इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर (PoK) में तेज़ी से भड़के विरोध प्रदर्शनों ने वहां के राजनीतिक और प्रशासनिक संकट को और गहरा कर दिया है. हालिया हफ्तों में सड़कों पर उतरे लाखों लोगों के आक्रोश और हिंसक झड़पों के बीच यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी (UKPNP) के विदेशी मामलों के अध्यक्ष जमील मकसूद ने पाकिस्तान पर तीखे आरोप लगाए और उसे “डूबता टाइटैनिक” करार दिया. उनका कहना है कि PoK के लोग अब पाकिस्तान के साथ जुड़ना नहीं चाहते और वे उस नाव पर सवार होने को तैयार नहीं हैं जो धीरे-धीरे डूब रही है.
PoK में विरोध के मुख्य कारण
मकसूद ने UNHRC के 60वें सत्र से अलग आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि PoK में उभरा सार्वजनिक रोष दीर्घकालीन राजनीतिक उपेक्षा और प्रशासनिक खराबी का परिणाम है. उनके मुताबिक़ प्रमुख शिकायतों में भ्रष्टाचार, सरकारी नौकरियों और संसाधनों में भाई-भतीजावाद तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसी सेवाओं का अभाव शामिल हैं. मकसूद ने यह भी कहा कि स्थानीय बाज़ार नकली और मिलावटी खाद्य वस्तुओं से भरे हुए हैं और लोग रोजगार तथा विकास के अवसरों से वंचित हैं.
उन्होंने कहा, “यह व्यापक भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद है जो हमारी ज़िंदगियाँ प्रभावित कर रहा है. लोग अब चुप नहीं बैठेंगे, वे अखंड जम्मू-कश्मीर की मांग कर रहे हैं और अपनी स्थानीय पहचान बचाने का इरादा रखते हैं.”
सड़क पर आक्रोश, हिंसा और हताहत
PoK के कई हिस्सों में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से शुरू हुआ आंदोलन कुछ स्थानों पर हिंसक हो गया. स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय सूत्रों की सूचनाओं के आधार पर विरोध-प्रदर्शनों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव में कम से कम 12 नागरिकों की मौत की खबरें सामने आई हैं जबकि कई लोग घायल हुए बताए जा रहे हैं. ऐसी घटनाओं के बाद क्षेत्र में सुरक्षा-बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच जारी तनाव में और तीव्रता आई है.
प्रदर्शनों के बढ़ते दबाव के मद्देनज़र स्थानीय प्रशासन ने कई जगह संचार सेवाओं (मोबाइल और इंटरनेट) को बंद रखा, जिससे लोग अपने बहरीन-विदेश में बसे रिश्तेदारों और मित्रों से संपर्क करने में असमर्थ रहे. मिसिंग व सीमित सूचनाओं ने परिवारों और समुदायों में चिंता और भय को बढ़ा दिया है.
शहबाज सरकार पर राजनीतिक दबाव
विरोध के असर ने संघीय सरकार को कार्रवाई के लिए विवश किया है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने गतिरोध को शांत करने के उद्देश्य से आठ सदस्यीय मंत्री-स्तरीय समिति का गठन किया और उन्हें संवाद स्थापित करने के लिए मुजफ्फराबाद भेजा. इस समिति में जिन नामों का जिक्र हुआ है, उनमें राणा सनाउल्लाह, अहसान और पीपीपी नेता राजा परवेज अशरफ शामिल बताए गए हैं. सरकार का दावा है कि यह पहल प्रदर्शनकारी नेताओं से बातचीत कर उनकी कुछ मांगों का समाधान निकालने के लिए है, जबकि विरोधियों का कहना है कि यह कदम दबाव के आगे आकस्मिक प्रतिक्रिया है.
मकसूद ने पाकिस्तान को 'दुष्ट देश' कहा
जमील मकसूद ने पाकिस्तान की नीतियों को कड़वाई से नरम नहीं छोड़ा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी PoK में हो रहे उत्पीड़न का ज़िक्र किया. उन्होंने पाकिस्तान को “दुष्ट देश” कहा और आरोप लगाया कि देश विभिन्न क्षेत्रों- बलूचिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा, गिलगिट-बाल्टिस्तान और PoK में अपने नागरिकों के खिलाफ दमनात्मक नीतियाँ लागू कर रहा है. मकसूद का यह भी कहना था कि PoK के लोग अब “पाकिस्तान के साथ रहने” को प्राथमिक विकल्प नहीं मानते और उनकी पहली पसंद अखंड जम्मू-कश्मीर के साथ फिर से जुड़ना है.
क्या है आंदोलन की व्यापक मांगें?
विरोध के दौरान सामने आई प्रमुख मांगों में स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सुदृढ़ीकरण, संसाधनों का उचित वितरण, सरकारी नौकरियों तथा आरक्षण नीतियों में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर ठोस कार्रवाई शामिल हैं. साथ ही प्रदर्शनकारी लंबे समय से PoK की शासन व्यवस्था और अधिकारों को लेकर व्यापक बदलाव की भी माँग कर रहे हैं, जो क्षेत्र की राजनीतिक पहचान और भविष्य के विकल्पों को दोनों प्रभावित कर सकती हैं.
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