14 या 15 कब रखा जाएगा उत्पन्ना एकादशी का व्रत, जानें पूजन विधि और शुभ मुहूर्त

Utpanna Ekadashi: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत महत्व माना गया है. वर्ष भर में आने वाली चौबीस एकादशियों में उत्पन्ना एकादशी का स्थान सबसे विशेष है, क्योंकि इसी दिन देवी एकादशी का जन्म हुआ था. कहा जाता है कि यह व्रत साधक के जीवन से दुखों और पापों को दूर कर उसे मोक्ष और समृद्धि का आशीर्वाद देता है.

Kab hai Utpanna Ekadashi 14 ya 15 november 2025 kno shubh muhurat and vidhi
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Utpanna Ekadashi: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत महत्व माना गया है. वर्ष भर में आने वाली चौबीस एकादशियों में उत्पन्ना एकादशी का स्थान सबसे विशेष है, क्योंकि इसी दिन देवी एकादशी का जन्म हुआ था. कहा जाता है कि यह व्रत साधक के जीवन से दुखों और पापों को दूर कर उसे मोक्ष और समृद्धि का आशीर्वाद देता है. इस वर्ष यह पावन पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ 15 नवंबर 2025, शनिवार के दिन मनाया जाएगा.

हिंदू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को उत्पन्ना एकादशी व्रत रखा जाता है. इस वर्ष एकादशी तिथि का आरंभ 15 नवंबर की रात 12 बजकर 49 मिनट से होगा और यह तिथि 16 नवंबर की रात 02 बजकर 37 मिनट तक रहेगी. उदया तिथि के अनुसार व्रत और पूजा का दिन 15 नवंबर रहेगा. इसी दिन भगवान विष्णु और माता एकादशी की आराधना का विशेष फल प्राप्त होता है.

उत्पन्ना एकादशी पूजा का शुभ मुहूर्त

उत्पन्ना एकादशी के दिन पूजा करने का सर्वश्रेष्ठ समय सुबह 08 बजकर 04 मिनट से 09 बजकर 25 मिनट तक रहेगा. इसके अतिरिक्त भक्त ब्रह्म मुहूर्त और अभिजीत मुहूर्त में भी पूजा कर सकते हैं. ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04 बजकर 58 मिनट से 05 बजकर 51 मिनट तक रहेगा, जबकि अभिजीत मुहूर्त 11 बजकर 44 मिनट से 12 बजकर 27 मिनट तक रहेगा. इन शुभ क्षणों में भगवान विष्णु की आराधना करने से मन को शांति, आत्मिक बल और पुण्य की प्राप्ति होती है.

देवी एकादशी की उत्पत्ति और पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में मुर नामक दैत्य ने पृथ्वी और स्वर्ग में आतंक फैला रखा था. जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे, तभी उनके शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई. वही थीं देवी एकादशी. उन्होंने मुर दैत्य का संहार कर देवताओं और मानव जाति की रक्षा की. भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर देवी एकादशी को आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति एकादशी का व्रत रखेगा, उसके सारे पाप नष्ट होंगे और उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी. इसलिए इस तिथि को “उत्पन्ना एकादशी” कहा गया, क्योंकि इसी दिन देवी एकादशी का उद्भव हुआ था.

व्रत और पूजा की परंपरा

उत्पन्ना एकादशी के दिन व्रत रखने वाला व्यक्ति प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करता है. पूजा स्थल को साफ कर वहां भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित किया जाता है. इसके बाद धूप, दीप, तुलसी पत्र, पीले पुष्प और नैवेद्य से पूजन किया जाता है. पूरे दिन उपवास रखते हुए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करने से मन, वचन और कर्म शुद्ध होते हैं. यह व्रत केवल एक दिन का नहीं, बल्कि एक साल के आध्यात्मिक अनुशासन का प्रारंभ माना जाता है. जो भक्त वर्ष भर एकादशी व्रत का पालन करना चाहता है, वह इस दिन से शुरुआत कर सकता है.

उत्पन्ना एकादशी का महत्व और लाभ

उत्पन्ना एकादशी व्रत को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष  चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति कराने वाला माना गया है. ऐसा विश्वास है कि इस दिन उपवास करने से पापों का नाश होता है और व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और सौभाग्य का वास होता है. यदि कोई व्यक्ति निरंतर बाधाओं, मानसिक तनाव या आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा हो, तो इस एकादशी का व्रत उसे राहत प्रदान करता है. साथ ही यह व्रत घर-परिवार में सौहार्द और सकारात्मकता का वातावरण भी बनाता है.

आध्यात्मिक संदेश और सार

उत्पन्ना एकादशी केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि यह धर्म की विजय और अधर्म के विनाश का प्रतीक है. यह दिन हमें सिखाता है कि जब-जब अन्याय और अंधकार बढ़ता है, तब-तब ईश्वर की शक्ति नए रूप में प्रकट होकर धर्म की रक्षा करती है.देवी एकादशी का जन्म इस बात का प्रतीक है कि भक्ति, संयम और विश्वास से हर कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है. जो व्यक्ति सच्चे मन से इस दिन भगवान विष्णु और माता एकादशी की आराधना करता है, उसके जीवन में नई ऊर्जा, आत्मविश्वास और आशा का संचार होता है.

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