नई दिल्ली: आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और अब लड़ाइयां सिर्फ जमीन, समुद्र या आसमान तक सीमित नहीं रह गई हैं. तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ड्रोन जैसी प्रणालियां भविष्य के युद्धों की दिशा तय कर रही हैं. इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना अब एक समर्पित ड्रोन फोर्स तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है.
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान समेत तीनों सेनाओं के शीर्ष अधिकारी कई बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि आने वाले युद्ध पारंपरिक नहीं होंगे. खासतौर पर ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना के भीतर इस बात पर गंभीर मंथन शुरू हुआ कि भविष्य के संघर्षों में तकनीक-आधारित क्षमताएं निर्णायक साबित होंगी.
ड्रोन को बनाया जा रहा है युद्ध की रीढ़
भारतीय सेना अब यह मान चुकी है कि आने वाले समय में अनमैन्ड एरियल व्हीकल सिस्टम (UAV) यानी ड्रोन, निगरानी से लेकर आक्रामक अभियानों तक अहम भूमिका निभाएंगे. इसी सोच के तहत सेना अपनी सभी शाखाओं और सेवाओं में विशेष ड्रोन यूनिट गठित कर रही है.
इन यूनिट्स को इस तरह तैयार किया जाएगा कि वे निगरानी, टोही, लक्ष्य निर्धारण और सटीक हमलों जैसे सभी कार्यों में दक्ष हों. सेना का लक्ष्य है कि ड्रोन का इस्तेमाल केवल सहायक भूमिका तक सीमित न रहे, बल्कि उन्हें युद्ध रणनीति का अहम हिस्सा बनाया जाए.
19 प्रमुख सैन्य संस्थानों में ड्रोन ट्रेनिंग सेंटर
ड्रोन फोर्स को मजबूत आधार देने के लिए देशभर में 19 प्रमुख आर्मी सेंटरों में अत्याधुनिक ड्रोन ट्रेनिंग सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं. इनमें देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA), चेन्नई और गया की ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (OTA), महू का इंफैंट्री स्कूल और देवलाली का स्कूल ऑफ आर्टिलरी शामिल हैं.
इन प्रशिक्षण केंद्रों में अधिकारियों से लेकर जवानों तक को चरणबद्ध और व्यवस्थित ट्रेनिंग दी जाएगी. सेना का लक्ष्य है कि 2027 तक हर सैनिक को कम से कम बेसिक ड्रोन ऑपरेशन का प्रशिक्षण मिल जाए. इसके लिए वर्चुअल रियलिटी आधारित ड्रोन सिम्युलेटर भी इस्तेमाल किए जाएंगे, जिससे ट्रेनिंग ज्यादा सुरक्षित, यथार्थवादी और किफायती हो सके.
हर कोर में हजारों ड्रोन तैनात करने की योजना
ड्रोन ट्रेनिंग सेंटरों में जवानों को नैनो, माइक्रो, स्मॉल और मीडियम कैटेगरी के ड्रोन चलाने की ट्रेनिंग दी जाएगी. इनका उपयोग निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और जरूरत पड़ने पर आक्रामक मिशनों में किया जाएगा.
सेना की योजना है कि भविष्य में हर सैन्य कोर के पास 8,000 से 10,000 ड्रोन उपलब्ध हों. इससे सेना की निगरानी क्षमता कई गुना बढ़ेगी और सीमावर्ती इलाकों में तुरंत प्रतिक्रिया देना आसान होगा.
स्वदेशी ड्रोन पर खास जोर
इस पूरी रणनीति में स्वदेशी तकनीक को प्राथमिकता दी जा रही है. भारतीय सेना चाहती है कि उसकी ड्रोन फोर्स में अधिकतर प्लेटफॉर्म भारत में विकसित और निर्मित हों. सरकार भी इस दिशा में प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम और ‘इनnovation for Defence Excellence (iDEX)’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए रक्षा स्टार्टअप्स और उद्योगों को बढ़ावा दे रही है.
इसी के तहत नागास्त्र-1 लोइटरिंग म्यूनिशन जैसे स्वदेशी ड्रोन पहले ही सेना में शामिल किए जा चुके हैं, जो दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला करने में सक्षम हैं.
दुश्मन के ड्रोन से निपटने की भी तैयारी
ड्रोन युद्ध के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय सेना केवल आक्रामक क्षमताओं पर ही नहीं, बल्कि एंटी-ड्रोन सिस्टम पर भी बराबर ध्यान दे रही है. इसके तहत D4 एंटी-ड्रोन सिस्टम, सक्षम (SAKSHAM) और भार्गवास्त्र (Bhargavastra) जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म विकसित किए गए हैं, जो दुश्मन के ड्रोन को पहचानकर उन्हें निष्क्रिय या नष्ट कर सकते हैं.
इसके अलावा डीआरडीओ ने एक लेजर आधारित ड्रोन डिफेंस सिस्टम भी तैयार किया है, जिसकी मारक क्षमता करीब दो किलोमीटर तक बताई जा रही है. यह प्रणाली भविष्य में महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभा सकती है.
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