भारत की समुद्री सुरक्षा होगी अभेद्य! नौसेना को मिलेंगे ₹449 करोड़ के एडवांस GNSS जैमर्स, जानें खासियत

भारत अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में लगातार कदम उठा रहा है. इसी कड़ी में रक्षा मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण रक्षा सौदे को मंजूरी दी है, जिसके तहत भारतीय नौसेना को अत्याधुनिक ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) जैमर्स मिलेंगे.

Indian Navy To Get Advanced Indigenous GNSS Jammers
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भारत अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में लगातार कदम उठा रहा है. इसी कड़ी में रक्षा मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण रक्षा सौदे को मंजूरी दी है, जिसके तहत भारतीय नौसेना को अत्याधुनिक ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) जैमर्स मिलेंगे. यह तकनीक समुद्र में दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और भारतीय युद्धपोतों की सुरक्षा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगी. खास बात यह है कि इस परियोजना में स्वदेशी तकनीक को प्राथमिकता दी गई है, जो आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती देती है.

449 करोड़ रुपये के समझौते पर लगी मुहर

रक्षा मंत्रालय ने बेंगलुरु स्थित अकॉर्ड सॉफ्टवेयर एंड सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड (ASSPL) के साथ 449 करोड़ रुपये का अनुबंध किया है. इस समझौते के तहत भारतीय नौसेना के लिए 20 उन्नत क्षमता वाले ECGNSS जैमर्स तैयार किए जाएंगे. यह करार ‘खरीद (भारतीय-स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित)’ श्रेणी के अंतर्गत किया गया है. रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हुए इस समझौते को देश की रक्षा उत्पादन क्षमता के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.

आखिर क्या होता है जैमर और कैसे करता है काम?

जैमर एक विशेष इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है जो किसी क्षेत्र में मौजूद वायरलेस सिग्नलों को बाधित करने का काम करता है. यह रेडियो फ्रीक्वेंसी पर ऐसे सिग्नल प्रसारित करता है, जो मोबाइल नेटवर्क, जीपीएस, वाई-फाई और अन्य संचार प्रणालियों के मूल सिग्नलों को कमजोर कर देते हैं. जब जैमर सक्रिय होता है, तो आसपास के उपकरणों को सही नेटवर्क सिग्नल नहीं मिल पाते, जिससे संचार और नेविगेशन सेवाएं प्रभावित होने लगती हैं.

नौसेना के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह तकनीक?

समुद्री अभियानों के दौरान नेविगेशन और संचार किसी भी नौसेना की सबसे बड़ी ताकत होते हैं. ऐसे में उन्नत GNSS जैमर्स भारतीय जहाजों को दुश्मन की निगरानी, ट्रैकिंग और संभावित इलेक्ट्रॉनिक हमलों से बचाने में मदद करेंगे. यह तकनीक शत्रु के नेविगेशन सिस्टम को भ्रमित कर सकती है और भारतीय नौसेना को रणनीतिक बढ़त दिला सकती है. रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य के युद्धों में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली पारंपरिक हथियारों जितनी ही महत्वपूर्ण साबित होने वाली है.

स्वदेशी निर्माण से बढ़ेगी रक्षा क्षेत्र की आत्मनिर्भरता

इस परियोजना की एक और बड़ी विशेषता यह है कि जैमर्स में इस्तेमाल होने वाले लगभग 75 प्रतिशत उपकरण और तकनीक स्वदेशी होंगे. इससे न केवल विदेशी निर्भरता कम होगी बल्कि देश के रक्षा उद्योग को भी नई गति मिलेगी. आमतौर पर जैमर्स का उपयोग वीवीआईपी सुरक्षा, संवेदनशील सैन्य ठिकानों और रणनीतिक प्रतिष्ठानों में किया जाता है, लेकिन अब यही तकनीक भारतीय नौसेना की सुरक्षा कवच का अहम हिस्सा बनने जा रही है. यह कदम भारत की रक्षा तैयारियों और तकनीकी आत्मनिर्भरता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाला माना जा रहा है.

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