तेल और गैस के बाद अब फर्टिलाइजर पर संकट! किन देशों से खाद आयात करता है भारत, क्या होगा इसका असर?

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रह सकता.

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प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Middle East War: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रह सकता. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो इसका असर फर्टिलाइजर यानी खाद की सप्लाई और कीमतों पर भी पड़ सकता है. भारत दुनिया में खाद का बड़ा उपभोक्ता है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है. ऐसे में अगर पश्चिम एशिया में युद्ध और बढ़ता है या समुद्री रास्तों पर बाधा आती है, तो इसका सीधा असर भारतीय कृषि और किसानों पर पड़ सकता है.

भारत में तेजी से बढ़ रहा है खाद का आयात

पिछले कुछ वर्षों में भारत का फर्टिलाइजर आयात लगातार बढ़ा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, फरवरी 2026 तक भारत लगभग 9.8 मिलियन टन तैयार उर्वरक (फिनिश्ड फर्टिलाइजर) आयात कर चुका है.

पिछले वित्त वर्ष में भारत ने विदेशों से करीब 10.23 अरब डॉलर (लगभग 94 हजार करोड़ रुपये) की खाद खरीदी थी.

खाद का आयात बढ़ने की एक बड़ी वजह यह है कि देश में खेती के लिए इसकी मांग बहुत ज्यादा है, जबकि घरेलू उत्पादन अभी भी पूरी जरूरत को पूरा नहीं कर पाता. इस समय देश में खरीफ फसलों की बुआई की तैयारी शुरू हो चुकी है. ऐसे में अगर सप्लाई में बाधा आती है तो किसानों को महंगी खाद खरीदनी पड़ सकती है.

होर्मुज बंद होने से बढ़ सकती है समस्या

मिडिल ईस्ट के तनाव के बीच ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद करने की खबरों ने चिंता बढ़ा दी है. यह समुद्री रास्ता खाड़ी देशों को दुनिया से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण मार्ग है.

भारत यूरिया और अन्य उर्वरकों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है, जिनमें मुख्य रूप से ओमान, सऊदी अरब और कतर शामिल हैं. अगर इसमें यूएई को भी जोड़ दिया जाए तो भारत के खाद आयात में खाड़ी देशों की हिस्सेदारी और ज्यादा हो जाती है.

यदि होर्मुज के रास्ते में बाधा आती है या जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ता है, तो शिपिंग लागत बढ़ सकती है. इसका असर सीधे खाद की कीमतों पर पड़ेगा.

सरकार का सब्सिडी बिल पहले ही बहुत बड़ा

भारत में किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए सरकार भारी सब्सिडी देती है. 2025-26 में खाद सब्सिडी का बिल लगभग 1.86 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो केंद्र सरकार के कुल सब्सिडी खर्च का 40 प्रतिशत से अधिक है.

अगर युद्ध के कारण आयात महंगा होता है या सप्लाई प्रभावित होती है, तो सरकार का यह खर्च और बढ़ सकता है. इसका मतलब है कि डीएपी, यूरिया और अन्य केमिकल उर्वरकों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है.

रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है फर्टिलाइजर आयात

विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2025-26 के वित्त वर्ष में भारत का फर्टिलाइजर आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है. यह आंकड़ा करीब 18 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 76 प्रतिशत ज्यादा होगा.

वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में ही भारत का खाद आयात 71 प्रतिशत बढ़कर लगभग 13.98 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. यह दिखाता है कि देश में मांग तेजी से बढ़ रही है और घरेलू उत्पादन अभी भी पर्याप्त नहीं है.

किन उर्वरकों के लिए विदेशों पर निर्भर है भारत

भारत में यूरिया का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन कई महत्वपूर्ण उर्वरकों के लिए देश अभी भी विदेशों पर निर्भर है.

खास तौर पर डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) और एनपीके उर्वरक का बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगाया जाता है. इसी कारण सरकार ने कई देशों के साथ समझौते करके सप्लाई सुनिश्चित करने की कोशिश की है.

भारत ने सऊदी अरब, रूस और मोरक्को जैसे देशों के साथ मिलकर करीब 86 लाख मीट्रिक टन खाद की सप्लाई सुनिश्चित करने की योजना बनाई है. लेकिन अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध और बढ़ता है, तो इन योजनाओं पर भी असर पड़ सकता है.

हाल के महीनों में तेजी से बढ़ा आयात

उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से अक्टूबर के बीच भारत ने लगभग 14.45 मिलियन टन खाद का आयात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 8.56 मिलियन टन था. यानी इसमें करीब 69 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.

यूरिया आयात में भी तेज वृद्धि देखी गई है. अप्रैल से दिसंबर के बीच यूरिया आयात 85 प्रतिशत बढ़कर लगभग 8 मिलियन टन तक पहुंच गया. इसी तरह डीएपी का आयात भी करीब 46 प्रतिशत बढ़ा है.

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को देखते हुए भारत अब वैकल्पिक सप्लाई स्रोतों की तलाश भी कर रहा है. रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत इंडोनेशिया, बेलारूस, मोरक्को और रूस जैसे देशों से खाद आयात बढ़ाने पर विचार कर रहा है, ताकि सप्लाई में किसी तरह की कमी न आए.

किसानों और अर्थव्यवस्था पर असर

अगर मिडिल ईस्ट का तनाव लंबे समय तक जारी रहता है और समुद्री रास्तों में बाधा आती है, तो इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र पर ही नहीं बल्कि कृषि क्षेत्र पर भी पड़ सकता है.

खाद की कीमतें बढ़ने से किसानों की लागत बढ़ेगी, जिसका असर फसलों की कीमतों और देश की खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है.

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