुत बड़े नजर आते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के पास स्थित अफ्रीका अपेक्षाकृत छोटा दिखाई देता है.
They taught us Africa was “smaller” on the map.
— Dsain't🤡 (@imisituntun) September 6, 2026
It wasn’t.
Africa is ~30.4 MILLION km² big enough to fit the USA, China, India & much of Europe.
The Mercator projection was created for navigation, but during the colonial era its distorted image of the world became deeply… pic.twitter.com/OksqYY5ysR
नक्शे के जरिए सोच पर असर की बहस
आलोचकों का कहना है कि सदियों से इस्तेमाल हो रहे इस नक्शे ने दुनिया को देखने की हमारी सोच को भी प्रभावित किया. उनका तर्क है कि अफ्रीका और दूसरे विकासशील देशों को नक्शे पर छोटा दिखाने से वे कम महत्वपूर्ण नजर आ सकते हैं, जबकि यूरोप और उत्तरी देशों का आकार जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देता है.
अफ्रीकी देशों में लंबे समय से इसे बदलने की मांग भी होती रही है. उनका कहना है कि बच्चों को बचपन से ऐसा नक्शा दिखाया जाता है, जिसमें यूरोप बड़ा और अफ्रीका छोटा नजर आता है. इससे दुनिया को लेकर उनके मन में एक अलग तस्वीर बन सकती है. कुछ लोग इसे औपनिवेशिक सोच से भी जोड़ते हैं.
‘सही नक्शे’ की मुहिम
इसी सोच को बदलने के लिए अफ्रीकी संघ और टोगो की ओर से ‘करैक्ट द मैप’ यानी नक्शे को सही करने की मुहिम चलाई गई. 2018 में नक्शाकार बोजन शावरिच, टॉम पैटरसन और बर्नहार्ड जेनी ने ‘इक्वल अर्थ’ नाम का नक्शा तैयार किया.
इस नक्शे में देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल को ज्यादा सही अनुपात में दिखाने की कोशिश की गई है. इसमें अफ्रीका अपने वास्तविक बड़े आकार में नजर आता है, जबकि ग्रीनलैंड और यूरोप पहले के मुकाबले छोटे दिखाई देते हैं.
4 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में इसी दिशा में एक प्रस्ताव पर मतदान हुआ. प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट दिया. अमेरिका ने इसका विरोध किया, जबकि एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन मतदान से दूर रहे.
टोगो ने यह प्रस्ताव पेश किया था और 2026 के अंत तक अपने स्कूलों में इस्तेमाल होने वाले नक्शों को बदलने की बात कही है. इसे वह औपनिवेशिक सोच से बाहर निकलने की दिशा में कदम मानता है.
संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव नक्शे पर प्रतिबंध नहीं
इस प्रस्ताव के बाद यह कहना सही नहीं होगा कि संयुक्त राष्ट्र ने मर्केटर नक्शे पर रोक लगा दी है. महासभा का प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है. यानी स्कूलों, कंपनियों या वेबसाइटों के लिए तुरंत नक्शा बदलना जरूरी नहीं है.
इसका उद्देश्य सरकारों, स्कूलों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और तकनीकी कंपनियों को क्षेत्रफल को सही अनुपात में दिखाने वाले नक्शों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना है. हालांकि समुद्री यात्रा और दिशा बताने जैसे कामों में मर्केटर नक्शा अब भी उपयोगी रह सकता है.
भारत के नक्शे पर क्या असर होगा?
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इस प्रस्ताव का समर्थन किया है. नए नक्शे में भारत का आकार थोड़ा अलग दिखाई दे सकता है, लेकिन देश के वास्तविक क्षेत्रफल या सीमाओं में कोई बदलाव नहीं होगा.
भारत ने साफ किया है कि प्रस्ताव का समर्थन किसी खास नक्शे या मानचित्र पद्धति को मंजूरी देना नहीं है. भारत के आधिकारिक नक्शे में उसकी संप्रभु सीमाएं उसी तरह दिखाई जानी चाहिए जैसी सरकार के आधिकारिक मानचित्र में हैं. भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर भी अपना रुख स्पष्ट रखा है और कहा है कि देश की क्षेत्रीय अखंडता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता.
क्या ‘इक्वल अर्थ’ पूरी तरह सही नक्शा है?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ‘इक्वल अर्थ’ दुनिया का बिल्कुल सही नक्शा है? इसका जवाब है- नहीं. गोल धरती को सपाट कागज पर उतारते समय हर चीज को एक साथ बिल्कुल सही रखना संभव नहीं है. ‘इक्वल अर्थ’ क्षेत्रफल को ज्यादा सही दिखाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर देश का आकार, दूरी और दिशा भी पूरी तरह सही होगी.
किसी नक्शे में क्षेत्रफल सही हो सकता है, लेकिन आकृति में थोड़ा बदलाव आ सकता है. किसी में दिशा सही होगी तो दूरी या आकार में अंतर दिखाई दे सकता है. इसलिए कोई भी नक्शा हर चीज को एक साथ पूरी तरह सही नहीं दिखा सकता. धरती को उसके असली रूप में देखने का सबसे सही तरीका ग्लोब है. लेकिन किताब, मोबाइल या समुद्री यात्रा जैसे कामों में ग्लोब हमेशा सुविधाजनक नहीं होता.
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि कौन सा नक्शा पूरी तरह सही है. सवाल यह है कि किस काम के लिए कौन सा नक्शा ज्यादा सही है. समुद्री यात्रा के लिए मर्केटर उपयोगी है, जबकि देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल की तुलना के लिए ‘इक्वल अर्थ’ ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकता है.
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